Edinbox Hindi
Empty Classrooms: Why Rural India’s Government Schools Are Losing Relevance and How They Can Be Transformed by 2030

खाली होता क्लासरूम: ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूल क्यों खो रहे हैं प्रासंगिकता, 2030 तक कैसे बदलेगी तस्वीर 

Empty Classrooms: Why Rural India’s Government Schools Are Losing Relevance and How They Can Be Transformed by 2030

NEP 2020 बच्चों को पढ़ने, तर्क करने, रचनात्मक सोच विकसित करने, कोडिंग सीखने और अपनी आजीविका चुनने में सक्षम बनाने का वादा करती है। लेकिन देश के बहुत से गांवों में सरकार आज भी वह शिक्षक, शौचालय, भोजन और पाठ उपलब्ध कराने के लिए संघर्ष कर रही है, जो बच्चों को इस मंजिल तक पहुंचा सके।

 

ग्रामीण स्कूल अप्रासंगिक नहीं, उनका काम करने का तरीका हो गया है पुराना

ग्रामीण भारत की शिक्षा का सबसे बड़ा सवाल अब यह नहीं है कि बच्चे स्कूल में दाखिला ले रहे हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या स्कूल उन्हें इतना सक्षम बना रहा है कि वे किसी पाठ को समझकर पढ़ सकें, संख्याओं का इस्तेमाल कर सकें, अलग-अलग भाषाओं में संवाद कर सकें, डिजिटल उपकरणों का सुरक्षित उपयोग कर सकें, किसी स्वचालित जवाब पर सवाल उठा सकें और अपने पारंपरिक पारिवारिक पेशे से आगे रोजगार की नई संभावनाओं की कल्पना कर सकें।

देश के बड़े हिस्से में सरकारी स्कूल सरकारी रिकॉर्ड में तो मौजूद हैं, लेकिन जिस भविष्य के लिए बच्चों को तैयार होना है, उसमें उनकी भूमिका कमजोर होती जा रही है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर सरकारी स्कूल असफल है या निजी स्कूल अपने आप बेहतर हैं। केरल, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु और देश के कई अन्य हिस्सों के सरकारी स्कूल बताते हैं कि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था मजबूत, मानवीय और भरोसेमंद हो सकती है। इसी तरह हर स्कूल का विलय भी गलत नहीं है। पांच बच्चों, एक थके हुए शिक्षक और बिना प्रयोगशाला वाले स्कूल को पास के किसी बेहतर स्कूल से जोड़ना जरूरी हो सकता है।

लेकिन बड़ी समस्या यह है कि औसत ग्रामीण सरकारी स्कूल की व्यवस्था अब परिवारों की आकांक्षाओं और खुद भारत की शिक्षा नीति, दोनों से दूर होती जा रही है। परिवारों का भरोसा कम होने से स्कूल खाली हो सकता है और स्कूल के खाली होने से परिवारों का भरोसा और कम हो सकता है। यह एक नीतिगत चक्र है, बच्चे की क्षमता पर फैसला नहीं।

स्कूल तक पहुंच बढ़ी, लेकिन सीखने की क्षमता पीछे रह गई

भारत ने बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। ASER 2024 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 6 से 14 वर्ष की उम्र के 98.1 प्रतिशत बच्चे स्कूल में नामांकित थे। यानी परिवारों ने शिक्षा को खारिज नहीं किया है; वे अपने बच्चों को स्कूल के दरवाजे तक लेकर आए हैं।

संकट उस दरवाजे के बाद शुरू होता है।

2024 में सरकारी स्कूलों की कक्षा 3 के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे। कक्षा 5 में सरकारी स्कूलों के 44.8 प्रतिशत बच्चे ही ऐसा कर पा रहे थे, जबकि निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 59.3 प्रतिशत था। कक्षा 3 के सरकारी स्कूलों के केवल 27.6 प्रतिशत बच्चे घटाव का सवाल हल कर सकते थे। कक्षा 5 के सभी बच्चों में केवल 30.7 प्रतिशत बुनियादी भाग का सवाल हल कर सके। कक्षा 8 तक यह आंकड़ा बढ़कर 45.8 प्रतिशत हुआ।

किशोरों की स्थिति और भी चिंताजनक है। ASER के 2023 के Beyond Basics सर्वेक्षण में 14 से 18 वर्ष के ग्रामीण युवाओं को शामिल किया गया। इसमें केवल 43.3 प्रतिशत युवा तीन अंकों की संख्या को एक अंक से भाग देने का सवाल सही तरीके से हल कर सके। करीब हर चार में से एक युवा क्षेत्रीय भाषा में कक्षा 2 के स्तर का पाठ धाराप्रवाह नहीं पढ़ सका।

सिर्फ 57.3 प्रतिशत युवा सरल अंग्रेजी वाक्य पढ़ सके और उनमें से भी केवल 73.5 प्रतिशत उनके अर्थ को समझा सके।

डिजिटल पहुंच को डिजिटल क्षमता समझ लेने की गलती भी हो रही है। 14 से 16 वर्ष के 82.2 प्रतिशत बच्चों को स्मार्टफोन इस्तेमाल करना आता था, लेकिन पिछले सप्ताह केवल 57 प्रतिशत ने इसका इस्तेमाल शिक्षा के लिए किया था। वहीं 76 प्रतिशत ने स्मार्टफोन का इस्तेमाल सोशल मीडिया के लिए किया।

