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शिक्षा से बदलेगा ग्रामीण भारत, लेकिन स्कूलों में सुधार की अब भी दरकार

ग्रामीण भारत में एक सरकारी स्कूल किसी बच्चे के लिए बेहतर भविष्य का रास्ता खोल सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए, जहां माता-पिता खुद कभी स्कूल नहीं जा पाए। ऐसे परिवारों में बच्चे की शिक्षा केवल उसकी जिंदगी नहीं बदलती, बल्कि पूरे परिवार के लिए नए अवसर पैदा करती है।

पढ़ा-लिखा बच्चा अपनी मां को जमीन से जुड़े दस्तावेज पढ़ने में मदद कर सकता है, तो पिता गलत मेडिकल बिल पर सवाल उठा सकते हैं। किशोर उम्र का कोई विद्यार्थी बिना किसी दूसरे की मदद के छात्रवृत्ति के लिए आवेदन कर सकता है। वहीं, एक लड़की प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होकर ऐसे करियर का सपना देख सकती है, जिसके बारे में उसके माता-पिता को कभी सोचने का अवसर नहीं मिला।

शिक्षा ने बढ़ाए अवसर, अब गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत

भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में लंबा सफर तय किया है। वर्ष 1951 में देश की केवल 18.33 प्रतिशत आबादी साक्षर थी। आज सात वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में साक्षरता दर 80 प्रतिशत से ज्यादा हो चुकी है। कुछ ही पीढ़ियों के दौरान भारत ने साक्षरता और स्कूली शिक्षा तक पहुंच का बड़े स्तर पर विस्तार किया है।

यह प्रगति कई दशकों के प्रयासों का परिणाम है। शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गई। समग्र शिक्षा अभियान, पीएम पोषण योजना और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसी योजनाओं ने स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने, बच्चों को पोषण उपलब्ध कराने और वंचित समुदायों की लड़कियों तक शिक्षा पहुंचाने में मदद की है।

UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, देशभर के 14 लाख से अधिक स्कूलों में करीब 24.7 करोड़ विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे हैं। यह संख्या इतनी बड़ी है कि अगर भारत की स्कूली शिक्षा हासिल कर रही आबादी को एक अलग देश माना जाए, तो वह दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल होगा।

भारत ने बड़े स्तर पर बच्चों को स्कूलों तक पहुंचाने में सफलता हासिल की है। अब जरूरत इस बात पर ध्यान देने की है कि स्कूलों में पढ़ाई के दौरान बच्चों को किस स्तर की शिक्षा मिल रही है और वे वास्तव में कितना सीख पा रहे हैं।

सरकारी स्कूलों में घटती हिस्सेदारी और बीच में पढ़ाई छोड़ने की चुनौती

पिछले एक दशक में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का अनुपात घटा है, हालांकि कुल मिलाकर स्कूलों में बच्चों का नामांकन अभी भी काफी अधिक है। माता-पिता बच्चों के लिए स्कूल चुनते समय कई बातों पर ध्यान देते हैं। इनमें अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई, अनुशासन, सामाजिक प्रतिष्ठा और बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद शामिल हैं।

माता-पिता के ये फैसले इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि सरकारी स्कूलों को परिवारों का भरोसा लगातार मजबूत करने की जरूरत है।

बच्चों की उम्र बढ़ने के साथ शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ने लगती हैं। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ जाती है। शिक्षा का अधिकार कानून 14 वर्ष तक के बच्चों को कवर करता है, जबकि इसी उम्र के आसपास कई विद्यार्थी माध्यमिक शिक्षा की ओर बढ़ रहे होते हैं।

भारत में प्राथमिक स्कूलों की संख्या माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों से काफी अधिक है। दूरदराज के गांवों में आगे की पढ़ाई जारी रखना कई बार मुश्किल हो जाता है। विद्यार्थियों को रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। लड़कियों को इसके अलावा कई तरह की सामाजिक और पारिवारिक बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है।

लंबी दूरी, परिवहन की सीमित सुविधा, सुरक्षा की चिंता, घर की जिम्मेदारियां और सामाजिक अपेक्षाएं जैसे कारण यह तय कर सकते हैं कि कोई बच्चा आगे पढ़ाई जारी रख पाएगा या नहीं।

इसलिए प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक बच्चों की पढ़ाई का सिलसिला बनाए रखना जरूरी है। हर जगह कक्षा एक से 12वीं तक की पढ़ाई एक ही स्कूल में उपलब्ध कराना संभव नहीं है। ऐसे में बेहतर परिवहन व्यवस्था, जरूरत के अनुसार छात्रावास और प्राथमिक से माध्यमिक स्कूलों में दाखिले की आसान प्रक्रिया जरूरी है। किसी बच्चे की पढ़ाई कितनी आगे तक जाएगी, यह उसके गांव या भौगोलिक स्थिति से तय नहीं होना चाहिए।

शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। गणित और विज्ञान जैसे विषयों में यह परेशानी अधिक दिखाई देती है। कई जगह एक ही शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं और सीखने के अलग-अलग स्तर वाले बच्चों को पढ़ाना पड़ता है। माध्यमिक स्तर पर किसी विषय के शिक्षक की कमी का असर खासतौर पर परीक्षा के महत्वपूर्ण वर्षों में पड़ सकता है।

