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आज की शिक्षा से डिग्री तो मिल रही है, पर नौकरी नहीं

जैसे ही देशभर में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिले का दौर शुरू होता है, हर ओर रंग-बिरंगे बैनर, विज्ञापन और वेबसाइटें छात्रों को “ज्ञान”, “रूपांतरण” और “अनुसंधान उत्कृष्टता” के वादों से आकर्षित करती दिखती हैं। स्नातक, परास्नातक और पीएचडी स्तर पर दाखिलों में हो रही बढ़ोत्तरी यह दर्शाती है कि भारत का शैक्षणिक परिदृश्य संभावनाओं से भरपूर है।

लेकिन सवाल उठता है कि आज की शिक्षा युवाओं को केवल उपाधियाँ दे रही है या उनका भविष्य भी संवार रही है? दरअसल, इस तेज़ी से बढ़ते शैक्षणिक विस्तार के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जो चिंताजनक है – डिग्रियाँ तो बढ़ रही हैं, लेकिन योग्य और अर्थपूर्ण रोज़गार के अवसर उतनी तेज़ी से नहीं।

बेरोजगारी और शिक्षा: एक उलटा रिश्ता?
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (MoSPI) के आंकड़े बताते हैं कि जैसे-जैसे शिक्षा स्तर बढ़ता है, बेरोजगारी की दर भी बढ़ती है। यह एक बड़ा विरोधाभास है – जहां एक ओर उच्च शिक्षा को प्रगति की सीढ़ी माना जाता है, वहीं दूसरी ओर वही शिक्षा युवाओं को बेरोजगारी की ओर भी धकेल रही है।

यह संकट विशेष रूप से देश के टियर-2 और टियर-3 कॉलेजों में गहराता जा रहा है, जहां लाखों छात्र बीए, बीकॉम या बीएससी जैसी डिग्रियाँ लेकर निकलते हैं। इन संस्थानों में अक्सर न तो पर्याप्त संसाधन होते हैं, न ही उद्योगों से जुड़ाव। पुराने पाठ्यक्रमों पर आधारित पढ़ाई, जो आज की डिजिटल और ग्लोबल दुनिया की ज़रूरतों से मेल नहीं खाती।

थ्योरी बहुत, प्रैक्टिकल कम
कई कॉलेजों में शिक्षा अब भी पूरी तरह सैद्धांतिक बनी हुई है। एक अंग्रेज़ी साहित्य का छात्र शेक्सपियर पढ़ तो लेता है, लेकिन पेशेवर ईमेल कैसे लिखें – यह नहीं जानता। एक अर्थशास्त्र का छात्र ग्राफ और समीकरण तो समझ लेता है, लेकिन Excel शीट में काम नहीं कर पाता।

इस disconnect का नतीजा यह है कि पढ़े-लिखे युवा अपने ज्ञान को बाज़ार में बेचने लायक नहीं बना पाते। शिक्षा और कौशल के बीच की खाई उन्हें बेरोजगार या अल्परोज़गार की स्थिति में ला खड़ा करती है।

डिग्री: लक्ष्य या उपाय?
समस्या केवल पाठ्यक्रम की नहीं है, बल्कि सोच की भी है। भारत की शिक्षा संस्कृति में अकादमिक ज्ञान को आत्म-लक्ष्य की तरह देखा जाता है। परास्नातक और पीएचडी की डिग्रियाँ अक्सर ज्ञान की भूख से नहीं, नौकरी बाज़ार से बचाव की रणनीति के तौर पर ली जाती हैं। नतीजतन, एक चक्र बनता है – छात्र शिक्षक बनते हैं और वही प्रणाली आगे बढ़ती है।

सरकारें जागी हैं, पर बदलाव अधूरा
सरकारों ने इस समस्या को पहचाना है। स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) जैसे अभियान शुरू किए गए हैं, जिनका उद्देश्य छात्रों में व्यावसायिक कौशल और उद्यमिता की भावना पैदा करना है। परंतु ज़मीनी स्तर पर बदलाव अभी भी अधूरा है।

कई कॉलेजों में आज भी रटंत पद्धति (rote learning) को तरजीह दी जाती है, जबकि बाज़ार संचार, डिजिटल कौशल, डाटा विश्लेषण और नेतृत्व क्षमताओं की मांग कर रहा है।

वैश्विक उदाहरण और भारत की सोच
चीन और जापान जैसे देश तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा को रणनीतिक प्राथमिकता दे चुके हैं। भारत में यह शिक्षा अभी भी ‘दूसरे दर्जे’ का विकल्प मानी जाती है। समाज और परिवारों में यह धारणा बनी हुई है कि ‘असली शिक्षा’ तो वही है जो डिग्री दिलाए, भले ही वह रोज़गार से जुड़ी न हो।

क्या हो समाधान?
1. सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों में अनिवार्य व्यावहारिक कौशल जैसे संचार, डिजिटल साक्षरता, फाइनेंशियल प्लानिंग, एक्सेल, डेटा विश्लेषण, स्वास्थ्य सेवाएँ, टेलरिंग, हॉस्पिटैलिटी आदि को जोड़ा जाए।

2. पीएचडी और रिसर्च शिक्षा को अकादमिक कैरियर तक सीमित न रखकर नीति निर्माण, परामर्श, विश्लेषण और उद्योग से जोड़ा जाए।

3. उद्यमिता और निजी क्षेत्र के विकल्पों को मज़बूत कर युवाओं को सरकारी नौकरियों पर निर्भरता से बाहर निकाला जाए।

4. शिक्षा को एक सामाजिक अनुबंध के रूप में देखा जाए – जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि आजीविका की ठोस ज़मीन भी तैयार करती है।

शिक्षा का असली अर्थ
हमारा उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि हम लिबरल एजुकेशन या साहित्यिक सोच को दरकिनार कर दें – बल्कि उसे आज की दुनिया के साथ जोड़ें। शिक्षा को ऐसी ताक़त बनाना होगा जो न केवल सोचने की क्षमता दे, बल्कि जीने का साध…

Asmita Sarkar

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