यानी कोई युवा वीडियो आसानी से चला सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह किसी स्रोत की विश्वसनीयता जांच सके, ऑनलाइन फॉर्म भर सके, पासवर्ड सुरक्षित रख सके, स्प्रेडशीट पढ़ सके या AI से मिले जवाब पर सवाल उठा सके।

तकनीकी राज्य कर्नाटक का उदाहरण भी चेतावनी देता है

कर्नाटक से जुड़े साथ के Counterview रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। 30 जिलों में किए गए एक अध्ययन में कक्षा 1 के 32.7 प्रतिशत बच्चे अक्षरों को पहचान नहीं सके। 39.8 प्रतिशत बच्चे शब्द नहीं पढ़ सके और कक्षा 5 के केवल करीब 34 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ सके।

रिपोर्ट में करीब 43,000 शिक्षक पद खाली होने और 6,150 से अधिक ऐसे स्कूल होने की बात भी कही गई है जहां केवल एक शिक्षक है।

इसलिए समस्या केवल शिक्षकों के पदों की संख्या नहीं है। अगर किसी शिक्षक को शुरुआती पढ़ने की शिक्षा, बच्चों के सीखने के स्तर के अनुसार पढ़ाने, व्यावहारिक गणित, बहुभाषी शिक्षा, डिजिटल सुरक्षा या AI नैतिकता के लिए तैयार ही नहीं किया गया है, तो सिर्फ एक नया ऑनलाइन मॉड्यूल अपलोड कर देने से उसकी क्षमता नहीं बढ़ जाएगी।

NEP 2020 भविष्य की भाषा में लिखी गई नीति है

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 यानी NEP 2020 भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए 5+3+3+4 संरचना की कल्पना करती है। इसमें बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान, घर या स्थानीय भाषा में शुरुआती शिक्षा, रटने की बजाय समझ पर जोर, दक्षता आधारित मूल्यांकन, विषयों को चुनने की आजादी, कला और शारीरिक शिक्षा, मध्य कक्षाओं से व्यावसायिक शिक्षा का परिचय, डिजिटल शिक्षा, समावेशन, स्कूल कॉम्प्लेक्स और शिक्षकों को मजबूत बनाने जैसी बातें शामिल हैं।

नीति ऐसे विद्यार्थी की कल्पना करती है जो सोच सके, संवाद कर सके, मिलकर काम कर सके, समस्याओं का समाधान कर सके और लगातार सीखता रहे।

NIPUN Bharat ने बुनियादी शिक्षा के इस लक्ष्य को राष्ट्रीय मिशन में बदला और कक्षा 3 तक बच्चों को बुनियादी पढ़ने, लिखने और गणित की क्षमता देने का लक्ष्य रखा। 2025 की यह समयसीमा बीत चुकी है, लेकिन सीखने का अंतर अभी भी मौजूद है।

नीति और कक्षा के बीच की दूरी केवल विचारों का मतभेद नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की आपूर्ति-श्रृंखला की समस्या है।

NEP को समय, विषय विशेषज्ञ शिक्षक, स्कूल नेतृत्व, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, परिवहन, तकनीक, स्वास्थ्य सहायता और ऐसी पेशेवर कार्य संस्कृति चाहिए जो शिक्षण को प्राथमिकता दे। लेकिन ग्रामीण स्कूलों को कई बार पाठ्यक्रम एक PDF के रूप में और सुधार एक अनुपालन फॉर्म के रूप में मिलता है।

उनसे अंग्रेजी, गणित, डिजिटल कौशल और अब AI साक्षरता पढ़ाने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इसके लिए जरूरी शिक्षक, उपकरण और प्रशिक्षण नहीं दिए जाते।

NEP पुराने अकादमिक और व्यावसायिक विभाजन को भी स्वीकार नहीं करती। ग्रामीण बच्चे को बीजगणित सीखने के साथ पानी के पंप को समझना चाहिए; अंग्रेजी के साथ खाद्य प्रसंस्करण सीखना चाहिए; विज्ञान के साथ स्थानीय हस्तशिल्प और रोजगार की अर्थव्यवस्था को समझना चाहिए।

लेकिन आज बहुत से स्कूल न तो मजबूत बुनियादी शिक्षा दे पा रहे हैं और न ही भरोसेमंद व्यावहारिक रास्ते उपलब्ध करा रहे हैं।

नीति आयोग का आईना: छोटी-छोटी असफलताओं की लंबी श्रृंखला

नीति आयोग की मई 2026 की रिपोर्ट “School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement” में 2014-15 से 2024-25 तक के UDISE+ आंकड़ों, PARAKH 2024, National Achievement Survey और ASER 2024 के प्रमाणों का इस्तेमाल किया गया है।

इस रिपोर्ट की खास बात यह है कि यह शिक्षा संकट को किसी एक आंकड़े तक सीमित नहीं करती।

भारत में अब करीब 14.71 लाख स्कूल हैं, जिनमें 24.69 करोड़ से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। प्राथमिक स्तर पर स्कूल तक पहुंच लगभग सार्वभौमिक है, लेकिन उच्च माध्यमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात केवल 58.4 प्रतिशत है।

