
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद Central Board of Secondary Education (CBSE) द्वारा दो-बोर्ड परीक्षा मॉडल लागू करने के फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या अतिरिक्त परीक्षा अवसर मिलने से छात्रों की निजी कोचिंग पर निर्भरता कम हो पाएगी।
नई व्यवस्था के तहत छात्रों को एक ही शैक्षणिक सत्र के भीतर बोर्ड परीक्षा देने के लिए एक से अधिक मौके मिलेंगे। यह कदम उस व्यापक नीति सोच के अनुरूप है, जिसमें परीक्षा के दबाव को कम करने और मूल्यांकन प्रणाली को अधिक लचीला बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
कोचिंग कल्चर पर पुराना प्रभाव
पिछले कई वर्षों से बोर्ड परीक्षाएं एक समानांतर कोचिंग व्यवस्था को बढ़ावा देती रही हैं, खासकर शहरों में, जहां परिवार ट्यूशन, मॉक टेस्ट और रिवीजन प्रोग्राम पर भारी खर्च करते हैं। बोर्ड परीक्षा के दबाव ने इस कोचिंग कल्चर को और मजबूत किया है।
दूसरे मौके से दबाव कम होने की उम्मीद
दो-बोर्ड मॉडल के समर्थकों का मानना है कि दूसरा मौका मिलने से एक ही परीक्षा पर निर्भरता कम होगी। अगर कोई छात्र पहली बार में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाता है, तो उसे पूरे साल इंतजार किए बिना अपने अंक सुधारने का अवसर मिलेगा। इससे परीक्षा से पहले होने वाली जल्दबाजी में कोचिंग या क्रैश कोर्स में दाखिला लेने की प्रवृत्ति भी कम हो सकती है।
लगातार सीखने को मिल सकता है बढ़ावा
यह मॉडल छात्रों को अंतिम समय की तैयारी के बजाय पूरे साल नियमित पढ़ाई के लिए प्रेरित कर सकता है। जब छात्रों को यह भरोसा होगा कि उनके पास एक और मौका है, तो स्कूल भी रटने के बजाय समझ पर आधारित पढ़ाई पर अधिक ध्यान दे सकते हैं।
क्या वाकई कम होगी कोचिंग पर निर्भरता?
हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इस बदलाव से कोचिंग पर निर्भरता वास्तव में कम होगी या नहीं। अतिरिक्त परीक्षा अवसर नई तरह की मांग भी पैदा कर सकते हैं। कुछ परिवार दोनों प्रयासों के लिए कोचिंग लेना पसंद कर सकते हैं, जिससे दबाव कम होने के बजाय प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है।
कोचिंग संस्थानों के लिए यह मॉडल नए अवसर भी खोल सकता है। लंबी तैयारी अवधि, स्कोर सुधार बैच और दोबारा परीक्षा देने वालों के लिए विशेष रणनीतियां उनके कारोबार को बढ़ा सकती हैं।
सिस्टम के लागू होने पर निर्भर करेगा असर
इस मॉडल का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे कैसे लागू किया जाता है। अगर स्कूल अपनी कक्षा शिक्षण, आंतरिक मूल्यांकन और अकादमिक काउंसलिंग को मजबूत करते हैं, तो छात्रों को बाहरी कोचिंग की जरूरत कम महसूस हो सकती है।
लेकिन अगर बोर्ड के अंक ही प्रवेश और स्कूल की रैंकिंग का मुख्य आधार बने रहते हैं, तो कोचिंग की मांग पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, चाहे परीक्षा के मौके कितने भी क्यों न हों।
संचालन से जुड़े नए सवाल
दो-बोर्ड प्रणाली स्कूलों, शिक्षकों और प्रशासन के सामने कई नए सवाल भी खड़े करती है, जैसे परीक्षा का शेड्यूल, सिलेबस का संतुलन और अकादमिक कैलेंडर का प्रबंधन।
छात्रों के लिए मनोवैज्ञानिक राहत
छात्रों के नजरिए से देखें तो इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा मानसिक दबाव में कमी के रूप में सामने आ सकता है। दूसरा मौका मिलने से एक ही दिन की परीक्षा का डर कम होगा और बीमारी, तनाव या अन्य परिस्थितियों से उबरने का अवसर मिलेगा।
भारत की परीक्षा प्रणाली लंबे समय से सुधार और दबाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रही है। CBSE का यह दो-बोर्ड मॉडल उसी दिशा में एक और कदम है। हालांकि, यह कोचिंग पर निर्भरता को कितना कम करेगा, यह नीति से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि छात्र, अभिभावक, स्कूल और शिक्षा बाजार इसे कैसे अपनाते हैं।




Add comment