
कुकुरमुत्ते की तरह उगते डमी स्कूलों को लेकर सरकार ने सीबीएसई (CBSE) को सचेत किया है। देश में तेजी से बढ़ रहे डमी स्कूलों के कल्चर को वह भविष्य के लिए खतरे के तौर पर देख रही है। लिहाजा, कड़ा रुख अपनाते हुए शिक्षा मंत्रालय ने CBSE को ऐसे स्कूलों की पहचान कर कार्रवाई तेज करने को कहा है।
दरअसल, लगातार ऐसी शिकायतें और मामले सामने आ रहे हैं कि पैरंट्स अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूलों से निकाल कर डमी स्कूलों में दाखिला दिलवा रहे हैं। इन स्कूलों में छात्रों को रोज़ाना हाजिरी नहीं लगानी पड़ती। यानी बच्चा स्कूल भी नहीं जाता और पास भी हो जाता है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तभी डमी स्कूलों को फर्जी स्कूल तक करार दे दिया था। उनका कहना था कि जैसे ही बच्चे कोचिंग सेंटरों में आते हैं, उन्हें फर्जी स्कूल (डमी स्कूल) में डाल दिया जाता है। इसमें केवल कोचिंग सेंटरों की गलती नहीं है, इसके लिए पेरेंट्स भी उतने ही जिम्मेदार हैं।
ऐसे में पहले तो यही सवाल उठता है कि आखिर डमी स्कूल है क्या? डमी स्कूल का मतलब ऐसे स्कूलों से है जहां स्टूडेंट एडमिशन तो लेता है पर उसे रोज स्कूल नहीं जाना पड़ता। इससे छात्र जेईई मेन, जेईई एडवांस और नीट जैसी परीक्षाओं की तैयारी पर ज्यादा फोकस कर पाता है। वहीं रेगलुर स्कूल में स्टूडेंट रोज स्कूल जाता है और उसकी अटेंडेंस भी लगती है।
अच्छे स्कूलों में छात्र के लिए 75 फीसदी हाजिरी का नियम लागू होता है लेकिन कोचिंग के चक्कर में छात्र स्कूल जाना नहीं चाहता तो पैरंट्स बच्चे को अच्छे स्कूल से भी निकाल देते हैं। फिर वह छात्र सिर्फ कोचिंग सेंटरों में ही पढ़ाई करता है और डमी स्कूल में उसका एडमिशन चलता रहता है। डमी स्कूल में छात्र जाता ही नहीं है। इसके बावजूद उसे परीक्षा में बैठाया जाता है और वे पास भी हो जाते हैं।
लेकिन डमी स्कूलों का यह कल्चर न केवल शिक्षा के नियमों के खिलाफ है बल्कि सीबीएसई के 75% अटेंडेंस के नियम का भी सीधे-सीधे उल्लंघन है। सीबीएसई मान्यता प्राप्त स्कूल कोचिंग सेंटरों से मोटी रकम लेकर ऐसा कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय द्वारा डमी स्कूलों की पहचान कर सीबीएसई को इसके खिलाफ सख्त एक्शन लेने को कहा गया है।
शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि स्टूडेंट्स इंजीनियरिंग-मेडिकल और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए केवल कोचिंग सेंटरों के भरोसे नहीं रह सकते। उन्हें स्कूल जाना ही होगा। मंत्रालय के कड़े रुख और दबाव के आगे हाल ही में CBSE ने देशभर के ऐसे करीब 20 स्कूलों की मान्यता रद्द भी की है। 3 स्कूलों को डाउनग्रेड किया गया है। इन स्कूलों में राजस्थान, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, असम, मध्य प्रदेश, यूपी, केरल, उत्तराखंड और दिल्ली तक के स्कूल शामिल हैं। CBSE की जांच में कुछ स्कूलों में डमी छात्रों का डेटा भी पाया गया।
शिक्षाविद दयानन्द वत्स का कहना है कि 12वीं के बाद इंजीनियरिंग, मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट या फिर यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए CUET टेस्ट हों, सभी में NCERT का सिलेबस आता है। स्कूलों में अच्छे तरीके से सिलेबस पढ़ाया जाता है जबकि कोचिंग सेंटरों में स्कूलों की तरह नहीं पढ़ाया जाता है। उनका कहना है कि बच्चा कोचिंग करना चाहता है तो बेशक करे लेकिन स्कूल की कीमत पर ऐसा नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, हकीकत तो यही है कि रेगुलर स्कूल जाने वाले बच्चों को रोज कोचिंग सेंटर जाने के लिए वक्त निकालना मुश्किल होता है, इसलिए इन वर्षों में डमी स्कूल तेजी से पनपे हैं। खासकर वर्ष 2000 के बाद से डमी स्कूल तेजी से फैले हैं। दरअसल, वर्ष 1990 तक अधिकतर छात्र सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल या इंटरमीडिएट कॉलेज में पढ़ाई करते थे। बड़े शहरों में ऊंचे वर्ग के लोग अपने बच्चों को सीबीएसई एफिलिएटेड स्कूलों में भेजते थे। 1995 के बाद मिडिल क्लास के लोग अच्छे स्कूल और बेहतर सुविधाओं के चलते गांवों से शहरों की ओर जाने लगे। वर्ष 2000 के बाद इसकी रफ्तार बढ़ी।
हालत यह हो गयी कि निम्न आय वाली मिडिल क्लास फैमिली भी अपनी इनकम का 25-30% बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करने लगी। तभी वर्ष 2000 और 2005 के बीच कोचिंग संस्थान धड़ाधड़ खुलते गए जो स्टूडेंट्स और पेरेंट्स को सपने बेचने लगे। स्टूडेंट कोचिंग सेंटर और स्कूल के बीच बैलेंस नहीं बना पाया। और ऐसे समय में ही ‘डमी एडमिशन’ या ‘फ्लाइंग एडमिशन’ का कॉन्सेप्ट आया जो आज यह पूरे देश में फैल चुका है। विशेषकर साइंस के 20 से 25% स्टूडेंट्स डमी स्कूल में दाखिल लेकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ाई कर रहे हैं जबकि ह्यूमनिटीज के महज 1% हैं। कुछ रिपोर्ट से यह आंकड़ा सामने आया है।
इसके बरक्स एक बात और सामने आयी है कि इससे बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य खराब भी हो रहा है। वे एंग्जाइटी और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। स्कूल किसी छात्र को गढ़ता है, उसके जीवन को दिशा देता है। लेकिन इसके उलट डमी स्कूल के चक्कर में फंसे बच्चों को रेस में झोंक दिया गया है। वे दिन-रात बस पढ़ाई में लगे रहते हैं। नतीजतन, उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य खराब हो रहा है। शायद यही वजह है कि डमी स्कूलों को लेकर सरकार सचेत हुई है और सीबीएसई भी।




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