
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा 22 मई को जारी किया गया एक निर्देश इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। निर्देश कहता है कि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा या उस भाषा में पढ़ाया जाना चाहिए, जिसे वे समझते हैं। यदि किसी कक्षा में विविध भाषाओं के बच्चे हों, तो उन्हें स्थानीय स्तर पर सबसे अधिक प्रचलित भाषा में शिक्षित किया जाए। इसे ‘आर1’ नाम दिया गया है — वही भाषा जिसके माध्यम से बच्चों को अन्य विषय पढ़ाए जाएं और अन्य भाषाएं (जैसे अंग्रेजी) सिखाई जाएं।
लेकिन इस निर्देश की आलोचना हो रही है — और वह भी उन लोगों की ओर से, जो अक्सर वैश्विक शोधों का हवाला देते हैं और यह मानते हैं कि बच्चों को वही भाषा पढ़नी चाहिए जिसे वे समझते हैं। विरोधाभास यहीं से शुरू होता है।
आलोचना या गलतफहमी?
कुछ अखबारों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि शहरी और बहुभाषी इलाकों में एक भाषा चुनना मुश्किल होगा। लेकिन क्या यह सचमुच कोई समस्या है? क्या यह निर्देश बहुभाषी भारत की हकीकत को नज़रअंदाज करता है या उसका समाधान प्रस्तुत करता है?
सीबीएसई का निर्देश दरअसल यही मानकर चलता है कि भारत में बहुभाषी समाज है। इसलिए यह स्थानीय रूप से सबसे अधिक समझी जाने वाली भाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाता है। यही व्यावहारिक समाधान है। उदाहरण के तौर पर, मंगलुरु में रहने वाले बच्चे चाहे कोंकणी, उर्दू, मलयालम या कन्नड़ भाषी हों — वे सभी स्थानीय स्तर पर कन्नड़ भाषा को समझते हैं। इसलिए, वहां की शिक्षा का सबसे स्वाभाविक माध्यम कन्नड़ हो सकता है, न कि अंग्रेजी — जो सभी बच्चों के लिए अपरिचित है।
असल मुद्दा: अंग्रेजी बनाम समझ की भाषा
यह विरोध शायद अंग्रेजी को लेकर बढ़ती हुई सामाजिक और आर्थिक आकांक्षाओं का भी परिणाम है। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने और अंग्रेजी को एक विषय के रूप में सीखने में ज़मीन-आसमान का अंतर है।
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को पढ़ना, समझना, और सोचने की क्षमता देना है — और यह तभी संभव है जब वे उस भाषा में सीखें जो वे पहले से जानते हैं। अगर हम शुरुआत से ही बच्चों पर एक अपरिचित भाषा (जैसे अंग्रेजी) थोपते हैं, तो वे न साक्षर हो पाते हैं और न ही अंग्रेजी में दक्ष हो पाते हैं।
यह नीति न तो अंग्रेजी को खारिज करती है और न ही उसकी महत्ता को नकारती है। बल्कि यह कहती है कि पहले बच्चों को साक्षर बनाइए, फिर अंग्रेजी भी आ जाएगी — और बेहतर ढंग से आएगी।
समझ की भाषा से सशक्तिकरण की ओर
आज भी भारत की 98 फीसदी जनसंख्या के लिए अंग्रेजी एक विदेशी, कठिन और अजनबी भाषा है। शिक्षा में मातृभाषा को प्राथमिकता देना केवल एक भाषायी या सांस्कृतिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और शिक्षा के अधिकार की दिशा में एक ठोस कदम है।
इसके आलोचक अगर चाहते हैं कि देश का हर बच्चा अंग्रेजी में दक्ष हो, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि यह तभी संभव होगा जब वह पहले अपनी भाषा में ठोस आधार पाए। यदि हम बच्चों को शुरू से ही एक अपरिचित भाषा में झोंक देंगे, तो न अंग्रेजी मिलेगी, न साक्षरता।
तर्क और समझ की जीत होनी चाहिए
सीबीएसई का यह निर्णय न तो भावनात्मक है और न ही राजनीतिक — यह पूरी तरह से शोध, अनुभव और समझ पर आधारित है। इसे खारिज करने से पहले हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम अपने बच्चों को उनकी जड़ों से काटकर उड़ाना चाहते हैं, या उन्हें मजबूत जमीन देकर ऊंची उड़ान की तैयारी देना चाहते हैं?
हमें इस फैसले का स्वागत करना चाहिए — क्योंकि यह बच्चों की शिक्षा को उनके जीवन से जोड़ता है, और यही किसी भी शिक्षा नीति की पहली कसौटी होनी चाहिए।




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