
140 करोड़ की आबादी वाला देश है भारत। इस आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी गांवों में रहता है। भारत के 6 लाख 50 हज़ार गांवों का अपना अलग मिजाज़ है, अपना अलग चलन। आज जब भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और वह लगातार अपने इस दायरे को विस्तार देने की कोशिशों में लगा है तो देश के ग्रामीण बाजार पर भी बात करना मौजूं है।
भारत जैसी बड़ी अर्थव्यस्था के बनने की राह में दर्जनों यूनिकॉर्न्स या एक बिलियन डॉलर से ज़्यादा मूल्य वाली तकनीकी कंपनियों ने हकीकत के धरातल पर अपने कदम रखे, लेकिन ये सब शहरी भारतीयों में शीर्ष दस फ़ीसदी लोगों के लिए बनाए गए हैं। भारत के हज़ारों की तादाद में फैले गांव और इनमें रहने वाले लोग अभी तक शायद ही स्टार्टअप्स के लिए बाज़ार बन पाए थे। मगर बदली परिस्थितियों में भारत के स्टार्टअप्स अब ग्रामीण बाज़ार पर बड़ा दांव लगा रहे हैं।
‘स्टेज’ उन्हीं भारतीय स्टार्टअप्स में से एक है, जो ग्रामीण बाज़ार को फोकस कर अपना विस्तार कर रहा है। एग्रोस्टार और दीहाट जैसे स्टार्टअप्स भी इस दौड़ में शामिल हैं। स्टार्टअप ‘स्टेज’ ने तो हरियाणा के गांव-गांव को एक उभरते हुए फ़िल्म उद्योग के स्थल में तब्दील कर दिया है। नए उद्योग को जन्म दे दिया है। इन गावों में फ़िल्म के निर्देशक को लाइट्स, कैमरा, एक्शन सुनना अब किसी के लिए असामान्य बात नहीं रही है। इससे यहां के औद्योगिक शहर रोहतक की बस्तियों में किसानों के घरों और आसपास की ज़मीनों की माँग भी अचानक बढ़ गई है।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि ‘स्टेज’ के इन इलाकों में कदम रखने से पहले जहां भारत में क़रीब एक दर्जन हरियाणवी फ़िल्में बनी थीं, वहीं महज साल 2019 के बाद से ही ‘स्टेज’ ने 200 से ज़्यादा फ़िल्में बना दी हैं। दरअसल, ‘स्टेज’ क्षेत्रीय इलाक़ों में रहने वाले लोगों की पसंद-नापसंद, ग्रामीण संस्कृति, रहन-सहन, उनके बोलचाल की शैली आदि को ध्यान में रखकर कंटेंट बनाती है। फ़िलहाल यह कंपनी दो भाषाओं में कंटेंट बनाती है, एक है हरियाणवी और दूसरी है राजस्थानी। इसके लगभग 30 लाख सब्सक्राइबर्स हैं, जो पैसे देकर कंटेंट देखते हैं।
भारत में 19,500 अलग-अलग बोलियां हैं। उनमें से स्टेज ने 18 भाषाओं और बोलियों का चुनाव किया है। ये वो भाषाएं हैं जो बड़ी आबादी द्वारा बोली जाती हैं और उनके फ़िल्म उद्योग के लिए उपयुक्त हैं। यही वजह है कि अब कंपनी की योजना उत्तर-पूर्व और तटीय-पश्चिम इलाक़ों में बोली जाने वाली भाषाएं जैसे मैथिली और कोंकणी में भी कंटेंट बनाने की है।
‘स्टेज’ महज एक उदाहरण है कि कैसे गांव पर दांव लगा रहे हैं भारत के स्टार्टअप्स। कई अन्य प्लेयर्स भी इस दौड़ में शामिल हैं। हालांकि, ऑनलाइन बाज़ार मीशो या कुछ कृषि तकनीक स्टार्टअप अपवाद के तौर पर पहले भी इसमें शामिल रहे हैं, मगर स्टार्टअप्स की दुनिया ने बड़े पैमाने पर गाँवों को अनदेखा किया है। लेकिन, अब समय बदल रहा है। स्टार्टअप्स गावों का रुख कर। कई संस्थापकों को उनके आइडियाज़ के लिए अब फंडिंग भी मिल रही है और वो ग्रामीण उपभोक्ताओं की ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं। पहले ऐसा न था।