एक दशक में सरकारी स्कूलों में नामांकन की हिस्सेदारी 54.3 प्रतिशत से घटकर 49.25 प्रतिशत रह गई, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की हिस्सेदारी 31.7 प्रतिशत से बढ़कर 38.8 प्रतिशत हो गई।

इस बदलाव के पीछे जनसांख्यिकी, पलायन, स्कूलों का विलय, आंकड़ों की सफाई और परिवारों की पसंद जैसे कई कारण हैं। लेकिन यह सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था और परिवारों के बीच कमजोर होते भरोसे का संकेत भी है।

एक तिहाई से अधिक स्कूलों में 50 से कम विद्यार्थी हैं। नीति आयोग के अनुसार, 1,04,125 ऐसे स्कूल हैं जहां केवल एक शिक्षक है और इनमें 33,76,769 विद्यार्थी पढ़ते हैं।

इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात ठीक दिखाई दे सकता है, लेकिन किसी दूरदराज के स्कूल में एक शिक्षक कई कक्षाओं के साथ रिकॉर्ड, भोजन और सर्वेक्षण का काम भी संभाल रहा हो सकता है।

2024-25 में माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर 11.5 प्रतिशत रही। इसके पीछे शिक्षा का खर्च, दूरी, पलायन, कम उम्र में काम करना, बाल विवाह, कमजोर बुनियादी शिक्षा और यह धारणा जैसे कारण हैं कि ज्यादा पढ़ाई करने से परिवार की आय में बदलाव नहीं आएगा।

बुनियादी ढांचा सुधरा, लेकिन रोजमर्रा की सुविधा अभी भी सवाल है

बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है, लेकिन प्रशासनिक रिकॉर्ड में सुविधा का होना और उसका रोजाना इस्तेमाल हो पाना दो अलग बातें हैं।

कार्यशील बालिका शौचालयों की हिस्सेदारी 2014-15 में 85.17 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में रिपोर्ट के अनुसार 94 प्रतिशत हो गई। फिर भी 98,592 स्कूलों में अभी एक कार्यशील बालिका शौचालय नहीं था। 61,540 स्कूलों में इस्तेमाल योग्य शौचालय नहीं था, 14,505 स्कूलों में कार्यशील पेयजल सुविधा नहीं थी और 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा नहीं थी।

91.9 प्रतिशत स्कूलों में बिजली पहुंचने की रिपोर्ट है, लेकिन 1.19 लाख स्कूलों में अभी भी कार्यशील बिजली नहीं थी।

64.7 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर, 63.5 प्रतिशत में इंटरनेट और केवल 30.6 प्रतिशत में स्मार्ट क्लासरूम की सूचना दी गई।

PARAKH 2024 के अनुसार, कक्षा 9 के राष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शन में भाषा में 54 प्रतिशत, गणित में 37 प्रतिशत, विज्ञान में 40 प्रतिशत और सामाजिक विज्ञान में 40 प्रतिशत का स्तर दर्ज हुआ।

समावेशन की स्थिति भी असमान है। 79.1 प्रतिशत स्कूलों में रैंप की जानकारी दी गई, लेकिन विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए कार्यशील शौचालय केवल 33.4 प्रतिशत स्कूलों में थे।

नीति आयोग का निष्कर्ष एक पूरी श्रृंखला की ओर इशारा करता है: छोटे-छोटे स्कूलों का बिखरा नेटवर्क शिक्षकों की नियुक्ति मुश्किल बनाता है; कमजोर शिक्षक व्यवस्था कमजोर सीखने की स्थिति पैदा करती है; कमजोर सीखने से परिवार निजी स्कूलों की ओर जाते हैं या बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं; और घटता नामांकन फिर स्कूलों के विलय का आधार बन जाता है।

इसका समाधान स्कूल कॉम्प्लेक्स, काम करने योग्य बुनियादी सुविधाएं, साझा शिक्षक और संसाधन, सीखने के स्तर के आधार पर शिक्षा, कल्याणकारी सहायता, प्रवासी बच्चों के लिए पोर्टेबल रिकॉर्ड, स्थानीय जवाबदेही, उपयोगी व्यावसायिक शिक्षा और ऐसी तकनीक है जो बच्चे के निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करे।

हर योजना के लिए जिम्मेदार अधिकारी, समयसीमा, सार्वजनिक डैशबोर्ड और पानी, शिक्षक या पाठ उपलब्ध न होने पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

94 हजार स्कूलों का सवाल और आंकड़ों के समाधान का खतरा

2014-15 से 2024-25 के बीच UDISE आंकड़ों के अनुसार सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई। कुल स्कूल नामांकन 26.95 करोड़ से घटकर 24.69 करोड़ हुआ, जबकि निजी स्कूलों की संख्या लगभग 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई।

गणित साफ है, लेकिन यह कहना कि “94 हजार स्कूल बंद हो गए” पूरी तस्वीर नहीं बताता। इनमें कितने स्कूलों का विलय हुआ, कितने का वर्गीकरण बदला, कितने निष्क्रिय रिकॉर्ड से हटाए गए और कितने वास्तव में बंद हुए—इन सबको अलग-अलग समझना जरूरी है।

