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क्यों नहीं थम रहा देश में रैगिंग का रोग ?

आखिर देश में बढ़ती रैगिंग की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं, यह सवाल आज एक यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है। हिमाचल के बहुचर्चित अमन काचरु रैगिंग कांड के बाद भी विश्वविद्यालयों व कालेजों में रैगिंग का संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है। इसके बावजूद कि माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने रैगिंग पर पूर्ण प्रतिबंध का कानून लागू किया है, मगर देश में रैगिंग के बढ़ते मामलों से यह कानून मजाक बनता जा रहा हैै।

अब ऐसा ही मामला राजस्थान के एक आईटीआई कॉलेज से आया है जिसे जानकार आप भी हैरान रह जाएंगे। दरअसल, जयपुर में स्टूडेंट्स के साथ रैगिंग का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक छात्र के साथ क्लास रूम में मारपीट की जा रही है और रैगिंग के नाम पर गवर्नमेंट आईटीआई कॉलेज के सीनियर्स छात्र दबंगई कर रहे हैं।  सीनियर्स की तरफ से पहले चाकू की नोक पर छात्र को मुर्गा बनाया जाता है फिर उसके साथ मारपीट की जाती है। पूरा मामला 2 सितंबर का बताया जा रहा है। 

वायरल हो रहे वीडियो में छात्र सीनियर से हाथ जोड़कर विनती करता रहा, लेकिन सीनियर नहीं माना और लगातार उसे पीटे जा रहा था। इस पिटाई से छात्र को गंभीर चोटें आई हैं। उसके चेहरे पर ब्लैक स्पॉट पड़ गए हैं। साथ ही उसके शरीर के अन्य पार्ट और सिर में भी चोट आई है। बीते दिनों हिमाचल प्रदेश के वाकनाघाट में भी एक निजी विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष के एक छात्र से रैगिंग का मामला प्रकाश में आया था जिसमें रैगिंग के आरोपी तीन छात्रों को गिरफ्तार कर हॉस्टल व यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था। इससे पहले आईआईटी मंडी मे रैगिंग की घटना सामने आई थी। आईआईटी प्रबंधन ने आरोपी 10 छात्रों क़ो छः महीने विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया था तथा 72 छात्रों पर 15 से 25 हजार रूपये तक का जुर्माना लगाया गया था। 

शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग ने होने पाए, इसके लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की तरफ से कई कदम उठाए गए हैं। वहीं, शैक्षिणिक संस्थानों में रैगिंग ने होने पाए इसको लेकर यूजीसी भी सख्त है। समय-समय पर यूजीसी की तरफ से रैगिंग रोकने के लिए गाइडलाइंस भी जारी की जाती रहती है। बावजूद इसके शैक्षणिक संस्थानों से आए दिन रैगिंग की खबरें आती रहती हैं। 

पिछले दिनों यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के अध्यक्ष प्रो. एम. जगदीश कुमार ने ही बताया था कि एक जनवरी 2023 से 28 अप्रैल 2024 तक अलग-अलग यूनिवर्सिटी और उच्च शिक्षा संस्थानों से छात्रों की रैगिंग को लेकर 1240 शिकायतें मिली हैं, जिनमें से 1113 (89.76%) का निपटारा किया गया है। प्रो. जगदीश का कहना है कि जैसे ही UGC की एंटी रैगिंग हेल्पलाइन पर कोई छात्र मदद मांगता है, केस को तुरंत संबंधित यूनिवर्सिटी और कॉलेज के साथ-साथ पुलिस को भी फॉरवर्ड किया जाता है। इसके बावजूद क्यों नहीं थम पा रही हैं ये घटनाएं ?

हकीकत में देश में रैगिंग के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। रैगिंग के कारण प्रताड़ित छात्र आत्महत्या तक कर रहे हैं। पिछले दिनों एम्स बिलासपुर में भी एक मामला हो चुका है। वहाँ भी एक छात्रा ने आत्महत्या की कोशिश की थी, मगर बच गई थी। यूजीसी के आकड़ों के मुताबिक 2020 में देश में रैगिंग के 219 मामले सामने आये थे। 2021 में रैगिंग के 511 मामले हुए थे। 2019 में उतर प्रदेश के इटावा में सैफई मैडिकल विश्वविद्यालय में रैगिंग का मामला घटित हुआ था जहां सीनियर छात्रों ने 150 छात्रों के सिर मुंडवा दिए थे। यह एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के छात्र थे।

रैगिंग के मामलों में वृद्वि खतरनाक साबित हो रही है। वर्ष 2018 में एक मामला मध्यप्रदेश के भोपाल में घटित हुआ था जहां रैगिंग से तंग आकर बीफार्मा की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली थी। छात्रा के सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस ने चार लड़कियों व एक अध्यापिका को गिरफ्तार किया था। रैगिंग की इससे पहले भी कई जघन्य वारदातें हो चुकी थीं। इतनी वारदातें होने के बाद भी इन घटनाओं पर रोक नहीं लग रही है। रैगिंग छात्रों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। रैगिंग की इन वारदातों से छात्र खौफजदा होते जा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो छात्रों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं क्योंकि इन बारदातों से अभिभावक भी अपने बच्चों को असुरक्षित समझ रहे हैं। 

