‘पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया’ के लक्ष्य के बीच देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी चुनौती सामने आई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक तैनात है। इन स्कूलों में करीब 29.12 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं। यानी औसतन हर ऐसे स्कूल में एक शिक्षक को कई कक्षाओं के विद्यार्थियों की पढ़ाई संभालनी पड़ सकती है।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में शिक्षकों की कुल संख्या एक करोड़ से अधिक हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद कई स्कूलों में शिक्षक उपलब्धता का अंतर बना हुआ है। एक साल पहले यानी 2024-25 में ऐसे स्कूलों की संख्या 1,04,125 थी। इस तरह 2025-26 में एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या 3,282 कम हुई है। यह करीब 3.15 प्रतिशत की गिरावट है, लेकिन देशभर में एक लाख से अधिक स्कूलों का केवल एक शिक्षक के भरोसे चलना शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है।
29 लाख से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई एक शिक्षक के भरोसे
UDISE+ के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में एकल-शिक्षक स्कूलों में कुल 29,12,147 विद्यार्थियों का नामांकन दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या करीब 29.12 लाख है। ये स्कूल केवल सरकारी व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आंकड़ों में सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी सहित सभी प्रबंधन श्रेणियों के स्कूल शामिल हैं।
एक शिक्षक वाले स्कूलों में पढ़ाई की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं होता। खासकर उन प्राथमिक स्कूलों में जहां अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक ही शिक्षक पढ़ाता है। ऐसे में शिक्षक को विषय पढ़ाने के साथ विद्यार्थियों की उपस्थिति, मूल्यांकन और स्कूल से जुड़े दूसरे काम भी देखने पड़ सकते हैं। हालांकि, UDISE+ का यह आंकड़ा केवल स्कूल में एक शिक्षक होने की स्थिति बताता है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर ऐसे स्कूल में पहली से पांचवीं तक की सभी कक्षाएं एक साथ चलती हैं।
आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा एकल-शिक्षक स्कूल
राज्यों के आंकड़ों में आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर है। यहां 16,357 स्कूल केवल एक शिक्षक के साथ संचालित हो रहे हैं। यह देश के कुल एकल-शिक्षक स्कूलों का 16 प्रतिशत से अधिक है।
इसके बाद झारखंड में 9,827 और महाराष्ट्र में 9,269 ऐसे स्कूल हैं। कर्नाटक में 8,042, उत्तर प्रदेश में 7,874, राजस्थान में 7,200 और पश्चिम बंगाल में 6,769 स्कूलों में एक ही शिक्षक तैनात है।
अन्य राज्यों में भी यह समस्या दिखाई देती है। तेलंगाना में 4,793, तमिलनाडु में 3,957, असम में 3,159 और हिमाचल प्रदेश में 3,128 एकल-शिक्षक स्कूल दर्ज किए गए हैं। उत्तराखंड में ऐसे स्कूलों की संख्या 2,655 और छत्तीसगढ़ में 2,461 है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि एकल-शिक्षक स्कूलों की समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों में इसकी स्थिति और कारणों में अंतर हो सकता है।
कुल शिक्षक एक करोड़ से ज्यादा, फिर भी स्कूलों में असमानता
देश में शिक्षकों की कुल संख्या में बढ़ोतरी हुई है। UDISE+ 2025-26 के अनुसार, देशभर में शिक्षकों की संख्या बढ़कर 1,02,73,020 हो गई है। 2022-23 में यह संख्या 94,83,294 थी। यानी तीन साल में शिक्षकों की कुल संख्या में 8.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात यानी पupil-teacher ratio (PTR) 24:1 दर्ज किया गया है। अलग-अलग शैक्षणिक स्तरों पर यह अनुपात और कम है। फाउंडेशनल स्तर पर 10:1, प्रिपरेटरी स्तर पर 12:1, मिडिल स्तर पर 17:1 और सेकेंडरी स्तर पर 21:1 है।
पहली नजर में ये आंकड़े बेहतर शिक्षक उपलब्धता का संकेत देते हैं, लेकिन राष्ट्रीय औसत से हर स्कूल की स्थिति का पता नहीं चलता। किसी राज्य या देश का कुल छात्र-शिक्षक अनुपात संतोषजनक होने के बावजूद दूरदराज के गांवों, पहाड़ी इलाकों और कम नामांकन वाले स्कूलों में शिक्षकों की कमी बनी रह सकती है। यही वजह है कि केवल कुल शिक्षकों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; उनकी सही जगह पर तैनाती भी जरूरी है।
शिक्षा का अधिकार कानून में क्या हैं शिक्षक संबंधी नियम?
