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ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने में कैसा ऐतराज !

उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षकों की डिजिटल उपस्थिति का मामला गरम होता जा रहा है। सोमवार को यह आदेश लागू हुआ है, लेकिन इससे पहले से ही विरोध की आवाजें मुखर हैं। शिक्षक काली पट्टी बांधकर अपने दायित्व को निभा रहे हैं। शिक्षकों के इस विरोध का शायद ही कोई मतलब है। उनको समझना चाहिए कि ऑनलाइन प्रक्रिया से सिस्टम में पारदर्शिता आती है और रियल टाइम, यानी वास्तविक समय पर उनकी उपस्थिति जांची जा सकेगी। इतना ही नहीं, शिक्षकों व छात्रों का पूरा विवरण ऑनलाइन होगा, जिससे सुविधाओं की पहुंच व कमियों को दूर करने का मौका मिल सकेगा। शिक्षकों की यह शिकायत भी रही है कि हाजिरी के नाम पर उनको बेवजह प्रताड़ित किया जाता है, इसलिए यदि डिजिटल हाजिरी लगेगी, तो किसी तीसरे की मध्यस्थता की जरूरत नहीं पड़ेगी और शिक्षकों का उत्पीड़न बंद हो सकेगा।

साफ है, उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की डिजिटल हाजिरी का स्वागत किया जाना चाहिए। पूर्व में ऐसी घटना भी सामने आ चुकी है, जिसमें स्कूल के प्रधानाचार्य से शिक्षक मिलीभगत करके स्कूल गए बिना अपनी हाजिरी लगवा लिया करते थे। इससे स्वाभाविक ही बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता था। मगर अब ऐसा नहीं हो सकेगा। स्कूल में ही शिक्षकों की हाजिरी लगेगी और वह भी एक तय वक्त पर। शिक्षकों का विरोध इसी बात को लेकर ज्यादा है। उनका कहना है कि बारिश या अन्य मौसमी आपदाओं में या किसी अन्य कारण से कभी-कभी स्कूल आने में विलंब हो सकता है। ऐसी सूरत में यह एप उनको अनुपस्थित दिखा सकता है। शिक्षकों का यह डर वाजिब है, लेकिन जब मौसम खराब हो, तो वे कुछ देर पहले घर से निकलें। छात्र भी यदि सही समय पर स्कूल नहीं पहुंचते हैं, तो उनको डांट लगती है। कहीं-कहीं तो उनकी उपस्थिति भी काट दी जाती है। तो फिर शिक्षकों को क्या दिक्कत है? उनको सोचना चाहिए कि क्या होगा यदि डॉक्टर भी मौसम खराब की बात कहते हुए कुछ देर बाद मरीज तक पहुंचे? इससे क्या मरीज की जान सांसत में नहीं आ जाएगी ? इसलिए,
जब डॉक्टर तय वक्त पर पहुंच सकते हैं, तो शिक्षक क्यों नहीं?

शिक्षकों को अपना यह विरोध-प्रदर्शन, वापस ले लेना चाहिए। इसका कोई मतलब नहीं है। जब सभी विभागों में डिजिटल उपस्थिति अनिवार्य की जा रही हो, तो शिक्षकों को इसमें छूट देने का कोई मतलब नहीं है। उनको तो कहीं अधिक खुशी से इसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि समाज के असल मार्गदशक तो शिक्षक ही होते हैं।

– विकास कुमार झा
(ये लेखक के अपने विचार हैं )

 

Asmita Sarkar

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