कल्पना कीजिए कि 10 साल की एक बच्ची ने अभी-अभी कहानी लिखने के तरीके पर एक पाठ पढ़ा है। अब सोचिए कि उसे किसी प्रकाशित लेखक से सीधे सवाल पूछने का मौका मिले कि आपको कहानियों के विचार कहां से मिलते हैं? लेखक उसे बताता है कि उसकी पहली कहानी का शुरुआती मसौदा बहुत खराब था और उसने उसे बेहतर बनाने के लिए क्या किया।
दोनों ही बच्चों ने कुछ नया सीखा, लेकिन इनमें से एक बच्ची को अब यह समझ आ गया है कि लेखन केवल किताबों में पढ़ने का विषय नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में लोग इसे अपना पेशा भी बनाते हैं। उसे यह भरोसा भी मिला कि वह खुद भी एक दिन लेखिका बन सकती है।
यही अंतर मेंटरशिप यानी किसी अनुभवी व्यक्ति के मार्गदर्शन से सीखने का है। किताबें हमें पहले से उपलब्ध ज्ञान और जानकारियां देती हैं, जबकि मेंटर बताते हैं कि उस ज्ञान का इस्तेमाल करके वास्तविक जीवन में किस तरह आगे बढ़ा जा सकता है।
किताबों और शिक्षकों से आगे बढ़कर मेंटर से सीखना क्यों है फायदेमंद?
मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा ने ‘सेल्फ-एफिकेसी’ यानी खुद की क्षमता पर विश्वास की अवधारणा पर महत्वपूर्ण काम किया है। इसका मतलब है कि किसी बच्चे को यह भरोसा होना कि ‘मैं यह काम कर सकता हूं’। उनका शोध बताता है कि इस विश्वास को विकसित करने में चार चीजें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें सबसे प्रभावी है किसी कठिन काम को सफलतापूर्वक पूरा करने का अपना अनुभव।
इसके अलावा, अपने जैसे किसी दूसरे व्यक्ति को सफल होते देखना, किसी सम्मानित व्यक्ति से प्रोत्साहन मिलना और घबराहट या तनाव को संभालना भी आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करता है।
एक अच्छा मेंटर इन सभी तरीकों से बच्चे की मदद कर सकता है। वह बच्चे को करीब से दिखाता है कि सफलता पाने के लिए किस तरह काम करना पड़ता है। वह उसके प्रयासों को सही दिशा देता है और केवल सामान्य तारीफ करने के बजाय सुधार के लिए स्पष्ट सुझाव देता है।
उदाहरण के लिए, जब कोई अनुभवी लेखक किसी बच्चे से कहता है कि तुम्हारा विचार अच्छा है, लेकिन कहानी के अंत को थोड़ा और बेहतर बनाने की कोशिश करो, तो इस सलाह का महत्व अलग होता है। क्योंकि यह सलाह उस व्यक्ति से मिल रही है, जो खुद लेखन के क्षेत्र में काम करता है।
मेंटरशिप पर शोध क्या बताते हैं?
मेंटरशिप के प्रभाव को समझने के लिए 73 से अधिक स्वतंत्र मार्गदर्शन कार्यक्रमों का विश्लेषण किया गया। इसमें सामाजिक व्यवहार, भावनात्मक विकास, आदतों और शैक्षणिक प्रदर्शन जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक और उत्साहजनक परिणाम सामने आए। हालांकि, इनका प्रभाव आमतौर पर सीमित से मध्यम स्तर का पाया गया और यह काफी हद तक मेंटर तथा बच्चे के बीच संबंधों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
इसी तरह, 2014 में प्रकाशित चर्चित सर्वेक्षण ‘द मेंटरिंग इफेक्ट’ में अमेरिका के 1,100 से अधिक युवाओं से उनके अनुभवों के बारे में पूछा गया था।
सर्वेक्षण में जोखिम वाली परिस्थितियों से गुजर रहे युवाओं के बीच यह पाया गया कि मेंटर का मार्गदर्शन पाने वाले 76 प्रतिशत युवाओं की इच्छा कॉलेज में दाखिला लेने और अपनी पढ़ाई पूरी करने की थी। वहीं, जिन युवाओं को मेंटर नहीं मिला था, उनमें यह आंकड़ा 56 प्रतिशत था।
इसके अलावा, मेंटर का मार्गदर्शन पाने वाले 51 प्रतिशत युवाओं ने किसी न किसी नेतृत्व की भूमिका निभाई थी, जबकि बिना मेंटर वाले युवाओं में यह आंकड़ा 22 प्रतिशत था।
हालांकि, इस सर्वेक्षण में युवाओं से उनके अपने अनुभवों के आधार पर जानकारी ली गई थी। इसमें अमेरिका के उन युवाओं पर ध्यान दिया गया था, जो पहले से जोखिम वाली परिस्थितियों में थे। इसलिए इसके नतीजों को सभी बच्चों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी यह अध्ययन बताता है कि किसी भरोसेमंद व्यक्ति का मार्गदर्शन युवाओं को बड़े लक्ष्य तय करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
विशेषज्ञों की राय: मेंटरशिप से बच्चों में क्या बदलाव आता है?