भारत में जन्मदर में गिरावट, पलायन और शहरीकरण हो रहा है। इसलिए आने वाले समय में स्कूल जाने वाली आबादी घटने पर स्कूल नेटवर्क भी बदलेगा। लेकिन अगर सरकारी स्कूल लगातार उपयोगी, सुरक्षित और बच्चों की आकांक्षाओं के अनुरूप होते, तो केवल जनसांख्यिकीय बदलाव भरोसे में कमी को पूरी तरह नहीं समझा सकता।

एक अच्छी तरह वित्तपोषित संयुक्त स्कूल विषय विशेषज्ञ शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल, काउंसलिंग और कौशल जैसी सुविधाएं दे सकता है, जो बहुत छोटे एक-शिक्षक वाले स्कूल में संभव नहीं होतीं।

लेकिन पहाड़ी गांव, बाढ़ वाले इलाके, जंगल या आदिवासी बस्ती में “5 से 10 किलोमीटर के भीतर” होना कोई आसान बात नहीं है। इसका मतलब सड़क, नदी, बारिश, असुरक्षित रास्ता, बस की कमी और ऐसा अभिभावक हो सकता है जो बच्चे को छोड़ने के लिए अपना काम नहीं छोड़ सकता।

इसकी सबसे बड़ी कीमत लड़कियों और दिव्यांग बच्चों को चुकानी पड़ सकती है।

इसलिए हर स्कूल विलय के फैसले से पहले यात्रा का समय, सुरक्षा, मौसम के दौरान पहुंच, परिवहन खर्च, उपस्थिति, सीखने के परिणाम और समानता की जांच होनी चाहिए। स्कूलों का विलय सेवा को बेहतर बनाने के लिए हो, बजट घटाने या बस्ती को छोड़ देने के नाम पर नहीं।

परिवार सरकारी स्कूलों से दूर क्यों जा रहे हैं?

माता-पिता को यह समझने के लिए किसी राष्ट्रीय रिपोर्ट की जरूरत नहीं कि उनका बच्चा पीछे है। वे देखते हैं कि बच्चा किसी पैराग्राफ को समझे बिना कॉपी कर रहा है, बाजार में पैसे का हिसाब गलत कर रहा है, एक शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है और चुनाव ड्यूटी जैसे अतिरिक्त काम भी कर रहा है।

दूसरी ओर, निजी स्कूल अंग्रेजी, परीक्षा, यूनिफॉर्म, परिवहन और बेहतर भविष्य का वादा करता है।

भले ही कोई निजी स्कूल वस्तुनिष्ठ रूप से बेहतर न हो, फिर भी वह परिवार को गंभीरता का संकेत देता है।

सरकारी स्कूलों में घटती हिस्सेदारी केवल अमीर परिवारों के निजी स्कूलों में जाने की कहानी नहीं है। इसमें छोटे किसान, निर्माण मजदूर, प्रवासी और भूमिहीन मजदूर भी शामिल हैं, जो चाहते हैं कि उनका बच्चा बैंक का संदेश पढ़ सके, कीमतों की तुलना कर सके, लोन को समझ सके, सरकारी पोर्टल का इस्तेमाल कर सके, ग्राहक से बात कर सके, सुरक्षित तरीके से दूसरे शहर में काम के लिए जा सके या स्थानीय कारोबार शुरू कर सके।

इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता का मतलब ऐसी क्षमताएं होनी चाहिए जिन्हें बच्चा और उसका परिवार अपनी आंखों से देख सके—दवा का लेबल पढ़ना, मजदूरी की गणना करना, आवेदन लिखना, नक्शा समझना, ऑनलाइन धोखाधड़ी पहचानना, किसी वस्तु की मरम्मत करना, कुछ उगाना या बेचना और आगे की पढ़ाई या प्रशिक्षण का रास्ता खोजना।

इसका समाधान कोचिंग सेंटर या कृत्रिम अंग्रेजी लहजा नहीं है। समाधान है मजबूत बुनियादी शिक्षा को वास्तविक जीवन से जोड़ना।

स्थानीय भाषा में सीखना, अंग्रेजी को संवाद के पुल की तरह इस्तेमाल करना, बाजार और खेत के उदाहरणों से गणित समझाना, पानी और मिट्टी के जरिए विज्ञान पढ़ाना तथा सरकारी सेवाओं और रोजगार के माध्यम से डिजिटल कौशल विकसित करना जरूरी है।

भरोसा बार-बार दिखाई देने वाले छोटे बदलावों से लौटेगा—साफ शौचालय, स्कूल में मौजूद शिक्षक, नियमित भोजन, इस महीने बेहतर पढ़ने वाला बच्चा और ऐसा अभिभावक जो देख सके कि स्कूल को कितना पैसा मिला और कहां खर्च हुआ।

जब कैमरा स्कूल के अंदर पहुंचता है

अगस्त 2026 में Cockroach Janata Party (CJP) नाम से पहचाने जाने वाले युवा आंदोलन ने “School Thik Karo – Fix the Schools” अभियान शुरू किया। इसके स्वयंसेवकों ने सरकारी स्कूलों का दौरा किया, वहां की स्थिति रिकॉर्ड की और उसे सार्वजनिक किया।

उनकी जांच सूची बुनियादी थी—पीने का पानी और काम करने वाले शौचालय, बिजली और इस्तेमाल योग्य कक्षाएं, चारदीवारी और परिसर की सुरक्षा, मिड-डे मील तथा शिक्षक की उपस्थिति।

