
भारत की शिक्षा व्यवस्था तेजी से दो समानांतर ढांचों के बीच बंटती जा रही है—औपचारिक स्कूल और तेजी से बढ़ता कोचिंग उद्योग। जो कभी पढ़ाई में अतिरिक्त मदद का साधन माना जाता था, वह अब कई मामलों में प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का मुख्य रास्ता बन चुका है। इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों के लिए आज कोचिंग सेंटर, स्कूल की कक्षा से ज्यादा भरोसेमंद माने जा रहे हैं। इस बदलाव ने न केवल यह तय किया है कि छात्र कहां पढ़ते हैं, बल्कि यह भी कि परिवार अपनी आय कैसे खर्च करते हैं और सफलता को कैसे मापा जाता है।
स्कूलों की घटती भूमिका
Birla Open Minds Education के मैनेजिंग डायरेक्टर निर्वाण बिड़ला के अनुसार, कोचिंग के बढ़ते प्रभाव ने स्कूलों की छवि को बदल दिया है। अब कई छात्र स्कूल को केवल औपचारिकता निभाने की जगह मानते हैं, जबकि कोचिंग संस्थान उन्हें बेहतर परिणाम देने वाले केंद्र लगते हैं। उनका मानना है कि इससे स्कूल अपनी मूल पहचान—समग्र विकास के केंद्र—को खोने के जोखिम में हैं। ऐसे में स्कूलों को कोचिंग से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय आलोचनात्मक सोच, अनुभव आधारित शिक्षा और छात्रों की सक्रिय भागीदारी पर ध्यान देना होगा।
यह अंतर इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि कोचिंग संस्थान वह सुविधा देते हैं, जो कई स्कूल अभी भी नहीं दे पा रहे—जैसे लक्ष्य आधारित तैयारी, नियमित प्रदर्शन आकलन और व्यक्तिगत परीक्षा रणनीति। निर्वाण बिड़ला कहते हैं कि जब छात्रों से पूछा जाता है कि वे सबसे ज्यादा कहां सीखते हैं, तो अब अधिकतर जवाब कोचिंग की ओर झुकता है। हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि स्कूलों की जिम्मेदारी है कि वे छात्रों को गहराई से, अर्थपूर्ण तरीके से और जीवनभर काम आने वाला ज्ञान दें।
सहयोग या प्रतिस्पर्धा?
कुछ शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कूल और कोचिंग के बीच संबंध पूरी तरह प्रतिस्पर्धात्मक नहीं है। Modern Public School की प्रिंसिपल अलका कपूर के अनुसार, कोचिंग संस्थान जहां विशेष परीक्षा तैयारी में मदद करते हैं, वहीं स्कूल बुनियादी ज्ञान, मूल्य और समग्र विकास सुनिश्चित करते हैं। उनके मुताबिक, दोनों मिलकर एक संतुलित शिक्षा तंत्र बना सकते हैं, जहां स्कूल जिज्ञासा को बढ़ावा देते हैं और कोचिंग संस्थान प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करते हैं।
आकांक्षाओं की अर्थव्यवस्था
यह हाइब्रिड मॉडल छात्रों और परिवारों की बढ़ती आकांक्षाओं को भी दर्शाता है। सीमित सीटों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अब परिवार कोचिंग फीस को खर्च नहीं, बल्कि निवेश के रूप में देखने लगे हैं। EventBeep के संस्थापक और CEO सौरभ मंगरुलकर के अनुसार, अभिभावक कोचिंग को बेहतर भविष्य का रास्ता मानते हैं, इसलिए उस पर खर्च करने को तैयार हैं। वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार ने इस मांग को और तेज किया है।
Dexian India के कंट्री हेड कुमार राजगोपालन के मुताबिक, उच्च शिक्षा में प्रवेश की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और परिवारों की निवेश करने की इच्छा ने इस बाजार को और बड़ा बनाया है। हालांकि वे चेतावनी देते हैं कि अगर इस व्यवस्था को संतुलित नहीं किया गया, तो निजी कोचिंग पर अत्यधिक निर्भरता सामाजिक और आर्थिक असमानता को बढ़ा सकती है।
यह चिंता अब और स्पष्ट हो रही है, खासकर बड़े शहरों में बढ़ती कोचिंग फीस और छोटे शहरों से छात्रों के शिक्षा केंद्रों की ओर पलायन के कारण। इससे एक समानांतर ‘शैडो एजुकेशन’ सिस्टम बन गया है, जहां परिवारों को दोहरी लागत उठानी पड़ती है—एक स्कूल फीस और दूसरी कोचिंग पर खर्च।
स्कूल क्यों पीछे रह गए?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्कूल इस दौड़ में पीछे क्यों रह गए। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों ने खुद को उतनी तेजी से नहीं बदला, जितनी तेजी से कोचिंग संस्थान आगे बढ़े। छात्रों का झुकाव स्वाभाविक रूप से उसी ओर होता है, जो उन्हें सीधे तौर पर उपयोगी लगता है।
कुमार राजगोपालन बताते हैं कि स्कूल आज भी सामाजिक विकास, साक्षरता और प्रमाणन में अहम भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का केंद्र अब बदल चुका है। इससे शिक्षा के दो अलग रास्ते बन गए हैं—एक कॉन्सेप्ट आधारित स्कूली शिक्षा और दूसरा परिणाम केंद्रित परीक्षा तैयारी।
सुधार की जरूरत
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नियम बनाने से यह समस्या हल नहीं होगी। स्कूलों के भीतर संरचनात्मक बदलाव ज्यादा जरूरी हैं। निर्वाण बिड़ला पाठ्यक्रम में बदलाव, मूल्यांकन प्रणाली में सुधार और एप्लिकेशन आधारित सीखने पर जोर देने की बात करते हैं। वहीं अलका कपूर का मानना है कि अगर स्कूल परीक्षा केंद्रित अभ्यास को अपनी पढ़ाई में शामिल करें, तो दोनों सिस्टम के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है।
सौरभ मंगरुलकर के अनुसार, भारत में दो अलग-अलग सिस्टम छात्रों के समय और परिवार के पैसे के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं करने चाहिए। स्कूलों को ज्यादा प्रैक्टिकल और परिणाम आधारित बनना होगा, ताकि वे कक्षा के बाहर होने वाले मूल्यांकन के अनुरूप खुद को ढाल सकें।
बदलते बाजार का संकेत
कोचिंग का बढ़ता प्रभाव सिर्फ शिक्षा की कहानी नहीं है, बल्कि यह बाजार की मांग, संस्थागत कमियों और बदलते उपभोक्ता व्यवहार का संकेत भी है। जब तक अभिभावक यह मानते रहेंगे कि सफलता स्कूल के बाहर मिलती है, तब तक निवेश भी उसी दिशा में जाता रहेगा।
आने वाले समय में वही संस्थान टिक पाएंगे, जो बेहतर परिणाम के साथ वास्तविक सीखने का संतुलन बना सकें। स्कूलों के लिए अब चुनौती केवल अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की नहीं, बल्कि उसे नए सिरे से स्थापित करने की है।




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