बच्चों के विकास में मेंटर और वास्तविक कार्यक्षेत्र के विशेषज्ञों की भूमिका समझने के लिए एक TEDx वक्ता (मेंटर-1), एक प्रकाशित लेखक (मेंटर-2) और एक उद्योग विशेषज्ञ (मेंटर-3) से बातचीत की गई। उन्होंने मेंटरशिप के महत्व पर अपने विचार साझा किए।
बच्चों में शुरुआती उम्र से आत्मविश्वास विकसित होना क्यों जरूरी है?
मेंटर-1: बचपन में विकसित होने वाला आत्मविश्वास तय करता है कि बच्चा कक्षा में हाथ उठाकर सवाल पूछेगा या चुप रहना पसंद करेगा। जब बच्चे यह समझने लगते हैं कि मेहनत करने से सुधार होता है, तो वे नई चीजें आजमाने का साहस करते हैं। इसी तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से किसी भी कौशल का विकास होता है।
एक मेंटर बच्चे के करियर की दिशा तय करने में कैसे मदद कर सकता है?
मेंटर-2: बच्चे उन्हीं पेशों के बारे में सोच सकते हैं, जिनके बारे में उन्हें जानकारी होती है। जब उनकी मुलाकात ऐसे व्यक्ति से होती है, जो लेखन, निर्माण या डिजाइनिंग जैसे काम को अपना पेशा बना चुका है, तो उनके लिए करियर का एक अस्पष्ट विचार वास्तविक और हासिल किया जा सकने वाला लक्ष्य बन जाता है।
बच्चों को असफलता के बारे में क्या सीखना चाहिए?
मेंटर-3: वास्तविक कामकाज की दुनिया में कोई भी व्यक्ति पहली कोशिश में हर काम सही नहीं करता। मैं चाहता हूं कि बच्चे यह समझें कि गलती होना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। गलती से मिली जानकारी हमें सुधार का मौका देती है। इसे अपनी योग्यता पर सवाल मानकर नहीं देखना चाहिए।
रटकर सीखने के बजाय काम करके सीखना बेहतर क्यों है?
मेंटर-1: रटकर सीखने से आप अगले दिन की परीक्षा पास कर सकते हैं, लेकिन किसी चीज को खुद बनाकर या करके सीखने से सोचने और समस्या का हल निकालने की क्षमता विकसित होती है। इसका फायदा लंबे समय तक मिलता है।
माता-पिता को बच्चे के लिए मेंटर चुनते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
मेंटर-2: अच्छा मेंटर वह है, जो केवल अपनी बात न करे, बल्कि बच्चे की बात भी ध्यान से सुने। उसे ऐसे काम करने का मौका दे, जिनसे वह कुछ सीख सके और उसकी गलतियों पर ईमानदारी से लेकिन संवेदनशील तरीके से सुझाव दे।
प्रोजेक्ट के जरिए सीखना बनाम रटने की आदत: शोध क्या कहते हैं?
पहाड़े याद करना और शब्दों की सही स्पेलिंग सीखना भी पढ़ाई का जरूरी हिस्सा है। समस्या तब शुरू होती है, जब पूरी शिक्षा केवल याद करने तक सीमित हो जाती है। कई बार बच्चे किसी सवाल का जवाब तो याद कर लेते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पाते कि उस जानकारी का इस्तेमाल वास्तविक परिस्थितियों में कैसे करना है।
इसका एक बेहतर विकल्प प्रोजेक्ट आधारित शिक्षा (Project-Based Learning यानी PBL) है। इसमें बच्चे केवल किताबों से जानकारी याद नहीं करते, बल्कि किसी सवाल या समस्या पर काम करते हैं और उसके समाधान के लिए खुद प्रयास करते हैं।
इस तरीके के पक्ष में किए गए शोध में 46 स्कूलों के तीसरी कक्षा के 2,371 विद्यार्थियों पर एक अध्ययन शामिल है। इसमें पाया गया कि प्रोजेक्ट आधारित पढ़ाई से बच्चों के विज्ञान विषय के प्रदर्शन में सुधार हुआ। यह फायदा विद्यार्थियों की जाति, लिंग, आर्थिक स्थिति या पढ़ने की क्षमता से प्रभावित नहीं था।
मानकीकृत विज्ञान परीक्षा में विद्यार्थियों के प्रदर्शन में लगभग 10 पर्सेंटाइल अंकों का सुधार दर्ज किया गया। एक अन्य अध्ययन में एडवांस्ड प्लेसमेंट (AP) पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों पर प्रोजेक्ट आधारित पढ़ाई के प्रभाव का आकलन किया गया। इसमें एक वर्ष के दौरान इस तरीके से पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने परीक्षा में अपने दूसरे साथियों की तुलना में 8 प्रतिशत बेहतर प्रदर्शन किया।
हालांकि, इन अध्ययनों में अच्छी योजना के साथ तैयार किए गए प्रोजेक्ट, मजबूत पाठ्यक्रम और प्रशिक्षित शिक्षकों की भूमिका थी। केवल वर्कशीट के साथ कोई छोटी-मोटी गतिविधि जोड़ देने से ऐसे परिणाम नहीं मिल सकते। एक अच्छे प्रोजेक्ट में वास्तविक सवाल, लगातार प्रयास, सही मार्गदर्शन और अंत में दिखाने या प्रस्तुत करने के लिए कोई ठोस काम होना चाहिए।
बच्चे के लिए अच्छा मेंटर चुनते समय इन बातों पर दें ध्यान
यदि माता-पिता अपने बच्चे के लिए कोई मेंटरशिप कार्यक्रम चुन रहे हैं, तो कुछ बातों को जरूर देखना चाहिए।
सबसे पहले, मेंटर को उस क्षेत्र का वास्तविक अनुभव होना चाहिए, जिसके बारे में वह बच्चों को सिखा रहा है। केवल सैद्धांतिक जानकारी देने के बजाय उसे उस काम का व्यावहारिक अनुभव भी होना चाहिए।
कार्यक्रम में बच्चों की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। उन्हें सवाल पूछने, खुद काम करने और अपने काम पर सुझाव पाने का मौका मिलना चाहिए। केवल किसी विशेषज्ञ का भाषण सुनना पर्याप्त नहीं है।
इसके अलावा, बच्चों को कोई वास्तविक प्रोजेक्ट पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए। उदाहरण के लिए, वे अपनी कहानी लिख सकते हैं, कोई मॉडल तैयार कर सकते हैं या प्रेजेंटेशन बना सकते हैं।
एक अच्छे मेंटर को बच्चे के काम की ईमानदारी से समीक्षा करनी चाहिए। उसे यह बताना चाहिए कि बच्चे ने क्या अच्छा किया और कहां सुधार की जरूरत है। साथ ही, ऐसा माहौल होना चाहिए जहां बच्चा गलती करने से डरे नहीं, बल्कि उसे सीखने का अवसर समझे।
किताबें ज्ञान देती हैं, मेंटर उसे इस्तेमाल करना सिखाते हैं
बच्चों का आत्मविश्वास किसी एक दिन में विकसित नहीं होता। यह छोटे-छोटे अनुभवों, लगातार अभ्यास और ऐसे लोगों के मार्गदर्शन से बनता है, जो उनकी बात को गंभीरता से सुनते और उनकी क्षमता को समझते हैं।
किताबें बच्चों को ज्ञान देती हैं, जबकि मेंटर उन्हें यह समझने में मदद करते हैं कि उस ज्ञान का वास्तविक जीवन में क्या महत्व है और उससे आगे बढ़ने के कौन-कौन से रास्ते खुल सकते हैं।
इसलिए माता-पिता को बच्चे की शिक्षा के लिए केवल यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि वह क्या सीखेगा, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि उसे सिखाने और मार्गदर्शन देने वाला व्यक्ति कौन होगा।




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