इस अभियान का दृश्य प्रभाव इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि सरकारी डैशबोर्ड कह सकता है कि किसी स्कूल में “बुनियादी सुविधा उपलब्ध” है, जबकि मोबाइल कैमरा टूटी छत, जाम शौचालय, गायब खिड़कियां, बिना बेंच के बच्चे या किसी अस्थायी जगह पर चलती कक्षा दिखा सकता है।

रिपोर्टों में मध्य प्रदेश, मिजोरम, उत्तराखंड, बिहार, कर्नाटक, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में ऐसी स्थितियों के सामने आने का उल्लेख किया गया। राजस्थान के रामपुरा कंवरपुरा में एक स्कूल के भैंसों के तबेले में चलने की खबर सामने आई। बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि असुरक्षित ढांचे को गिरा दिया गया और करीब 18 लाख रुपये की लागत से नया भवन बनाने की घोषणा की गई।

अभियान ने यह भी दिखाया कि स्कूलों की निगरानी कितनी जल्दी राजनीतिक विवाद में बदल सकती है।

पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा में CJP स्वयंसेवक अब्दुल हफीज पर कथित हमले और उनके पिता की दो दिन बाद चोटों के कारण मौत की बात अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट में कही गई है। राजनीतिक जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावे हैं, जिनका फैसला उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।

महाराष्ट्र के लातूर में शिक्षक की शिकायत के बाद आयोजक अभिजीत दिपके और अन्य लोगों के खिलाफ कथित तौर पर बिना अनुमति प्रवेश, वीडियो बनाने, छात्रों से सवाल पूछने और धमकी देने के आरोप में FIR दर्ज किए जाने की खबर आई। CJP ने इन आरोपों से अलग पक्ष रखा।

राजस्थान की एक टीम ने भी हमले की शिकायत की, जबकि हिंगोली के एक प्रधानाध्यापक को नशे की हालत और लापरवाही की शिकायतों के बाद निलंबित किए जाने की खबर सामने आई।

इन सभी आरोपों की जांच जरूरी है; उन्हें केवल सुर्खियों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं माना जा सकता।

राजस्थान में बाहरी लोगों के स्कूल में प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और इंटरव्यू पर प्रतिबंध की खबरें भी सामने आईं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस अभियान को राजनीतिक कार्यक्रम बताया और कहा कि ज्यादातर जिला परिषद स्कूल अच्छे हैं।

CJP द्वारा सामने लाई गई घटनाएं पूरे सरकारी स्कूल तंत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। वे सीखने के स्तर को मापने का विकल्प भी नहीं हैं और न ही प्रशिक्षित निरीक्षण या सामाजिक ऑडिट की जगह ले सकती हैं।

लेकिन वे जवाबदेही की एक कमजोरी जरूर दिखाती हैं।

समाधान न तो भीड़ के जरिए स्कूलों की जांच है और न सरकारी गोपनीयता। समाधान है—कानूनी तरीके से नागरिकों की निगरानी की अनुमति, बच्चों की सुरक्षा, स्वतंत्र ऑडिट, स्कूल स्तर के पारदर्शी रिकॉर्ड और विफलता पर जवाबदेही।

अधिकांश शिक्षक कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और सभी शिक्षकों को एक साथ दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन सरकारी स्कूल किसी प्रधानाध्यापक की निजी जागीर की तरह भी नहीं चल सकता।

पैसा बढ़ रहा है, भरोसा नहीं

केंद्र के 2026-27 बजट में शिक्षा मंत्रालय का कुल आवंटन करीब 1,39,289 करोड़ रुपये है, जिसमें लगभग 83,562 करोड़ रुपये स्कूली शिक्षा के लिए हैं।

इसमें समग्र शिक्षा के लिए 42,100 करोड़ रुपये, PM POSHAN के लिए 12,749.99 करोड़ रुपये, PM SHRI के लिए 7,500 करोड़ रुपये और Atal Tinkering Labs के लिए 3,200 करोड़ रुपये शामिल हैं।

राजस्थान ने 2,500 से अधिक स्कूलों की मरम्मत के लिए 550 करोड़ रुपये, 400 CM-RISE स्कूलों के लिए 1,000 करोड़ रुपये, 1,000 स्कूलों में AI लर्निंग लैब और हर जिले में एक School on Wheels के लिए बजट का प्रावधान किया है। इसके साथ बड़े बुनियादी ढांचा कार्यक्रम की भी रिपोर्ट है।

पश्चिम बंगाल ने एशियाई विकास बैंक (ADB) समर्थित करीब 2,349.78 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी है। इसके तहत लगभग 430-432 स्कूलों में कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, रैंप, शौचालय, रसोई और शिक्षक विकास जैसी सुविधाएं विकसित की जानी हैं।

यह निवेश स्वागत योग्य है, लेकिन किसी परियोजना क्षेत्र में एक मॉडल स्कूल बना देने से उसके बाहर मौजूद हर छोटे प्राथमिक स्कूल की समस्या हल नहीं हो जाती।

नीति आयोग के अनुसार, हाल के वर्षों में सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च GDP के करीब 4 प्रतिशत के आसपास रहा है और 2021 में यह 4.6 प्रतिशत दर्ज किया गया। यह कोठारी आयोग और NEP 2020 से जुड़े 6 प्रतिशत के लक्ष्य से कम है।

