एक समय था जब पढ़ाई के दौरान घूमने-फिरने को पढ़ाई में रुकावट माना जाता था। विद्यार्थी पूरे शैक्षणिक सत्र में पढ़ाई करते थे और छुट्टियों के दौरान कहीं घूमने जाते थे। लेकिन अब नई पीढ़ी यानी Gen Z के युवाओं के जीवन में यात्रा का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। उनके लिए घूमना केवल मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि नई संस्कृतियों, जीवनशैली और अनुभवों को समझने का एक तरीका भी बन गया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या युवाओं की बदलती पसंद भविष्य में शिक्षा के तरीके को भी प्रभावित कर सकती है? क्या स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई को कक्षा और किताबों से बाहर ले जाने की जरूरत है?
भारत के युवाओं के बीच भी घूमने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। Airbnb की 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल 10 में से 7 लोग साल में एक लंबी छुट्टी के बजाय कई छोटी यात्राएं करना पसंद करते हैं। कई युवा पारंपरिक पर्यटन स्थलों को देखने के बजाय स्थानीय इलाकों, वहां की संस्कृति और लोगों के जीवन को करीब से समझना चाहते हैं।
हालांकि, यह आंकड़ा भारत के सभी युवाओं की पसंद का प्रतिनिधित्व नहीं करता, लेकिन इससे Gen Z की बदलती यात्रा संबंधी पसंद का अंदाजा जरूर मिलता है।
जब पूरी दुनिया बन जाए पढ़ाई का एक नया माध्यम
किसी विद्यार्थी को भारतीय इतिहास पढ़ाते समय किताबों में प्राचीन इमारतों, सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक आंदोलनों के बारे में जानकारी दी जाती है। लेकिन जब वही विद्यार्थी किसी ऐतिहासिक इमारत, संग्रहालय या पुरातात्विक स्थल पर जाता है, तो उसे विषय को समझने का एक नया अनुभव मिलता है। वह उन इमारतों को अपनी आंखों से देख सकता है, उनके आसपास के माहौल को समझ सकता है और किताबों में पढ़ी गई बातों को वास्तविक जीवन से जोड़ सकता है।
यही तरीका दूसरे विषयों की पढ़ाई में भी अपनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई विद्यार्थी किसी कृषि प्रधान गांव में जाता है, तो उसे खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका को समझने का मौका मिल सकता है। किसी समुद्री तटीय क्षेत्र की यात्रा से वह समुद्री जीव-जंतुओं, पर्यावरण संरक्षण और मछुआरा समुदाय के जीवन के बारे में जान सकता है।
इसी तरह, किसी बड़े कारोबारी केंद्र में जाकर विद्यार्थी यह समझ सकते हैं कि कंपनियां कैसे काम करती हैं, बाजार में वस्तुओं की मांग कैसे बनती है और ग्राहक किसी उत्पाद या सेवा का चुनाव कैसे करते हैं।
इस तरह विद्यार्थी किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ पाते हैं। शिक्षा की इस पद्धति को अनुभव आधारित शिक्षा (Experiential Learning) कहा जाता है।
घूमने-फिरने का बढ़ता चलन शिक्षा के भविष्य को कैसे प्रभावित कर सकता है?
युवाओं में यात्रा के प्रति बढ़ती रुचि स्कूलों और कॉलेजों को पढ़ाई के नए तरीकों पर विचार करने का अवसर देती है। शैक्षणिक संस्थान विद्यार्थियों को केवल कक्षा में पढ़ाने के बजाय ऐसे अनुभव भी दे सकते हैं, जिनसे वे अपने आसपास की दुनिया को समझ सकें।
किताबों से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन से जुड़ सकेगी पढ़ाई
किताबों में पढ़ी गई जानकारी को वास्तविक उदाहरणों के माध्यम से समझना विद्यार्थियों के लिए अधिक आसान हो सकता है। उदाहरण के लिए, भूगोल की पढ़ाई के दौरान विद्यार्थी अलग-अलग क्षेत्रों की जमीन, जलवायु और प्राकृतिक वातावरण को करीब से देख सकते हैं। वहीं, अर्थशास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थियों को स्थानीय बाजारों, उद्योगों और लोगों की आजीविका को समझने का अवसर मिल सकता है।
इससे पढ़ाई केवल याद करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विद्यार्थी यह भी समझ पाएंगे कि पढ़ाई में सीखी गई बातें उनके आसपास की दुनिया में किस तरह काम आती हैं।
अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं को समझने का मौका
भारत भाषाओं, परंपराओं, समुदायों और जीवनशैली की विविधता वाला देश है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की यात्रा करने से विद्यार्थियों को देश की इस विविधता को करीब से जानने का अवसर मिल सकता है।
दूसरे क्षेत्रों के लोगों से मिलने और उनकी परंपराओं को समझने से विद्यार्थियों में दूसरों के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और आपसी समझ विकसित हो सकती है। इससे वे समाज में मौजूद अलग-अलग विचारों और जीवनशैली को बेहतर तरीके से स्वीकार करना भी सीख सकते हैं।
जीवन के लिए जरूरी कौशल विकसित होंगे
यात्रा के दौरान विद्यार्थियों को बजट बनाना, समय का ध्यान रखना, रास्तों की जानकारी जुटाना और जरूरत के अनुसार फैसले लेना पड़ता है। ऐसे अनुभवों से उनमें आत्मनिर्भरता, समस्या का समाधान करने की क्षमता, संवाद कौशल और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की समझ विकसित हो सकती है।
ये सभी कौशल केवल पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि भविष्य में नौकरी और व्यावसायिक जीवन में भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
करियर चुनने में मिलेगी मदद
कई बार विद्यार्थियों को अपने पसंदीदा करियर के बारे में केवल किताबों से जानकारी मिलती है। लेकिन संबंधित क्षेत्र का वास्तविक अनुभव उन्हें बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकता है।
उदाहरण के लिए, पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी किसी जैव विविधता केंद्र में विशेषज्ञों के साथ जाकर इस क्षेत्र को समझ सकते हैं। होटल और पर्यटन उद्योग में रुचि रखने वाले विद्यार्थी होटलों और पर्यटन से जुड़ी कंपनियों के कामकाज को करीब से देख सकते हैं।
इसी तरह, प्रयोगशालाओं, अदालतों, खेतों, संग्रहालयों और औद्योगिक इकाइयों का शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों को यह समझने में मदद कर सकता है कि उनकी पसंद का पेशा वास्तविक दुनिया में किस तरह काम करता है।
क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस बदलाव के लिए तैयार है?