एक्सेल वेंचर्स फ्लिपकार्ट, स्विगी और अर्बन कंपनी जैसे सफल उद्यम में निवेश कर चुका है। अब वह भी ग्रामीण बाज़ार में रूचि रखने वाले उद्यमियों के लिए निवेश उपलब्ध करवा रहा है। हाल ही में एक्सेल ने घोषणा की है कि वह ग्रामीण स्टार्टअप्स में 10 लाख डॉलर तक का निवेश करेगा। यूनिकॉर्न इंडिया वेंचर्स और एक अन्य वीसी फंड का कहना है कि उनका 50 फ़ीसदी निवेश टियर 2 और टियर 3 शहरों में मौजूद स्टार्टअप्स में है। जापान की ऑटो की दिग्गज़ कंपनी सुजुकी ने भारत के ग्रामीण बाज़ार के लिए स्टार्टअप्स बनाने के लिए 4 करोड़ अमेरिकी डॉलर का फंड देने की घोषणा की है। यानी अब तस्वीर बदल रही है। गांव भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के केंद्र में आ रहा है। कंपनियां इनपर दांव लगा रही हैं।
ग्रामीण बाजार में ऐसे बहुत सारे अवसर हैं, जहां अब तक कोई नहीं पहुंचा है। निवेशकों और संस्थापकों को अब इस बात का अहसास हो गया है कि ग्रामीण का मतलब गरीब नहीं है। यूं ही नहीं भारत के ग्रामीण या सुदूर इलाकों में रहने वाली दो-तिहाई आबादी सालाना 5 खरब अमेरिकी डॉलर खर्च करती है। और वास्तविकता यह है कि इस आबादी का शीर्ष 20 फीसदी हिस्सा शहरों में रहने वालों के मुकाबले आधे से ज्यादा पैसा खर्च करता है। अगर भारत की जीडीपी अगले दशक में 4 ट्रिलियन डॉलर हो जाती है, तो उसका कम से कम 5 फीसदी डिजिटल रूप से प्रभावित होगा और इसका एक हिस्सा ग्रामीण भारत से आएगा।
इसकी वजह ग्रामीण परिवारों के बीच तेजी से बढ़ती स्मार्टफोन की पहुँच है। शहरों के बाहर लगभग 45 करोड़ भारतीय स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं, जो अमेरिका की आबादी से भी ज्यादा है। यूपीआई के जरिए एक बटन से भुगतान करना उन कंपनियों के लिए एक गेम चेंजर साबित हुआ है, जो महानगरों के बाहर अपना काम करने का सोच रही हैं। आज से 5-7 साल पहले तक इस टार्गेट ग्रुप तक पहुँचना आसान नहीं था। फिर चाहे वो डिजिटली हो या लॉजिस्टिकली या फिर किसी तरह का भुगतान पाने की बात हो। लेकिन, अभी का समय बहुत ज्यादा अच्छा है। खासकर उन स्टार्टअप्स के लिए जो इस बाजार की ओर रुख करना चाहते हैं।
एक दशक पहले तक मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में ज्यादातर नए प्रयोग हो रहे थे। लेकिन, अब नए उद्यमियों की संख्या छोटे कस्बों से उभरकर सामने आ रही है। इसकी प्रमुख वजहों में संचालन के लिए लगने वाली कम लागत, स्थानीय प्रतिभा की सहज उपलब्धता, और सरकार की वो कोशिशें हैं, जिसके तहत गैर-मेट्रो सिटीज में उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात कही गई है।




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