शुरुआती कक्षाओं में पढ़ना और समझना सीखना जरूरी

बच्चे सबसे पहले पढ़ना सीखते हैं। इसके बाद उनसे उम्मीद की जाती है कि वे पढ़कर दूसरे विषयों को समझें और सीखें।

शुरुआती कक्षाओं में पढ़ने और गणित की बुनियादी समझ कमजोर रह जाने पर आगे चलकर सीखने में बड़ी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। जो बच्चा किसी अनुच्छेद का अर्थ समझने में परेशानी महसूस करता है, उसे आगे विज्ञान, इतिहास और गणित जैसे विषयों को समझने में भी दिक्कत हो सकती है।

ऐसी स्थिति में कई बार रटकर याद करना पढ़ाई का तरीका बन जाता है। विद्यार्थी किसी परिभाषा को सही-सही दोहरा तो सकता है, लेकिन उसका अर्थ समझाने या उसे किसी स्थिति में इस्तेमाल करने में असमर्थ हो सकता है।

इसलिए साक्षरता का मतलब केवल पढ़ना और लिखना नहीं है। इसमें पढ़ी हुई बात को समझना, तर्क करना, ज्ञान का इस्तेमाल करना और आसपास की दुनिया को समझने की क्षमता भी शामिल है।

भारत में स्कूलों तक पहुंच बढ़ने के साथ अब शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। स्कूली शिक्षा के अगले चरण में बच्चों के वास्तविक सीखने पर विशेष ध्यान देना होगा।

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए तीन क्षेत्रों पर ध्यान जरूरी

शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए तीन क्षेत्रों पर खास ध्यान देने की जरूरत है।

पहला, शिक्षकों को बेहतर सहयोग और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। भारत में शिक्षक प्रशिक्षण की एक बड़ी व्यवस्था पहले से मौजूद है। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशिक्षण अधिक उपयोगी, व्यावहारिक और कक्षा में आने वाली वास्तविक समस्याओं से जुड़ा हो।

शिक्षकों को उन चुनौतियों से निपटने में मदद मिलनी चाहिए, जिनका सामना वे रोजाना करते हैं। इनमें कठिन विषयों को आसान तरीके से समझाना, अलग-अलग स्तर पर सीख रहे बच्चों को एक साथ पढ़ाना, तकनीक का सही इस्तेमाल करना और पढ़ाई में पीछे रह रहे विद्यार्थियों की पहचान करना शामिल है।

शिक्षण को एक सम्मानजनक पेशे के रूप में भी देखा जाना चाहिए। शिक्षक बच्चों की सोच, सीखने की क्षमता और आत्मविश्वास को आकार देते हैं। इसलिए समाज में उनके काम और भूमिका को उचित सम्मान मिलना जरूरी है।

दूसरा, तकनीक का इस्तेमाल सोच-समझकर और स्पष्ट उद्देश्य के साथ होना चाहिए। स्मार्ट बोर्ड, टैबलेट या इंटरनेट कनेक्शन तभी उपयोगी साबित हो सकते हैं, जब उनके साथ अच्छी शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध हो और शिक्षक उनका सही तरीके से इस्तेमाल कर सकें।

तकनीक कठिन पाठों को समझाने, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध न होने वाले विषय विशेषज्ञों का ज्ञान विद्यार्थियों तक पहुंचाने और दूरदराज के इलाकों के बच्चों को बेहतर अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है। दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए, भले ही उनके आसपास किसी खास विषय का विशेषज्ञ शिक्षक उपलब्ध न हो। सही इस्तेमाल होने पर तकनीक शिक्षकों की पहुंच बढ़ा सकती है और कक्षा में होने वाली पढ़ाई को अधिक प्रभावी बना सकती है।

तीसरा, स्कूलों में अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है।

जब परिवार स्कूल को अपनी जिम्मेदारी और उसका हिस्सा मानते हैं, तो स्कूल व्यवस्था मजबूत होती है। अभिभावकों के साथ नियमित बातचीत और स्कूल प्रबंधन समितियों को मजबूत बनाने से बच्चों की उपस्थिति सुधारने, समस्याओं की समय रहते पहचान करने और पढ़ाई छोड़ने के जोखिम वाले विद्यार्थियों की मदद करने में सहायता मिल सकती है। लड़कियों और उन बच्चों के लिए यह खासतौर पर महत्वपूर्ण है, जिनकी पढ़ाई पारिवारिक या आर्थिक दबाव के कारण बीच में छूट सकती है।

भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बन सकती है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बच्चे अपने स्कूली जीवन में कितना और क्या सीखते हैं। देशभर में स्कूलों का विस्तार हुआ है और करोड़ों बच्चों को कक्षाओं तक पहुंचाया गया है। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल में बिताए गए वर्ष हर बच्चे को पढ़कर समझने, गणित का इस्तेमाल करने, सवाल पूछने, समस्याओं का हल निकालने और लगातार सीखते रहने की क्षमता दें।

शिक्षा की असली सफलता केवल स्कूल की चारदीवारी के भीतर नहीं मापी जा सकती। इसका वास्तविक महत्व उन अवसरों, आत्मविश्वास और क्षमताओं में दिखाई देता है, जिन्हें एक बच्चा स्कूल से बाहर निकलने के बाद अपने जीवन में इस्तेमाल कर पाता है।

Raish Ahmed

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