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बिहार में बुनकरों का यह गांव बन गया इंजीनियर्स का गढ़

बिहार के गया जिले के मानपुर प्रखंड में स्थित पटवा टोली अब केवल बुनकरों का गांव नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग टैलेंट का केंद्र बन चुका है। वर्षों पहले तक इस गांव की पहचान केवल बुनकर समुदाय और हथकरघा उद्योग से जुड़ी थी, लेकिन आज यह गांव देशभर में इंजीनियरिंग परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए मिसाल बन गया है।

जेईई मेन्स 2025 में जबरदस्त सफलता
पटवा टोली के 40 होनहार छात्रों ने जेईई मेन्स सेशन-2, 2025 में सफलता हासिल की है, जिनमें से 18 छात्र अब जेईई एडवांस्ड की तैयारी में जुटे हैं। यह आंकड़ा न केवल गांव की उपलब्धि को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद कैसे मेहनत और सामूहिक प्रयास एक गांव की तस्वीर बदल सकते हैं।

शानदार प्रदर्शन करने वाले छात्र
गांव की छात्रा शरण्या ने 99.64 पर्सेंटाइल स्कोर कर सभी को चौंका दिया। वहीं अशोक (97.7), यश राज (97.38), शुभम कुमार और प्रतीक (96.55), केतन (96.00), निवास (95.7) और सागर कुमार (94.8) जैसे कई छात्रों ने भी शानदार अंक हासिल किए।

सफलता के पीछे संघर्ष की कहानियां
इन सफलताओं के पीछे कई प्रेरणादायक कहानियां छुपी हैं। सागर कुमार की कहानी विशेष रूप से दिल को छूने वाली है। बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया। मां ने गांव में ही सूत काटने का काम शुरू किया और बेटे को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज सागर ने जेईई मेन्स पास कर दिखा दिया कि सपनों को पाने के लिए हालात नहीं, हौसले मायने रखते हैं।

सागर कहते हैं, “मैं इंजीनियर बनकर देश की सेवा करना चाहता हूं। मां का संघर्ष मेरी प्रेरणा है।”

वृक्ष संस्था का योगदान
पटवा टोली की इस सफलता के पीछे ‘वृक्ष’ संस्था की अहम भूमिका है। यह संस्था गांव के बुनकर परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा, कोचिंग और मार्गदर्शन प्रदान करती है। वृक्ष के प्रयासों ने ही पटवा टोली के बच्चों में नई उम्मीद, आत्मविश्वास और प्रतिस्पर्धा की भावना जगाई है। हर साल इस संस्था की मदद से 40 से 60 छात्र जेईई मेन्स जैसे कठिन परीक्षा को पास कर रहे हैं।

गांव बना इंजीनियरों की फैक्ट्री
पटवा टोली की बढ़ती सफलता को देखकर लोग अब इसे “इंजीनियरों की फैक्ट्री” कहने लगे हैं। यहां तक कि बिहार ही नहीं, देश के अन्य राज्यों के छात्र भी इस गांव में आकर पढ़ाई करते हैं। यहां की पढ़ाई का माहौल, अनुशासन और आपसी सहयोग ने इसे एक आदर्श शैक्षिक केंद्र बना दिया है।

बदलते बिहार की पहचान
पटवा टोली न केवल गया या बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बन चुका है। यह गांव दिखाता है कि अगर सामुदायिक प्रयास, सही मार्गदर्शन और शिक्षा के प्रति लगन हो, तो कोई भी गांव अपनी पहचान बदल सकता है।

Asmita Sarkar

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