समस्या सिर्फ ज्यादा पैसा खर्च करने की नहीं है। पैसा दूरदराज, गरीब, आदिवासी और प्रवासी आबादी तथा दिव्यांग बच्चों वाले स्कूलों तक उनकी जरूरत के हिसाब से अधिक पहुंचना चाहिए। धन समय पर जारी होना चाहिए, रखरखाव के लिए पैसा सुरक्षित रखा जाना चाहिए, खर्च का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए और शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक काम से बचाना चाहिए।

असली बजट की परीक्षा मंजूर की गई राशि नहीं, बल्कि गांव में मिलने वाली वास्तविक सुविधा है।

कुछ अपवाद बताते हैं कि रास्ता मौजूद है

कर्नाटक का कोटलापुर उदाहरण बताता है कि सरकारी स्कूलों में नई जान डाली जा सकती है।

2008 में माता-पिता ने अपने बच्चों को पास के निजी स्कूल में भेजना शुरू कर दिया था और गांव का सरकारी स्कूल लगभग बंद हो गया था। 2025 में प्रधानाध्यापक डॉ. विजय कुमार के आने के बाद स्कूल की दीवारों को रंगा गया, कन्नड़ भाषा प्रयोगशाला और छोटी लाइब्रेरी बनाई गई, घर-घर जाकर परिवारों से संपर्क किया गया और उन्हें सरकारी सुविधाओं के बारे में जानकारी दी गई।

गांव ने CCTV के लिए करीब 65,000 रुपये का योगदान दिया। कक्षा 1 में दाखिला लेने वाले हर बच्चे के नाम पर सालाना 1,000 रुपये की सावधि जमा शुरू की गई, जो 18 साल बाद परिपक्व होनी थी।

यूनिफॉर्म, किताबें, जूते, मोजे और अंडे जैसी सुविधाओं ने स्कूल के वादे को दिखाई देने वाली वास्तविकता में बदला।

2025-26 तक स्कूल में चार शिक्षकों के साथ नामांकन 42 तक पहुंचने की खबर है। स्कूल प्रबंधन समिति ने भी इसमें सहयोग किया।

कोटलापुर संभावना और समस्या, दोनों को दिखाता है। नेतृत्व, अभिभावकों की भागीदारी और बेहतर दिखाई देने वाला स्कूल भरोसा वापस ला सकते हैं। लेकिन यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए कि सामान्य सुविधाएं भी किसी असाधारण प्रधानाध्यापक, दान या व्यक्तिगत प्रयास पर निर्भर हों।

केरल का सार्वजनिक शिक्षा में निवेश और बुनियादी शिक्षा पर जोर, तमिलनाडु की मातृभाषा और कल्याणकारी योजनाओं की प्राथमिकता, कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश की पहुंच, पंजाब में हालिया सीखने के सुधार और नगालैंड में समुदाय से जुड़े मॉडल ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे भारत सीख सकता है।

लक्ष्य किसी पूरे राज्य की व्यवस्था की नकल करना नहीं, बल्कि यह पहचानना है कि क्या काम करता है और उसे तब तक वित्त देना है जब तक वह सामान्य व्यवस्था न बन जाए।

ग्रामीण स्कूल गांव को दुनिया से जोड़ने वाला केंद्र बन सकता है

ग्रामीण स्कूल को गांव को खुद से और बाहरी दुनिया से जोड़ना चाहिए।

जिला स्तर पर कौशल मानचित्र बनाकर स्कूलों को ITI, कृषि विज्ञान केंद्रों, स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों और कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, मरम्मत, हस्तशिल्प, ऊर्जा, स्वास्थ्य, जलवायु, लॉजिस्टिक्स, लेखा और डिजिटल सेवाओं से जुड़े स्थानीय विशेषज्ञों से जोड़ा जा सकता है।

कोई प्रशिक्षित स्थानीय विशेषज्ञ 30 से 60 घंटे का मॉड्यूल पढ़ा सकता है, लेकिन शिक्षक की भूमिका खत्म नहीं होनी चाहिए। शिक्षक को उस व्यावहारिक अनुभव को भाषा, गणित, विज्ञान, डिजाइन और विचार-विमर्श से जोड़ना होगा।

खेत का क्षेत्रफल मापना, उपज की गणना करना, बिल बनाना, ऑनलाइन भुगतान जांचना या AI के जवाब की सत्यता परखना अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, नागरिक शास्त्र और AI साक्षरता को वास्तविक जीवन से जोड़ सकता है।

व्यावसायिक शिक्षा को जाति या वर्ग के आधार पर बच्चों को अलग-अलग रास्तों में बांटने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। हर मॉड्यूल से आगे उच्च शिक्षा, ITI, पॉलिटेक्निक, अप्रेंटिसशिप, विश्वविद्यालय और अपना कारोबार शुरू करने के रास्ते खुले रहने चाहिए।

पांच अंतरराष्ट्रीय उदाहरण, लेकिन उनकी नकल नहीं

चीन का उदाहरण स्कूलों के विलय की ताकत और जोखिम दोनों दिखाता है। बेहतर संसाधनों वाले ग्रामीण केंद्र, साझा विशेषज्ञता, डिजिटल संपर्क और पोषण कार्यक्रम से 3.7 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों को लाभ मिलने की रिपोर्ट है। भारत नेटवर्क की इस सोच से सीख सकता है, लेकिन इसके लिए परिवहन, छात्रावास और परिवारों से लगातार संपर्क जरूरी होगा।