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009 के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की न्यूनतम संख्या और छात्र-शिक्षक अनुपात के नियम तय किए गए हैं।
कक्षा एक से पांच तक के स्कूलों में 60 तक नामांकित बच्चों के लिए कम से कम दो शिक्षक होने चाहिए। 61 से 90 बच्चों के लिए तीन, 91 से 120 के लिए चार और 121 से 200 बच्चों के लिए पांच शिक्षक निर्धारित हैं। 200 से अधिक नामांकन होने पर प्रधान शिक्षक सहित अतिरिक्त प्रावधान लागू होते हैं।
वहीं, कक्षा छह से आठ तक के स्तर पर प्रत्येक कक्षा के लिए कम से कम एक शिक्षक और हर 35 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का प्रावधान है। विज्ञान एवं गणित, सामाजिक अध्ययन और भाषा विषयों के लिए भी शिक्षक उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
इसलिए एकल-शिक्षक स्कूलों का आंकड़ा केवल शिक्षकों की संख्या का सवाल नहीं है। स्कूल में नामांकित बच्चों की संख्या, कक्षाओं का स्तर और विषयों के अनुसार शिक्षकों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है।
सरकार के सामने चुनौती: शिक्षकों की सही तैनाती
शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, शिक्षकों की नियुक्ति, सेवा शर्तें और स्कूलों में उनकी तैनाती मुख्य रूप से राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आती है। शिक्षकों के पद खाली होने के पीछे सेवानिवृत्ति, इस्तीफे, नए पदों की जरूरत और विद्यार्थियों की संख्या में बदलाव जैसे कारण हो सकते हैं।
केंद्र सरकार राज्यों को समय पर भर्ती और शिक्षकों की दोबारा तैनाती के लिए लगातार सलाह देती रही है। समग्र शिक्षा योजना के तहत भी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने के लिए सहायता दी जाती है।
कम नामांकन वाले स्कूलों का विलय या पुनर्गठन भी कुछ राज्यों में किया जाता है, लेकिन एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या में आई कमी को केवल स्कूलों के विलय या नई नियुक्तियों का परिणाम मानना सही नहीं होगा। उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि कमी में नई भर्तियों, स्थानांतरण, स्कूलों के विलय या अन्य प्रशासनिक बदलावों का कितना योगदान रहा।
केवल आंकड़े घटाना नहीं, हर स्कूल तक शिक्षक पहुंचाना जरूरी
एक साल में एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या में करीब 3 प्रतिशत की कमी जरूर आई है, लेकिन अभी भी देश के 1 लाख से अधिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक है। इन स्कूलों में पढ़ने वाले 29 लाख से ज्यादा बच्चों के लिए शिक्षकों की उपलब्धता और पढ़ाई की गुणवत्ता सुनिश्चित करना जरूरी है।
राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर होने के बावजूद जब तक जरूरत के अनुसार हर स्कूल में शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक शिक्षा की गुणवत्ता में समान सुधार लाना मुश्किल होगा। खासकर ग्रामीण, पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षक नियुक्ति के साथ उनकी नियमित तैनाती और स्कूलों में उपस्थिति पर भी ध्यान देना होगा।



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