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क्यों डराता है तानाशाहों को ज्ञान का उजाला?

शिक्षा केवल ज्ञान नहीं है—यह स्वतंत्रता की मशाल है। और यही कारण है कि हर तानाशाह को अंधेरे की ज़रूरत होती है, क्योंकि उजाले में उसका झूठ बेनकाब हो जाता है।

डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने शिक्षा विभाग को कमज़ोर करने की कोशिश की। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेनियल श्राग ने निराशा से कहा, “यह विडंबना है कि ट्रम्प उन संस्थानों को निशाना बना रहे हैं, जिन्होंने अमेरिका को महान बनाया।” ट्रम्प लगातार विश्वविद्यालयों को धमका रहे हैं—क्योंकि वे नहीं चाहते कि ये संस्थान विचार, तर्क और सवालों के केंद्र बने रहें।

जब विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला हुआ, तो हार्वर्ड के प्रेज़िडेंट एलन गारबर खड़े हो गए। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा—”हमें मत सिखाइए कि क्या पढ़ाया जाए। संविधान ने हमें आज़ादी दी है, और हम उसे गिरवी नहीं रख सकते।” यही हार्वर्ड है जिसने अमेरिका को आठ राष्ट्रपति दिए हैं, अनेकों सुप्रीम कोर्ट के जज और नोबेल पुरस्कार विजेता दिए हैं। और अब? अब सत्ता में एक ऐसा व्यक्ति है जो इन संस्थानों को ख़त्म करना चाहता है।

यह सिर्फ अमेरिका की बात नहीं है। दुनिया भर में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला हो रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ भी विश्वविद्यालयों में विचार की जगह नियंत्रण और वर्चस्व की लड़ाई लड़ी जा रही है। क्या इसका नुकसान भारत को नहीं होगा? हर साल लाखों छात्र विदेशों में दाख़िला ले रहे हैं, क्योंकि उन्हें यहाँ आज़ाद और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही।

जहां कुलपति स्वतंत्र और विवेकवान होते हैं, वहाँ परिसर ज्ञान से जगमगा उठता है। लेकिन जहां कुलपति ही सत्ता का उपकरण बन जाए, वहाँ परिसर सियासी अखाड़ा बन जाता है। 2015 में मद्रास हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “अगर UGC के नियमों को देखें, तो अल्बर्ट आइंस्टीन भी भारत में कुलपति नहीं बन सकते।”

यह कोई नई कहानी नहीं है। हर तानाशाह शिक्षा से डरता है। हिटलर ने कहा था, “पाठ्यपुस्तकों पर नियंत्रण दे दो, देश को काबू कर लूंगा।” 1933 में हिटलर समर्थक छात्र संगठनों ने 34 जर्मन विश्वविद्यालयों में 25,000 किताबें जला दीं। इनमें आइंस्टीन, सिगमंड फ्रायड और कार्ल मार्क्स की रचनाएँ थीं—सिर्फ इसलिए कि वे यहूदी थे। महान दार्शनिक हेलेन केलर की किताबें भी जला दी गईं। हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स ने गर्व से कहा—”हमने अतीत का कूड़ा साफ कर दिया।”

तानाशाह शिक्षा से नहीं, सोचने वाले नागरिकों से डरता है। यही कारण है कि पाकिस्तान में 1971 में ढाका विश्वविद्यालय में बुद्धिजीवियों का नरसंहार किया गया। सेना ने सूची बनाकर 1111 लोगों की हत्या की—जिनमें 991 शिक्षक, 134 पत्रकार, 49 डॉक्टर और 42 वकील शामिल थे। आज ऐसे हत्याकांड नहीं होते—अब चरित्र हनन होता है, ट्रोलिंग होती है, बुद्धिजीवियों को देशद्रोही कहकर चुप कराने की कोशिश होती है।

भारत ने 1951 में पहला IIT खड़गपुर में शुरू किया, फिर बॉम्बे, मद्रास और कानपुर में। लेकिन पड़ोसी देश के एक बुद्धिजीवी मुजम्मिल का कहना सही था—”हमने मदरसे बनाए, उन्होंने IIT बनाए।” आज भारतीय छात्र दुनियाभर में नाम कमा रहे हैं, क्योंकि कभी यहाँ शिक्षा को प्राथमिकता दी गई थी।

दक्षिण अफ्रीका में एक कहावत है—”किसी देश को तबाह करने के लिए बम और मिसाइल की ज़रूरत नहीं होती, बस उसकी शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर दो।”

और अंत में—

हवाओं, तुमने दीये बुझाए तो बहुत हैं,
कभी कोई एक दीया जलाकर तो देख।
तुमने बस्तियाँ मिस्मार की हैं बहुत,
कभी एक घरोंदा बनाकर तो देख।

Asmita Sarkar

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