दक्षिण अफ्रीका अपने quintile model के जरिए गरीब स्कूलों को अपेक्षाकृत अधिक वित्त देता है और मुफ्त शिक्षा को पोषण समितियों से जोड़ता है।

ब्राजील सामाजिक सुरक्षा को शिक्षा से जोड़ता है, Fundeb के माध्यम से शिक्षा वित्त का पुनर्वितरण करता है और संघीय स्कूल भोजन संसाधनों का कम से कम 30 प्रतिशत परिवार आधारित कृषि से खरीद के लिए निर्धारित करता है। भारत PM POSHAN में स्थानीय खरीद को इससे और मजबूत कर सकता है।

इंडोनेशिया की स्कूल संचालन सहायता व्यवस्था यह दिखाती है कि टूटे नलों, शिक्षण सामग्री और इंटरनेट जैसी जरूरतों के लिए अनुमानित और लचीला धन कितना उपयोगी हो सकता है, बशर्ते सार्वजनिक लेखा और ऑडिट भी हों।

फिनलैंड शिक्षक प्रशिक्षण, मुफ्त शिक्षण सामग्री, दैनिक भोजन, कल्याण सेवाओं और लंबी या असुरक्षित यात्रा के लिए परिवहन को महत्व देता है।

भारत इन व्यवस्थाओं को सीधे लागू नहीं कर सकता, लेकिन इनके सिद्धांतों से सीख सकता है—जरूरत के हिसाब से ज्यादा संसाधन, स्थानीय स्तर पर पारदर्शी लचीलापन, सम्मानित शिक्षक, शुरुआती हस्तक्षेप और भोजन, स्वास्थ्य, परिवहन तथा सुरक्षा जैसी बाधाओं को हटाना।

2030 तक ग्रामीण स्कूल के लिए 10 जरूरी शर्तें

  1. कार्यशील स्कूल की गारंटी: हर सरकारी स्कूल में सुरक्षित कक्षाएं, पीने का पानी, अलग और इस्तेमाल योग्य शौचालय, हाथ धोने की सुविधा, बिजली, रसोई, बुनियादी फर्नीचर, दिव्यांग अनुकूल पहुंच, लाइब्रेरी कॉर्नर, खेल की जगह और रखरखाव का कैलेंडर होना चाहिए। डैशबोर्ड पर साल में एक बार उपलब्धता नहीं, बल्कि हर महीने सुविधा के काम करने की स्थिति दर्ज होनी चाहिए।
  2. ग्रामीण शिक्षक की गारंटी: जहां कई कक्षाएं एक साथ चलती हैं, वहां कम से कम दो प्रशिक्षित प्राथमिक शिक्षक हों। स्कूल कॉम्प्लेक्स के जरिए गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, भाषाओं, कला, शारीरिक शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा के शिक्षकों तक पहुंच हो। खाली पद भरे जाएं, कठिन क्षेत्रों के लिए प्रोत्साहन मिले और शिक्षकों का शिक्षण समय सुरक्षित किया जाए।
  3. अगली कक्षा से पहले सीखने की गारंटी: हर साल की शुरुआत में पढ़ने, लिखने और गणित की क्षमता जांची जाए। बच्चों को उनके सीखने के स्तर के अनुसार सहायता दी जाए। कमजोर बच्चों के लिए बिना किसी शर्मिंदगी के अतिरिक्त कक्षाएं हों और कक्षा 3 के बाद भी बुनियादी शिक्षा पर सहायता जारी रहे। मूल्यांकन का उद्देश्य पढ़ाई बेहतर करना हो, बच्चों को दंड देना नहीं।
  4. इस्तेमाल के लिए अंग्रेजी और गणित: बाजार, स्वास्थ्य, काम, पलायन, सरकारी सेवाओं और डिजिटल संवाद के संदर्भ में द्विभाषी अंग्रेजी सिखाई जाए। गणित को पैसे, माप, समय, आंकड़े, अनुमान, ज्यामिति और तर्क से जोड़कर पढ़ाया जाए।
  5. इंसान-केंद्रित डिजिटल और AI साक्षरता: स्मार्ट क्लासरूम के नाम से पहले बिजली, इंटरनेट, साझा उपकरण, ऑफलाइन सामग्री और शिक्षक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। बच्चों को स्रोत की जांच, निजी जानकारी की सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, AI में पक्षपात, कॉपीराइट और जवाब की पुष्टि करना सिखाया जाए। तकनीक का इस्तेमाल करते समय बच्चे अपनी समझ और निर्णय क्षमता न खोएं।
  6. संसाधनों का विलय, बस्तियों का नहीं: स्कूल विलय से पहले यात्रा, सुरक्षा, मानसून में पहुंच, दिव्यांग बच्चों की पहुंच, लड़कियों की सुरक्षा, खर्च, उपस्थिति और सीखने के परिणाम की जांच हो। जरूरत पड़ने पर बस, साइकिल, एस्कॉर्ट या छात्रावास की सुविधा दी जाए।
  7. स्थानीय बहु-कौशल पाठ्यक्रम: कृषि, पानी, भोजन, मरम्मत, हस्तशिल्प, ऊर्जा, स्वास्थ्य, डिजिटल सेवाओं, जलवायु और उद्यमिता पर 30 से 60 घंटे के मॉड्यूल हों। स्थानीय विशेषज्ञों को भुगतान और प्रशिक्षण दिया जाए। इन पाठ्यक्रमों के क्रेडिट आगे भी उपयोग किए जा सकें और हर बच्चे के लिए अकादमिक शिक्षा का रास्ता खुला रहे।
  8. पोषण, स्वास्थ्य और सम्मान: PM POSHAN की रसोई, स्थानीय खरीद, भोजन की गुणवत्ता और सामाजिक ऑडिट को मजबूत किया जाए। स्कूलों को स्वास्थ्य जांच, मासिक धर्म स्वच्छता, काउंसलिंग, दिव्यांग सहायता, शारीरिक शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए रेफरल व्यवस्था से जोड़ा जाए। सिर्फ मंजूर भोजन नहीं, वास्तव में परोसे गए भोजन का रिकॉर्ड रखा जाए।
  9. खुली शासन व्यवस्था और सुरक्षित निगरानी: स्कूल प्रबंधन समितियों को प्रशिक्षण और उपयोग योग्य बजट दिया जाए। शिक्षक संख्या, उपस्थिति, सुविधाएं, भोजन, अनुदान, मरम्मत और सीखने की प्रगति सार्वजनिक की जाए, लेकिन बच्चों की निजी जानकारी सुरक्षित रहे। स्कूलों के वैध निरीक्षण और शिकायत के सुरक्षित रास्ते उपलब्ध हों।
  10. जरूरत के अनुसार वित्त, मजबूत नेतृत्व और प्रमाण: दूरदराज, गरीब, आदिवासी, प्रवासी और दिव्यांग बच्चों की अधिक संख्या वाले स्कूलों को प्रति बच्चे ज्यादा संसाधन दिए जाएं। रखरखाव का पैसा समय पर मिले। प्रधानाध्यापकों को केवल प्रशासक नहीं, शिक्षण नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रशिक्षित किया जाए। ग्रामीण स्कूलों की सफलता का सार्वजनिक स्कोरकार्ड इस आधार पर बने कि बच्चे वास्तव में क्या कर सकते हैं, न कि केवल स्कूल में कितनी सुविधाएं मौजूद हैं।

