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भारत की कृषि शिक्षा में नई क्रांति: जब खेतों तक पहुँचा डिजिटल ज्ञान

भारत का कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है— यही आधी आबादी की रोज़ी-रोटी और खाद्य सुरक्षा का आधार भी है। लेकिन अब यह क्षेत्र मौसम के बदलते पैटर्न, सीमित संसाधनों और तकनीकी क्रांति की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में ज़रूरत थी एक ऐसी पहल की, जो परंपरा के साथ डेटा, डिजिटल उपकरणों और आधुनिक कौशलों को भी खेती का हिस्सा बनाए।

 

इसी उद्देश्य से, भारत सरकार ने 2017 में विश्व बैंक के सहयोग से “राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (NAHEP)” की शुरुआत की। इस पहल ने देश के 74 कृषि विश्वविद्यालयों में शिक्षा को नए युग के अनुरूप ढालने का काम किया—

पाठ्यक्रमों का नवीनीकरण, प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण, और डिजिटल, अनुभव-आधारित सीखने को केंद्र में रखा गया।

 

ड्रोन लैब से आसमान तक — गायत्री की उड़ान

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बटूर की 25 वर्षीय गायत्री जब पहली बार ड्रोन लैब पहुँचीं, तो उन्हें लगा कि उनकी शिक्षा सचमुच उड़ान भर रही है।

वह बताती हैं— “मैंने ड्रोन तकनीक को चलाना, संभालना और कीटनाशक व उर्वरक के छिड़काव में उसका उपयोग करना सीखा। अब मैं ड्रोन प्रशिक्षक बन चुकी हूँ और किसानों को सटीक समाधान देने का सपना देखती हूँ।”

 

गायत्री जैसे छात्र अब डिजिटल उपकरणों के माध्यम से सटीक खेती (Precision Agriculture) में विशेषज्ञ बन रहे हैं।

 

असम से वर्चुअल कक्षा तक — कविता की कहानी

असम के एक गाँव में 23 वर्षीय कविता अपनी छोटी बैठकी से वर्चुअल कक्षाओं में शामिल होती हैं। स्क्रीन पर उपग्रह चित्रों और रंगीन पिक्सेल्स के बीच, वह रिमोट सेंसिंग और ड्रोन नियंत्रण सीखती हैं।

 

वह कहती हैं— “अब मैं घर बैठे उपग्रह चित्रों की व्याख्या कर सकती हूँ और दूर से ड्रोन चला सकती हूँ। इससे किसानों को उर्वरक और पानी का सटीक उपयोग करने में मदद मिलती है।”

 

वर्चुअल कक्षाओं ने उनके लिए नई दुनिया के दरवाज़े खोल दिए हैं — अब विशेषज्ञ सीधे स्क्रीन पर मौजूद हैं और शिक्षा वहाँ तक पहुँच चुकी है जहाँ पहले पहुँचना मुश्किल था।

कविता का विश्वास है कि “असम की मिट्टी में नई हरित क्रांति की संभावना है, बस बीज के रूप में ज्ञान और तकनीक चाहिए।”

 

नई सोच के साथ नए पाठ्यक्रम

पंतनगर की स्नातक वर्तिका गुप्ता बताती हैं— “अब समझ में आता है कि खेती का मतलब सिर्फ़ फ़सल और पशुधन नहीं है। इसमें जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और सतत जीवन के समाधान भी शामिल हैं।”

 

अब कृषि शिक्षा बहुविषयक बन चुकी है। देशभर में 600 से अधिक नए पाठ्यक्रम शुरू हुए हैं — जिनमें उद्यमिता, एग्री-बिज़नेस एनालिटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स और सटीक कृषि जैसे विषय शामिल हैं। साथ ही 79 पुराने विषयों को नए रूप में ढाला गया है ताकि छात्रों को केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि काम आने वाली असली दक्षता भी मिले।

 

क्यों ज़रूरी था यह बदलाव

पहले कृषि शिक्षा समय से पीछे रह गई थी— पाठ्यक्रम बदलती ज़रूरतों से मेल नहीं खा रहे थे, और स्नातक छात्रों में समस्या-समाधान तथा तकनीकी दक्षता की कमी दिखती थी। भारत को कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में हर साल लगभग 10 लाख प्रशिक्षित स्नातकों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में यह संख्या आधी भी नहीं है।