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में अनुभव आधारित शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया गया है। इसमें विद्यार्थियों को केवल रटकर पढ़ने के बजाय गतिविधियों के माध्यम से सीखने के अवसर देने पर जोर दिया गया है।
नई शिक्षा नीति में व्यावहारिक गतिविधियों, कला आधारित शिक्षा, खेल आधारित शिक्षा और अलग-अलग विषयों को जोड़कर पढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके साथ ही विद्यार्थियों में तार्किक सोच, रचनात्मकता और विषयों की व्यावहारिक समझ विकसित करने पर भी जोर दिया गया है।
इसका मतलब है कि स्कूल और कॉलेज विद्यार्थियों को अपने आसपास के वातावरण से सीखने के अधिक अवसर दे सकते हैं। इसके लिए शैक्षणिक भ्रमण, सामुदायिक परियोजनाएं, प्रकृति अध्ययन, स्थानीय संस्थानों का दौरा और उद्योगों से जुड़े लोगों के साथ बातचीत जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं।
हालांकि, केवल किसी स्थान पर घूमने चले जाने से वह यात्रा शैक्षणिक अनुभव नहीं बन जाती। इसके लिए जरूरी है कि विद्यार्थियों को वहां चीजों को ध्यान से देखने, सवाल पूछने, लोगों से बातचीत करने और अपने अनुभवों पर विचार करने का अवसर मिले।
शिक्षक इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे यात्रा से पहले विद्यार्थियों को संबंधित विषय की जानकारी दे सकते हैं और भ्रमण के दौरान गतिविधियां आयोजित कर सकते हैं। यात्रा के बाद चर्चा, शोध और प्रोजेक्ट के माध्यम से विद्यार्थियों के अनुभवों को पढ़ाई से जोड़ा जा सकता है।
वर्ष 2025 में किए गए एक अध्ययन में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच शैक्षणिक पर्यटन के प्रभावों का विश्लेषण किया गया था। इसमें विद्यार्थियों की सोच, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और व्यवहार में होने वाले बदलावों जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया गया।
क्या हर विद्यार्थी के लिए यात्रा के माध्यम से सीखना संभव है?
यात्रा को शिक्षा का हिस्सा बनाने की बात जितनी उपयोगी लगती है, इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। घूमने-फिरने में पैसा खर्च होता है, समय लगता है और सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था भी जरूरी होती है। हर परिवार के लिए अपने बच्चों को नियमित रूप से अलग-अलग जगहों पर भेजना संभव नहीं है। विदेश यात्रा तो बहुत से परिवारों की पहुंच से बाहर है।
ऐसे में यदि स्कूल और कॉलेज यात्रा को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बना देते हैं, तो आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के विद्यार्थियों को अधिक अवसर मिल सकते हैं। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थी पीछे रह सकते हैं।
इसलिए अनुभव आधारित शिक्षा के लिए लंबी दूरी की यात्रा या महंगे पर्यटन को जरूरी नहीं बनाया जाना चाहिए। स्थानीय संग्रहालय, ऐतिहासिक स्थल, आसपास के गांव, सरकारी संस्थान, प्राकृतिक क्षेत्र और सामुदायिक संगठन भी विद्यार्थियों के लिए सीखने के अच्छे माध्यम बन सकते हैं।
स्कूल और कॉलेज कम खर्च वाले शैक्षणिक भ्रमण और स्थानीय स्तर पर सामुदायिक गतिविधियों का आयोजन कर सकते हैं। इससे आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अधिक से अधिक विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन से सीखने का अवसर मिलेगा।
शिक्षा को कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकालने की जरूरत
Gen Z के युवाओं में घूमने-फिरने की बढ़ती रुचि यह दिखाती है कि वे दुनिया को केवल किताबों और इंटरनेट के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने अनुभवों से भी समझना चाहते हैं। लेकिन यात्रा का असली फायदा तभी है, जब विद्यार्थी वहां से कुछ नया सीखकर लौटें और उस अनुभव को अपने ज्ञान से जोड़ सकें।
इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में स्कूलों की जरूरत खत्म हो जाएगी या किताबों का महत्व कम हो जाएगा। बल्कि जरूरत इस बात की है कि किताबी ज्ञान और वास्तविक जीवन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए।
यदि शैक्षणिक संस्थान सही योजना के साथ यात्राओं, स्थानीय भ्रमण और व्यावहारिक गतिविधियों को पढ़ाई का हिस्सा बनाते हैं, तो विद्यार्थियों को विषयों को गहराई से समझने में मदद मिल सकती है।
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान घूमने जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उनके आसपास की दुनिया को उनकी शिक्षा और सीखने का एक सार्थक हिस्सा कैसे बनाया जाए।




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