रैगिंग का साधरण सा अर्थ एक दूसरे का परिचय जानना होता था, मगर अब इसका स्वरुप बदलता जा रहा है। रैगिंग अब यातना बन गई है। छात्रों को मानसिक रुप से प्रताडित किया जाता है, मारपीट की जाती है। आज तक पता नहीं कितने छात्र-छात्राएं रैगिंग के कारण असमय मौत के मुह में जा चुके हैं। उतरप्रदेश के इटावा में घटित घटना ने एक नई बहस को जन्म दिया था। देश के शिक्षण संस्थानों मेें प्रतिबन्ध के बाद भी यह मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। बीते हादसों से न तो प्रशासन ने सबक सीखा और न ही छात्रों ने सीख ली। यदि कड़े कदम उठाए होते तो आज ऐसे हादसे न हो रहे होते। यह एक यक्ष प्रशन बनता जा रहा है।

रैगिंग की यह बीमारी विश्वविद्यालयों, कालेजों के बाद अब स्कूलों में भी अपने पांव पसार चुकी है। यदि इस पर समय रहते रोक न लगाई गई, तो आने वाले समय में घातक परिणाम भुगतने पड़ेंगे। देश में समय-समय पर ऐसे दुखद हादसे होते रहते हैं मगर यह रुकने के बजाए निर्बाध रुप से बढ़ते ही जा रहे हैं। समाचार पत्रों की खबरों के अनुसार मई में मुम्बई के ठाणें में रैगिंग से तंग आकर एक छात्र ने ट्रेन के आगे कटकर आत्महत्या कर ली। दिल्ली के स्कूल आफ प्लानिगं एंड आर्किटैक्चर का एक होनहार छात्र रैगिंग के चलते अपाहिज हो गया। आरोप है कि प्रथम वर्ष के छात्र नवीन कुजुर को उसके सीनियर ने ऐसी यातनाएं दी कि वह चलने फिरने के काबिल नहीं रहा।

आन्ध्र प्रदेश में एक कालेज में सीनियर छात्राओं ने जूनियर छात्रा की रैगिंग ली, उनकी यातना से उस छात्रा ने अपनी आवाज खो दी थी। एक अन्य घटना में छात्र को क्लास में लड़की कहा जाता था। छात्रों की इस हरकत से तंग आकर उस छात्र ने खुद को आग लगा दी थी। मुम्बई में एक कालेज में सीनियर छात्राओं ने एक जूनियर छात्रा को मिर्ची खिलाई और उठक-बैठक करवाई। कोलकाता में एक कालेज में सीनियर जूनियर को ड्रग्स लेने के लिए मजबूर करते हैं और पिटाई करते हैं। उतर प्रदेश में सरकार ने रैगिंग के खिलाफ अभियान छेड़ा है तथा रैगिंग करने वाले छात्रों को पांच साल तक दाखिला न देने को कड़ा फैसला लिया है।

एक समय था कि कालेजो में रैगिंग का नाम तक नहीं था, मगर पिछले कुछ सालों से रैगिंग के आंकड़ों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होती जा रही है। कालेज के कुछ बिगड़ैल किस्म के छात्र -छात्राएं कालेज का माहौल बिगाड़ने में मशगुल रहते हैं। ऐसे मुट्ठीभर लोग छात्रों को अनावश्यक रुप से तंग कर रहे हैं, ऐसे उद्दंड लोगों को कानून के मुताबिक सजा देनी चाहिए। आज यह रैगिंग भयानक होती जा रही है। बीते सालों में हिमाचल के सुन्दरनगर के पौलिटैक्निक कालेज में भी रैगिंग की वारदात प्रकाश में आई थी जिसमें सिरमौर का एक छात्र रैगिंग का शिकार हुआ था। हालांकि कालेज प्रशासन ने उन सीनियर लडकों को कालेज से निकाल दिया, पर कालेज से निकालना इसका समाधान नहीं है। 

केन्द सरकार व विश्वविद्यालय अनुदान आयेग को इन मामलों पर संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। छात्र -छात्राएं रैगिंग के डर से प्रवेश नही लेंगे। कालेजों में अराजकता पैदा करने वाले तत्वों पर कार्रवाई करनी चाहिए। इनके कारण कई प्रतिभाएं खत्म हो रही हैं। ऐसे लोगों को सजा दी जाए तथा जुर्माना लगाया जाए। ऐसी भी रैगिग की छात्र पढ़ाई तक छोड़ देते हैं। आज तक हजारों छात्र इस बीमारी का शिकार हो चुके हैं। फिर भी यह प्रवृति रुकने का नाम नहीं ले रही है। जनमानस को एकजुट होकर इसका खात्मा करना होगा ताकि छात्र-छात्राएं निर्भिक होकर अपनी पढाई कर सकें। रैगिंग के बढ़ते जाल को काटना होगा ताकि भविष्य में इन घटनाओं की पुनरावृति न हो और शिक्षण संस्थानों में माहौल खराब न हो सके। इस बुराई के विरुद्व एक आन्दोलन करना होगा और प्रतिभावान छात्रों को बचाना होगा। रैगिंग का समूल नाश करना चाहिए ताकि यह नासूर न बन पाए। सरकारों को इन मामलों पर संज्ञान लेना होगा तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। यही देश हित में हैl

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि रैगिंग करने वाले छात्र मनोविकृति के शिकार रहते हैं। वे डिप्रेशन में रहते हैं। ऐसे में जब कोई नवागत छात्र उनके संपर्क में आता है तब ऐसे सीनियर छात्र अपनी भड़ास नवागत के साथ साझा करते हैं। इसी क्रम में रैगिंग की घटनाएं मूर्त रूप लेती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि विश्वविद्यालय अथवा कॉलेज प्रशासन को ऐसे छात्रों को समय-समय पर काउंसलिंग कराने की जरूरत है, तभी ऐसी घटनाओं में कमी आएगी।

– रमेश प्रसाद
(ये लेखक के अपने विचार हैं )

 

Asmita Sarkar

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