तमिलनाडु के पशु विज्ञान विश्वविद्यालय की छात्रा भारतीबेन कहती हैं— “खेती को मज़बूत और आधुनिक बनाने के लिए हमारे जैसे कुशल युवाओं की अभी बहुत कमी है।”

 

सुधार के बीज: NAHEP की भूमिका

विश्व बैंक के सहयोग से ICAR ने 74 कृषि विश्वविद्यालयों को आधुनिकता की नई दिशा दी —

– पाठ्यक्रमों का नवीनीकरण

– शिक्षा के तरीकों में सुधार

– डिजिटल लर्निंग का विस्तार

– प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण

 

छात्र अब GPS, ड्रोन, और रिमोट सेंसिंग तकनीक का प्रशिक्षण ले रहे हैं ताकि उनका सीखा हुआ ज्ञान सीधे खेतों और उद्योगों में उपयोग हो सके।

भारतीबेन बताती हैं — “डिजिटल सिमुलेशन मॉडल से हम पशु चिकित्सा की जटिल तकनीकें सीखते हैं। इससे किसानों की चुनौतियों को हल करने में आत्मविश्वास बढ़ा है।”

 

वैश्विक अवसरों की ओर कदम

थंजावुर के छात्र प्रगदीश, जो बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर्स कर रहे हैं, ने ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूकासल में इंटर्नशिप की।

वह कहते हैं — “मुझे ऐसे शोध और नवाचार में दिलचस्पी है जो छोटे किसानों की ज़िंदगी बदल सके।”

 

उनके साथी छात्र अब जापान, इसराइल, जर्मनी और सऊदी अरब जैसे देशों में प्रशिक्षण ले रहे हैं — यानी भारतीय कृषि शिक्षा अब वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रही है।

 

नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहन

कृषि विश्वविद्यालयों में स्थापित इनक्यूबेशन सेंटर छात्रों के नवाचारी विचारों को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं — वे उन्हें निवेशकों से जोड़ते हैं, मार्गदर्शन देते हैं और आइडिया से बाज़ार तक पहुँचने में सहयोग करते हैं।

 

अब तक 120 से अधिक कृषि स्टार्टअप्स शुरू हो चुके हैं, जिन्होंने न सिर्फ़ रोजगार सृजित किए हैं बल्कि किसानों तक नई तकनीकी समाधान भी पहुँचाए हैं।

तिरुचिरापल्ली के रमेश बताते हैं — “हम 100 से ज़्यादा किसानों से सीधे उपज ख़रीदते हैं और 25 संस्थानों तक सप्लाई करते हैं। हमने पाँच कृषि स्नातकों को रोज़गार दिया है और 20 अन्य लोगों को काम दे रहे हैं।”

 

उनका कारोबार अब 2.5 करोड़ रुपये सालाना है, जिसे वे तमिलनाडु में फैलाकर 30 करोड़ रुपये तक ले जाने की योजना बना रहे हैं।

 

परिवर्तन की जड़ें — शिक्षा से खेत तक

असम, ओडिशा और कर्नाटक में हुए ICAR–विश्व बैंक सर्वे के अनुसार, 75% से 94% छात्र मानते हैं कि AI, मशीन लर्निंग और डिजिटल उपकरण, आधुनिक कृषि के लिए अनिवार्य कौशल हैं।

 

विश्व बैंक के विशेषज्ञ बेकज़ोद शम्सीएव और फ़ारबोद यूसुफ़ी बताते हैं — “अब छात्र खुद करके सीख रहे हैं — फसलों के रोग पहचानने के लिए AI, सटीक खेती के लिए रिमोट सेंसिंग और आपूर्ति श्रृंखला के लिए ब्लॉकचेन का इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी शिक्षा किताबों से निकलकर खेतों तक पहुँच चुकी है।”

 

NAHEP के राष्ट्रीय निदेशक और पूर्व उपमहानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. आर. सी. अग्रवाल कहते हैं — “इस परियोजना ने भारत में कृषि शिक्षा के नए मानक तय किए हैं — इसे अधिक प्रासंगिक, कौशल-केंद्रित और युवाओं के लिए आकर्षक बनाया है।”

यानी भारत की नई कृषि शिक्षा अब केवल खेती सिखाने तक सीमित नहीं है —

यह छात्रों को नवाचार, उद्यमिता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रही है।

यह बदलाव न सिर्फ़ खेतों में नई हरियाली, बल्कि युवाओं के करियर में नई चमक भी ला रहा है।

 

एडइनबॉक्स टीम

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