IIT Bombay में हाल में एक छात्र की मौत और इस साल कैंपस में छात्र की आत्महत्या का यह तीसरा मामला सामने आने के बाद देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में पढ़ाई के दबाव और छात्रों की मानसिक स्थिति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।
कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों में छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। हालांकि, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों यानी IITs में प्रवेश के बाद भी छात्रों पर बना रहने वाला दबाव अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है।
RTI से मिली जानकारी और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर किए गए एक विश्लेषण के अनुसार, जनवरी 2006 से सितंबर 2026 के बीच अलग-अलग IIT कैंपस में 171 छात्रों की आत्महत्या या अन्य असामान्य परिस्थितियों में मौत दर्ज की गई। इनमें से 120 मौतें पिछले 10 वर्षों में हुईं।
ये आंकड़े उस धारणा पर सवाल खड़े करते हैं कि IIT में प्रवेश की प्रतिष्ठा के लिए छात्रों पर इतना अधिक मानसिक दबाव स्वीकार्य है। IIT की डिग्री निश्चित रूप से आकर्षक अवसर देती है, लेकिन पूरे करियर को देखें तो ज्यादातर IIT स्नातक अपने क्षेत्र के सक्षम गैर-IIT स्नातकों की तुलना में हमेशा बेहतर प्रदर्शन करते रहें, ऐसा जरूरी नहीं है।
इस बात को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि लंबे समय में IIT की डिग्री से मिलने वाला लाभ कितना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि IIT से पढ़ाई करने वाले छात्रों को करियर की शुरुआत में मजबूत बढ़त मिलती है।
IIT Bombay के 2024-25 अकादमिक सत्र के प्लेसमेंट आंकड़ों के अनुसार, कुल 1,422 ऑफर स्वीकार किए गए, जिनमें औसत सालाना पैकेज करीब 26.5 लाख रुपये रहा। वहीं, 705 पैकेज 20 लाख रुपये से अधिक के थे।
लेकिन करियर की शुरुआत में मिलने वाला यह फायदा जरूरी नहीं कि पूरी नौकरी के दौरान भी बना रहे। 10 से 15 साल के करियर अनुभव के बाद IIT के पूर्व छात्रों का अच्छा वेतन पैकेज आम तौर पर 1 करोड़ रुपये सालाना से नीचे रहता है और करीब 10 प्रतिशत लोग ही इस स्तर को पार कर पाते हैं।
करियर में असाधारण सफलता हासिल करने वाले लगभग 1 प्रतिशत लोग बहुत कम संख्या में होते हैं। इसके बावजूद उनकी सफलता की कहानियों को अक्सर IIT के सपने को बढ़ावा देने के लिए सामने रखा जाता है।
लंबे समय में गैर-IIT संस्थानों से पढ़े छात्र भी करियर ग्रोथ और संपत्ति बनाने के मामले में अपने IIT समकक्षों के बराबर पहुंचते हैं। लंबे समय तक किए गए शैक्षणिक और करियर संबंधी अध्ययनों से पता चलता है कि गैर-IIT पेशेवरों में भी शीर्ष 10 प्रतिशत लोग 1 करोड़ रुपये से कहीं अधिक कमाते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जिन्होंने कारोबार शुरू किया और बड़ी संख्या में रोजगार पैदा किए।
देश के शीर्ष कारोबारी वर्ग में गैर-IIT पृष्ठभूमि वाले ऐसे उद्यमी भी हैं जिन्होंने सैकड़ों और हजारों करोड़ रुपये की कंपनियां खड़ी की हैं। इससे साफ है कि सफलता हासिल करने के लिए किसी प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान की डिग्री अनिवार्य शर्त नहीं है।
IIT की डिग्री का असली फायदा क्या है?
IIT की डिग्री का सबसे बड़ा फायदा शायद यह है कि वह एक तरह की सुरक्षा व्यवस्था प्रदान करती है। किसी भी कॉलेज से पढ़े प्रतिभाशाली छात्र समय के साथ आय और कारोबार के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं। लेकिन सामान्य कॉलेजों से पढ़े संघर्ष कर रहे छात्रों के लिए करियर में आगे बढ़ना अक्सर IIT से निकले छात्रों की तुलना में ज्यादा कठिन होता है।
IIT का मजबूत ब्रांड शुरुआती करियर में एक न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। आर्थिक मंदी या करियर के शुरुआती दौर में गलत फैसलों के समय भी IIT की डिग्री कई छात्रों को बेहतर अवसर हासिल करने में मदद कर सकती है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक सुरक्षा छात्रों पर पड़ने वाले अत्यधिक मानसिक दबाव को सही ठहरा सकती है?
समाज ने IIT प्रवेश परीक्षा को कई बार बुद्धिमत्ता, सफलता और व्यक्ति की योग्यता का एकमात्र पैमाना बना दिया है। 17 साल की उम्र में IIT की प्रवेश परीक्षा पास करना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन परीक्षा में असफल होना किसी भी छात्र के जीवन की अंतिम असफलता नहीं माना जाना चाहिए।
IIT की डिग्री करियर की शुरुआत में कई दरवाजे खोल सकती है, लेकिन यह जीवनभर की सफलता की गारंटी नहीं देती। इसी तरह IIT में प्रवेश न मिलना भी किसी छात्र को भविष्य में सफलता हासिल करने से नहीं रोकता।
प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ने की इच्छा और वहां प्रवेश पाने की कोशिश एक सकारात्मक शैक्षणिक लक्ष्य होना चाहिए। इसे ऐसा मानसिक बोझ नहीं बनना चाहिए जिसकी कीमत किसी युवा की जिंदगी हो।




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