
पूर्वी चीन के एक विशेष शिक्षा स्कूल ने अपनी अनोखी “ग्रैटिट्यूड एजुकेशन” यानी कृतज्ञता शिक्षा पद्धति के कारण सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चा छेड़ दी है। इस कार्यक्रम के तहत छात्रों को पूरे दिन खिलौना बेबी डॉल की देखभाल करनी पड़ रही है ताकि वे माता-पिता की जिम्मेदारियों और संघर्षों को बेहतर तरीके से समझ सकें।
पहली नजर में यह दृश्य काफी अलग और चौंकाने वाले लगते हैं। वायरल वीडियो में किशोर छात्र गोद में गुड़िया लेकर धीरे-धीरे चलते दिखाई दे रहे हैं। कुछ छात्र बार-बार बैठकर छोटे बच्चों को चलाना सिखाने की एक्टिंग कर रहे हैं, जबकि कुछ “बेबी” को लंबी दूरी तक उठाकर ले जाते दिख रहे हैं। हालांकि इन वीडियो के पीछे एक बड़ा शैक्षणिक प्रयोग छिपा है, जिसका मकसद यह समझना है कि उन किशोरों में सहानुभूति और जिम्मेदारी की भावना कैसे विकसित की जाए जो परिवार, अनुशासन और जिम्मेदारियों से भावनात्मक रूप से दूर हो चुके हैं।
कौन सा चीनी स्कूल कर रहा है यह प्रयोग?
जियांगसू प्रांत का Yuanzhong Special Education School इस वायरल प्रयोग को चला रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्कूल छात्रों को एक सप्ताह तक बेबी डॉल को साथ रखने और उसकी देखभाल करने के लिए कह रहा है। यह गतिविधि अनुभव आधारित शिक्षा का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य छात्रों में धैर्य, सहानुभूति और माता-पिता के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना है।
बताया गया है कि यह स्कूल उन किशोरों के साथ काम करता है जो व्यवहार संबंधी समस्याओं, इंटरनेट गेमिंग की लत, पढ़ाई में रुचि की कमी, आक्रामक व्यवहार और अनुशासनहीनता जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
पूरे दिन डॉल की देखभाल करने को कहा गया
वायरल वीडियो में छात्र क्लासरूम, लंच ब्रेक और कैंपस में हर जगह डॉल को साथ लेकर चलते दिखाई देते हैं। कुछ क्लिप्स में छात्र झुककर और बैठ-बैठकर चल रहे हैं ताकि यह दिखाया जा सके कि माता-पिता छोटे बच्चों को चलना कैसे सिखाते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इन डॉल्स का वजन करीब 2.5 किलोग्राम रखा गया है ताकि छात्रों को बच्चों की देखभाल का वास्तविक अनुभव महसूस हो सके।
मीडिया रिपोर्ट्स में एक छात्र ने कहा, “इस तरह 1 किलोमीटर चलने के बाद मेरे पैरों में सुन्नपन महसूस होने लगा। अब मुझे समझ आया कि मेरे माता-पिता कितनी मुश्किलों का सामना करते हैं।” इस बयान से साफ है कि स्कूल का यह प्रयोग छात्रों को माता-पिता के संघर्ष का वास्तविक अनुभव देने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि सोशल मीडिया पर इसको लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। एक यूजर ने मजाकिया अंदाज में लिखा, “कई साल बाद जब ये बच्चे इस अनुभव को याद करेंगे, तो शायद वे खुद बच्चे पैदा न करने का फैसला करें।” यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि छात्र इस अनुभव को किस नजरिए से देखते हैं।
स्कूल का दावा, पारंपरिक अनुशासन के तरीके असरदार नहीं
रिपोर्ट्स में स्कूल के प्रिंसिपल का सरनेम डू बताया गया है। उनका कहना है कि बेहद विद्रोही स्वभाव वाले किशोरों पर पारंपरिक अनुशासनात्मक तरीके अक्सर असरदार साबित नहीं होते। इसलिए स्कूल अनुभव आधारित गतिविधियों का इस्तेमाल कर रहा है।
प्रिंसिपल के मुताबिक, इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों को यह समझाना है कि बच्चों की परवरिश करना कितना चुनौतीपूर्ण होता है और माता-पिता किन जिम्मेदारियों से गुजरते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एक शिक्षक ने छात्रों से कहा, “आप अपने माता-पिता को तभी सही मायनों में समझते हैं जब आप खुद बच्चे की परवरिश करते हैं। आज से Yuanzhong School का हर छात्र अपने ‘बेबी’ की देखभाल करेगा। पूरे एक सप्ताह तक आपको उसके खाने, सोने और रात की जरूरतों का ध्यान रखना होगा।”
कई अभिभावकों ने किया समर्थन
कुछ अभिभावकों ने इस पहल का समर्थन भी किया है। एक मां ने बताया कि इस अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद उनके बेटे को पैरेंटिंग की जिम्मेदारियों का एहसास हुआ। उन्होंने कहा कि मांएं अक्सर बच्चों को उठाकर घर के दूसरे काम भी संभालती हैं और डॉल का वजन उनके बेटे को उस अनुभव को समझने में मदद कर पाया।
सोशल मीडिया पर बंटी राय
इस कार्यक्रम को लेकर इंटरनेट पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने इस तरीके की तारीफ करते हुए कहा कि इससे किशोरों में जिम्मेदारी, धैर्य और सहानुभूति विकसित हो सकती है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि खिलौना डॉल की देखभाल असली पैरेंटिंग की कठिनाइयों को पूरी तरह नहीं दिखा सकती।
कुछ आलोचकों ने ऐसे प्रयोगों के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को लेकर भी सवाल उठाए। वहीं कुछ यूजर्स ने मजाक में कहा कि यह अनुभव युवाओं को भविष्य में माता-पिता बनने से दूर कर सकता है।
फिलहाल यह मामला आधुनिक अनुशासन पद्धतियों, पैरेंटिंग एजुकेशन, किशोर व्यवहार प्रबंधन और स्कूलों में अपनाए जा रहे वैकल्पिक शिक्षा तरीकों पर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है।




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