2030 की परीक्षा बेहद सरल है

2030 तक भारत को किसी बच्चे के सवाल का जवाब सिर्फ नामांकन के आंकड़ों के पीछे छिपकर नहीं देना चाहिए।

क्या वह कोई नया पाठ पढ़कर उसका अर्थ समझा सकती है?

क्या वह भाग, अनुमान, माप और तर्क कर सकता है?

क्या वे अंग्रेजी और डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल सीखने के लिए कर सकते हैं, बिना अपनी मातृभाषा की ताकत खोए?

क्या वे AI के जवाब के बारे में पूछ सकते हैं कि यह सही, निष्पक्ष और सुरक्षित है या नहीं?

क्या वे किसी स्थानीय कौशल को सीख सकते हैं, बिना इसके कि उन्हें जाति या पारंपरिक पेशे के आधार पर जीवन भर के लिए एक काम में बांध दिया जाए?

क्या वे किशोरावस्था तक स्कूल में बने रह सकते हैं, क्योंकि वहां परिवहन, भोजन, शौचालय, स्वास्थ्य और भविष्य की उम्मीद मौजूद है?

निजी ट्यूशन बाजार अंग्रेजी सिखा सकता है। एक मोबाइल फोन वीडियो दिखा सकता है। कोई कौशल केंद्र मशीन चलाना सिखा सकता है।

लेकिन केवल एक मजबूत सरकारी स्कूल ही हर बच्चे के लिए ज्ञान, नागरिकता, पोषण, सम्मान, साथियों के साथ सीखने का अनुभव, स्थानीय जुड़ाव और व्यापक दुनिया तक पहुंचने का रास्ता एक साथ उपलब्ध करा सकता है—खासकर उस बच्चे के लिए जिसके माता-पिता शिक्षा पर अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं कर सकते।

समस्या यह नहीं है कि ग्रामीण भारत में बहुत ज्यादा सरकारी स्कूल हैं। समस्या यह है कि उनमें से बहुत से स्कूलों को इतनी कम क्षमता के साथ छोड़ दिया गया है कि वे परिवारों के भरोसे को सही साबित नहीं कर पा रहे।

स्कूल बंद करने से प्रशासन की एक लाइन कम हो सकती है, लेकिन स्कूल को दोबारा मजबूत बनाने से किसी परिवार की पूरी दिशा बदल सकती है।

कोटलापुर संभावित भविष्य दिखाता है। CJP वर्तमान को नजरअंदाज करने की कीमत दिखाता है। नीति आयोग जरूरी ढांचा सामने रखता है।

अब जरूरत राजनीतिक साहस की है—नागरिकों को देखने का अधिकार देने, शिक्षकों को सक्षम और सम्मानित बनाने, आखिरी गांव तक पर्याप्त संसाधन पहुंचाने और शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर करने की कि वह एक बच्चे को वास्तव में कितना सक्षम बना रही है।

 

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed