
वैदिक काल (लगभग 1700-900 ई.पू.) से भारत में शिक्षा की शुरुआत मान सकते हैं। ‘वैदिक शिक्षा’ शब्द का प्रयोग इस अवधि में प्रयुक्त शिक्षण पद्धति के अर्थ में किया जाता है। एक व्यापक अर्थ में इस शब्द का प्रयोग उस शिक्षा पद्धति के लिए किया जाता है जो पूर्व वैदिक काल में प्रारंभ हुई और लगभग 550 ई. (गुप्त साम्राज्य के पतन तक) विकसित होती रही। इसे ‘ब्राह्मण शिक्षा-पद्धति’, ‘शिक्षा की हिंदू प्रणाली’ और शिक्षा की ‘गुरुकुल प्रणाली’ भी कहा जाता है। भारतवर्ष में रहने वाली सर्वप्रथम जाति आर्य थी और वैदिक संस्कृति आर्यों की अपनी संस्कृति थी। वैदिक-संस्कृति सत्य, सनातन है और वेद को अनादि अथवा ईश्वरीय माना गया है, क्योंकि मनुष्य और उसकी सभ्यता के बारे में सबसे प्राचीन इतिहास भी इसी संस्कृति की देन है। इसमें ऋषियों द्धारा मानव समाज को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिये मर्यादित आचरण की व्यवस्था दी गयी। वैदिक शिक्षा-प्रणाली की ख़ास विशेषता थी गुरुकुल [शाब्दिक अर्थ शिक्षक का घर] की प्रणाली। छात्रों को शिक्षा के पूरे काल के लिए शिक्षक और उनके परिवार के साथ रहना आवश्यक था। कुछ गुरुकुल एकांत वन-क्षेत्रों में होते थे, लेकिन सिद्धांत एक ही था विद्यार्थियों को गुरु (शिक्षक)/गुरु और उनके परिवार के साथ रहना होता था। यह प्रणाली लगभग 2500 वर्षों तक यथावत चलती रही। पाठशालाओं तथा शिक्षण संस्थाओं का विकास बहुत बाद में हुआ।
शिक्षा के उद्देश्य का पहला उल्लेख ऋग्वेद के 10 वें मंडल में पाया जाता है। इस मंडल के एक सूक्त में कहा गया है कि विद्या का उद्देश्य वेदों तथा कर्मकांड के ज्ञान के अतिरिक्त समाज में सम्मान प्राप्त करना, सभा-समिति में बोलने में सक्षम होना, उचित-अनुचित का बोध आदि है। इससे प्रतीत होता है कि पूर्व वैदिक युग में शिक्षा के उद्देश्य व्यावहारिक थे। बाद में, उपनिषद काल में ज्ञान का उद्देश्य अधिक सूक्ष्म हो गया। विद्या को दो भागों में बांटा गया– परा विद्या और अपरा विद्या। अपरा विद्या में प्रायः समस्त पुस्तकीय तथा व्यावहारिक ज्ञान आ गया। केवल ब्रह्म विद्या को परा विद्या माना गया। परा विद्या श्रेष्ठ मानी गई क्योंकि उससे मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष शिक्षा का अंतिम उद्देश्य हो गया। लेकिन यह लक्ष्य आदर्श ही रहा होगा, न कि व्यावहारिक, क्योंकि मोक्ष सभी के लिए साध्य नहीं हो सकता। इतिहासकार एएस अल्तेकर ने वैदिक शिक्षा के व्यावहारिक उद्देश्य बताये हैं जो निम्नलिखित हैं- सत्यवादिता, संयम, व्यक्तिगत शील, सफाई, शांत स्वभाव और उदारता आदि अच्छे चरित्र के गुण किसी भी पेशे– पुरोहित, शिक्षक, चिकित्सक, राजसेवक, व्यापारी या सैनिक- के लिए बुनियादी आवश्यकता के रूप में प्राचीन ग्रंथों में निर्धारित किये गए हैं। शिक्षा का उद्देश्य इन गुणों का विकास करना था। मनुस्मृति में कहा गया है कि निर्मल चरित्र का ब्राह्मण सभी वेदों का ज्ञान रखने वाले दुश्चरित्र ब्राह्मण से अच्छा होता है। शिक्षा आरम्भ करने के पूर्व उपनयन संस्कार होता था जिसमें भावी विद्यार्थी को नैतिक आचरण के नियमों का पालन करने का उपदेश दिया जाता था। इसी तरह शिक्षा के समापन पर भी गुरु उपदेश देता था।
उदाहरण के लिए तैत्तिरीय उपनिषद से दीक्षांत भाषण का एक अंश उद्धृत है :
“सच बोलो, धर्म का आचरण करो, वेदों का प्रतिदिन अभ्यास करो, माता पिता को देवतुल्य समझो, गुरु को देवतुल्य समझो। अतिथि को देवतुल्य समझो।”
प्रत्येक शिक्षार्थी को आत्मनिर्भरता, आत्म-संयम और जीवन में वर्ण और आश्रम के अनुरूप आचरण करने का कौशल सिखाया जाता था। विद्यार्थी भिक्षा मांगकर और शारीरिक श्रम करके अपना और गुरु के परिवार का भरण-पोषण करते थे। इससे आत्म-निर्भरता उत्पन्न होती थी। संयम विद्यार्थी-जीवन ही नहीं, समस्त जीवन का अनिवार्य अंग था और शिक्षा जीवन में इस पर बहुत बल दिया जाता था। अपने वर्ण से सम्बंधित कार्य कुशल ढंग से कर पाने की सामर्थ्य शिक्षा द्वारा दी जाती थी। साथ ही यह भी सिखाया जाता था कि विभिन्न आश्रमों [गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास] में किस तरह आचरण करना होगा। अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य सूक्त में कहा गया है कि गुरु, शिक्षार्थी को दुबारा जन्म देता है, अर्थात उसका मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक कायाकल्प कर देता है।
शिक्षा को गृहस्थ जीवन की भूमिका माना जाता था। गृहस्थ के अतिरिक्त सभी अन्य आश्रमों वाले व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं के लिए गृहस्थ पर निर्भर होते थे। इस तरह गृहस्थ न केवल अपने परिवार बल्कि अन्य वर्णों का भी पालन करता था। गुरु शिक्षार्थी को समाज में अपनी यह भूमिका निभाने में सक्षम बनाता था। इसके अतिरिक्त समाज को चलाने के लिए आवश्यक राजसेवक, न्यायाधीश, व्यापारी, पुरोहित तथा अन्य कुशल व्यक्ति गुरुकुलों द्वारा ही तैयार किये जाते थे। आरम्भ में आर्यों को लिपि का ज्ञान नहीं था। समाज के सामने चुनौती थी कि किस तरह मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी वेदों को अपने मूल रूप में सुरक्षित रखा जाय। भारत के प्राचीन गुरुकुलों की यह विलक्षण उपलब्धि थी कि वैदिक साहित्य लगभग दो हजार साल तक मौखिक रूप में जीवित ही नहीं, अक्षुण्ण भी रखा। वैदिक शिक्षा व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि पर बल देती थी। शिक्षित व्यक्ति को साहित्य, कला, संगीत आदि की समझ होनी चाहिए। उसे जीवन के उच्च आदर्शों का ज्ञान भी होना चाहिए। मात्र जीविकोपार्जन शिक्षा का उद्देश्य नहीं है।
कालिदास ने कहा है कि जो विद्या का उपयोग केवल कमाई के लिए करते हैं, वे विद्या के व्यापारी हैं जिनकी विद्या बिकाऊ माल भर है। वैदिक-संस्कृति ने आज भी कालान्तर से आज तक अपने अस्तित्व को बनाये रखा है, संस्कृति आज भी उतनी ही सशक्त, सुव्यवस्थित, सुसंगठित और अनुशासित है, जितनी कि सृष्टि के उदय के समय जो आश्चर्यजनक परन्तु अटल सत्य भी है। वैदिक संस्कृति सिन्धु घाटी सभ्यता के बाद अस्तित्व में आई, इसकी जानकारी वेदों से मिलने के कारण इसे वैदिक संस्कृति कहा जाता है। वैदिक शिक्षा भारत की सबसे प्राचीन शिक्षा व्यवस्था है। भारत में अतीत से ही वैदिक शिक्षा का प्रचलन था। जिस समय विश्व में शिक्षा नाम की कोई चीज नहीं थी, उस समय भारतीय समाज में वैदिक शिक्षा का प्रचलन था। वैदिक शिक्षा गुरुकुल में हुआ करती थी, शिष्य अपने गुरु के सान्निध्य में रहकर शिक्षा प्राप्त किया करता था। आज शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है और गुरु नाम की क़ोई चीज नहीं है। पहले एक सम्बन्ध था, आज पैसा एक सम्बन्ध हो गया है। नालंदा विश्वविद्यालय तो 600 साल के बाद पुनः खुल गया लेकिन गुरु-शिष्य परंपरा 600 साल भी कायम रहती है, एक प्रश्नचिन्ह है। अगर नहीं तो ऐसे विश्वविद्यालय कहीं भी खोले जा सकते हैं।
-संजय गोस्वामी
(ये लेखक के अपने विचार हैं)




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