
हाल ही में भारत सरकार ने पांच नई भाषाओं को ‘शास्त्रीय’ (क्लासिकल) भाषाओं की श्रेणी में शामिल किया है। ये भाषाएं मराठी, पाली, प्राकृत, असमी एवं बांग्ला हैं। संस्कृत, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम और उड़िया पहले से ही इस सूची में हैं। इस प्रकार अब देश में मान्यता प्राप्त शास्त्रीय भाषाओं की संख्या 11 हो गई है।
शास्त्रीय भाषाएं स्वतंत्र परंपराओं और समृद्ध साहित्यिक इतिहास वाली प्राचीन भाषाएं हैं जो विभिन्न साहित्यिक शैलियों और दार्शनिक ग्रंथों को प्रभावित करती रहती हैं। शास्त्रीय भाषाएं भारत की गहन और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के रूप में काम करती हैं, जो प्रत्येक समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मील के पत्थर का सार है।
सांस्कृतिक विविधता एवं समृद्धि की दृष्टि से भारत विश्व में अतुलनीय स्थान रखता है। ‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी’ की विशिष्टता वाले हमारे देश में अनेक प्राचीन भाषाएं हैं, जो अभी भी प्रचलन में हैं। यह सच है कि कुछ भाषाएं अध्ययन एवं अनुसंधान समेत कुछ विशेष कार्यों के लिए प्रयुक्त होती हैं, पर वे विलुप्त नहीं हुई हैं। शास्त्रीय भाषाएं भारत की गहन और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के रूप में काम करती हैं, जो प्रत्येक समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मील के पत्थर का सार है।
ऐसे में सरकार भारत की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने के लिए शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए कदम उठा रही है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह ज़रूरी भी है। शास्त्रीय भाषा के रूप में भाषाओं को शामिल करने से रोजगार के महत्वपूर्ण अवसर भी पैदा होंगे, खासकर अकादमिक और रिसर्च के क्षेत्र में। इसके अलावा, इन भाषाओं के प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण से संग्रह, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटल मीडिया में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
गौरतलब है कि 12 अक्टूबर 2004 को तमिल भाषा के साथ इस सूची का प्रारंभ किया गया था। उसी वर्ष नवंबर में संस्कृत और बाद के वर्षों में अन्य भाषाओं को शास्त्रीय दर्जा दिया गया। अब इन पांच भाषाओं को शामिल करने का निर्णय किया गया है। ये निर्णय विशेषज्ञ समिति एवं साहित्य अकादमी द्वारा तैयार मानदंडों के आधार पर लिए जाते हैं। हालांकि इस वर्ष सुझावों के आधार पर मानदंडों में कुछ संशोधन भी किए गए हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची के अंतर्गत भारतीय भाषाओं का एक वर्गीकरण होता है। जनगणना के दौरान लोगों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर भाषियों की गिनती की जाती है।
केंद्र और राज्यों के स्तर पर विभिन्न भाषाओं को संरक्षित करने, उपलब्ध साहित्य का अनुवाद एवं प्रकाशन कराने तथा विकसित करने के कई कार्यक्रम चलते रहते हैं। पांडुलिपियों के संग्रहण और संरक्षण पर भी बहुत ध्यान दिया जाता है। ऐसे में शास्त्रीय भाषाओं की सूची का विस्तार एक उत्साहजनक व स्वागतयोग्य निर्णय है। इससे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भाषाओं के सांस्कृतिक एवं अकादमिक महत्व को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
भारत में शास्त्रीय भाषाओं का संवर्धन कई स्तरों पर किया जा रहा है। शास्त्रीय भाषाओं, जैसे संस्कृत, प्राकृत, तमिल, तेलुगु, आदि को स्कूल और कॉलेजों में पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में इनके अध्ययन के लिए विशेष विभाग स्थापित किए जा रहे हैं। भारतीय सरकार और विभिन्न संस्थान शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और संवर्धन के लिए अनुदान और शोध परियोजनाएं प्रदान कर रहे हैं। विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों, उत्सवों और समारोहों में शास्त्रीय भाषाओं का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे इनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। शास्त्रीय भाषाओं में साहित्य, शोध पत्र और अन्य सामग्री का लेखन और प्रकाशन बढ़ रहा है। इससे नई पीढ़ी को इन भाषाओं की समृद्धि और महत्व का पता चल रहा है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और प्रचार में वृद्धि हो रही है। ऑनलाइन कोर्स और सामग्री उपलब्ध हैं। इन पहलों से भारत में शास्त्रीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण संभव हो रहा है।
साल 2008 में शास्त्रीय तमिल के लिए एक केंद्रीय संस्थान की स्थापना की गई, जिसमें प्राचीन तमिल ग्रंथों के अनुवाद के साथ-साथ तमिल भाषा सिखाने के पाठ्यक्रम भी चलाए जाते हैं। कन्नड़, तेलुगू, मलयालम और उड़िया भाषाओं के लिए भी विशिष्ट केंद्र खोले गए हैं। वर्ष 2020 में संस्कृत के लिए तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए कार्यक्रम एवं पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि जिन भाषाओं को शास्त्रीय श्रेणी में शामिल किया गया है, उनके विकास के लिए भी अकादमिक प्रयास होंगे। साथ ही संस्थाओं और नागरिकों को भी इस दिशा में योगदान करना चाहिए।




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