Edinbox Hindi

चुनौती : शिक्षा-रोजगार के मुद्दों पर युवाओं में बढ़ रहा असंतोष

अभी हाल ही में आईआईटी कानपुर के एक पूर्व छात्र द्वारा दाखिल आरटीआई के हवाले से यह खबर आई थी कि देश के 23 आईआईटी के करीब 38 प्रतिशत छात्र अब तक बेरोजगार हैं। यानी इस वर्ष सभी 23 आईआईटी में 7,000  छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट के माध्यम से नौकरी नहीं मिली है। दो साल पहले यह आंकड़ा इसके लगभग आधा  था। कहने का तात्पर्य कि जहां रोजगार के लिए आवेदन करने वाले छात्र बढ़े हैं, वहीं दो साल में बेरोजगार छात्रों की संख्या भी 2.3 गुना बढ़ गई है।

बेरोज़गारी को लेकर महज यह ही  अकेला डराने वाला सच नहीं, हकीकत तो यह है कि भारत में शिक्षित युवाओं के बीच बेरोजगारी अब एक बड़ी चिंता का विषय बन चुकी है। और इसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बेरोज़गारी के आंकड़ों की और तह में जाएंगे तो इसकी बढ़ती भयावहता का और भी ज़्यादा वीभत्स रूप नज़र आएगा। 

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन एवं दिल्ली स्थित थिंक टैंक मानव विकास संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित इंडिया एंप्लॉयमेंट रिपोर्ट, 2024 के अनुसार, भारत के बेरोजगार कार्यबल में 83 फीसदी युवा हैं और कुल बेरोजगार आबादी में माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की हिस्सेदारी वर्ष 2000 में 35.2 फीसदी थी, जो 2022 में बढ़कर 65.7 फीसदी हो गई। यह रिपोर्ट भी बताती है कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी का स्तर काफी ऊंचा है। 

ऐसे में चार जून के बाद देश में कोई भी सत्ता में आए, उसे इन मुद्दों को अब नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। यह एक बड़ी चनौती के रूप में उसके सामने होगा। उसे हर हाल में इन कड़वी सच्चाइयों पर ध्यान देना ही होगा। हम महज युवा भारत का दम्भ भरकर और युवा देश की ताक़त हैं, युवा बदलेंगे देश का भविष्य जैसे नारे लगाकर उन्हें भ्रमित नहीं कर सकते। इसमें कोई शक नहीं कि भारत तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है,  जनसांख्यिकीय लाभांश उसके पास है लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए भी इस और विशेष ध्यान की ज़रूरत है। देश के युवा कार्यबल में आर्थिक विकास, नवाचार और उत्पादकता को बढ़ाने की क्षमता है। अफ़सोस, मौजूदा अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ते उच्च शिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त संख्या में उचित रोजगार सृजित नहीं कर पा रही है।
 
शिक्षा के स्तर के साथ युवा बेरोजगारी दर बढ़ रही है। स्नातक या उससे ज्यादा शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है और शिक्षित पुरुषों के मुकाबले शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी दर ज्यादा है। क्या भारत के श्रम बाजार में उनके लिए अवसर हैं, लेकिन शिक्षित युवाओं के लिए बेहतर गुणवत्ता वाली पर्याप्त नौकरी नहीं है? आंकड़े इसी तरफ इशारा करते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी वाली बात यह है कि गरीब परिवारों के शिक्षित युवा विशेष रूप से कठिन परिस्थितियों में हैं। 

 इंडिया एंप्लॉयमेंट रिपोर्ट, 2024 बताती है कि सबसे कम मासिक प्रति व्यक्ति व्यय क्वाइंटाइल (29.4 प्रतिशत) में माध्यमिक या उच्च-माध्यमिक शिक्षा वाले युवाओं के बीच बेरोजगारी दर उच्चतम क्वाइंटाइल (25.8 प्रतिशत) वाले युवाओं की तुलना में अधिक थी। यहां बता दें कि क्वाइंटाइल किसी आंकड़े को पांच बराबर भागों में विभाजित करती है। नतीजतन युवाओं के बीच उच्च बेरोजगारी दर आंशिक रूप से व्हाइट कॉलर जॉब की आकांक्षाओं के कारण हो सकती है, जो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। सबसे गरीब युवा, जिनके पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, संसाधनों और सामाजिक पूंजी का अभाव है, वे अधिक पीड़ित हैं।

चिंता की बात है कि हाशिये पर पड़े अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर अन्य पिछड़ा वर्ग या सामान्य श्रेणी के युवाओं की तुलना में ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सामाजिक रूप से हाशिये के युवाओं में उच्च बेरोजगारी उन चुनौतियों का संकेत देती है, जिनका सामना उन्हें बेहतर रोजगार की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए करना पड़ता है। यह प्रवृत्ति सामाजिक विषमताओं को कायम रखती है और सामाजिक रूप से ऊपर उठने में बाधा उत्पन्न करती है।

क्या उच्च शिक्षित युवाओं के लिए शिक्षा के स्तर और नौकरियों के बीच विसंगति समय के साथ बढ़ी है? इंडिया एंप्लॉयमेंट रिपोर्ट, 2024 इस बारे में कुछ संकेत देती है। यह बताती है कि उच्च शिक्षित युवाओं (पुरुष एवं महिला) का एक बड़ा हिस्सा, जिसमें तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवा भी शामिल हैं, अपनी नौकरी से ज्यादा योग्यता रखते हैं। तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं में से भी 0.4 फीसदी ऐसे व्यवसायों में लगे हुए थे, जो उनकी योग्यता के अनुरूप नहीं थे। हालांकि समग्र रूप से शिक्षा प्राप्ति में बढ़ोतरी हुई है, जिससे नौकरी की मांग रही है, जो (उच्च शिक्षित और कम शिक्षित युवाओं) में रोजगार दर को कम कर रही है और बेरोजगारी दर बढ़ा रही है। इसके चलते उच्च शिक्षित युवा भी कम कौशल वाले ब्ल्यू-कॉलर जॉब अपनाने लगते हैं।’ 

एक और चिंतनीय विषय है कि तमाम उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्ति का स्तर अब भी निम्न बना हुआ है और गुणवत्ता चिंता का विषय है। गरीब राज्यों एवं हाशिये के समूहों में मध्य एवं माध्यमिक स्तर की शिक्षा के बाद ड्रॉप-आउट (स्कूल छोड़ने) की दर उच्च है। शिक्षा की गुणवत्ता लगातार चिंता का विषय है। स्कूली स्तर पर और सामान्य रूप से भी सीखने के स्तर में कमी आई है और उच्च शिक्षा संस्थानों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता खराब है। 

हम ऐसी स्थिति को जारी नहीं रहने दे सकते। रिपोर्ट बताती है कि योग्यताओं, आकांक्षाओं और नौकरियों के बीच विस्फोटक अंतर असंतोष बढ़ा रहा है। हालांकि ऐसे मामले अपेक्षाकृत पिछड़े राज्यों में आम रहे हैं, लेकिन अब आर्थिक रूप से ज्यादा गतिशील राज्यों में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। इसलिए अब सुदूर अतीत और सुदूर भविष्य पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय वर्तमान पर ध्यान देने का समय आ गया है।

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed