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AI के दौर में बदलती शिक्षा: क्या अब अप्रासंगिक हो जाएंगे शिक्षक?

UGC डिजिटल शिक्षा पर पुनर्विचार कर रहा है। AI और रोबोट शिक्षकों की जगह ले रहे हैं। क्या तकनीकी क्रांति कल्पनाशक्ति और मानवता को मिटा देगी?

 

शिक्षा का नया मोड़

शिक्षा जगत आज एक निर्णायक मोड़ पर है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) डिजिटल लर्निंग इकोसिस्टम की समीक्षा कर रहा है ताकि शिक्षा और रोजगार के बीच की बढ़ती दूरी को कम किया जा सके। यह पहल सही दिशा में कदम है, लेकिन इसके साथ एक गहरी चिंता भी जुड़ी है — क्या शिक्षा का भविष्य तकनीक के हाथों पूरी तरह सौंप दिया जा रहा है?

 

बीते पचास वर्षों में शिक्षा की दुनिया में असाधारण परिवर्तन आए हैं। एक समय था जब छात्र स्कूलों और कॉलेजों में किताबों, ब्लैकबोर्ड और शिक्षकों के सानिध्य में सीखते थे। लेकिन आज यह दृश्य लैपटॉप, टैबलेट और स्मार्ट क्लासरूम से बदल गया है।

 

पारंपरिक क्लासरूम से डिजिटल क्रांति तक

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक भारत के अधिकांश कॉलेजों में शिक्षा की बुनियाद सरलता और मानवीय संबंधों पर टिकी थी। उस समय तकनीक का अर्थ था — रेडियो, टेलीफोन, टेलीग्राफ और अखबार। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से आने वाले छात्र सीमित संसाधनों में भी मेहनत और लगन से पढ़ाई करते थे।

 

कॉन्वेंट स्कूलों की संख्या कम थी और अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षा आम नहीं थी। Wren and Martin जैसी व्याकरण पुस्तकों से छात्र भयभीत रहते थे, लेकिन यही पुस्तकें उनकी लिखित अंग्रेज़ी को मज़बूत करती थीं। उस दौर के छात्र लाइब्रेरी को ज्ञान का मंदिर मानते थे — वहाँ बैठकर पढ़ना, लिखना और विचारों का आदान-प्रदान शिक्षा का अभिन्न हिस्सा था।

 

Gen Z और नई शिक्षा की परिभाषा

अब वही क्लासरूम Gen Z पीढ़ी से भरे हुए हैं — डिजिटल नेटिव्स, जो बचपन से स्क्रीन और इंटरनेट के साथ बड़े हुए हैं। इन छात्रों के लिए किताबें, कॉपी और पेन अब PDF, ई-बुक और ऑनलाइन नोट्स में बदल गए हैं।

 

वे तकनीक में दक्ष हैं, उत्कृष्ट संचार कौशल रखते हैं और ग्लोबल टूल्स का सहज प्रयोग करते हैं। परंतु इसी आधुनिकता ने उन्हें लाइब्रेरी से दूर कर दिया है। आज अधिकांश छात्र कहते हैं — “जो चाहिए, वह सब लैपटॉप में है।”

 

उनके लिए शिक्षा अब अनुभव नहीं, बल्कि डाउनलोड करने योग्य जानकारी बन गई है। स्टैनली फिश का मशहूर सवाल “Is there a text in the class?” अब बदल चुका है — “Is there a PDF in the class?”

 

किताबों की खुशबू और पन्नों की सरसराहट जैसे तत्व अब डिजिटल क्रांति की शोर में खो चुके हैं।

 

AI और रोबोटिक्स: शिक्षा का भविष्य या संकट?

तकनीक जिस तीव्र गति से शिक्षा प्रणाली को बदल रही है, वह अवसरों के साथ चुनौतियाँ भी लेकर आई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक डिवाइस अब शिक्षकों की जगह लेने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

 

AI से सीखना अधिक सुलभ और डेटा-आधारित तो हो गया है, लेकिन इसमें मानवीय भावनाएँ, अंतर्ज्ञान और प्रेरणा की कमी महसूस होती है। तकनीक एक दोधारी तलवार है — यह ज्ञान को सुलभ बनाती है, पर साथ ही सीखने की आत्मा को यांत्रिक भी कर सकती है।

 

T.S. Eliot के शब्द आज और भी प्रासंगिक लगते हैं —

 

“Where is the wisdom we have lost in knowledge?

Where is the knowledge we have lost in information?”

 

सवाल यही है — क्या शिक्षा अब केवल “सूचना” तक सीमित रह जाएगी?

 

शिक्षा को फिर से मानवीय बनाने की जरूरत

डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता को जिंदा रखा जाए। शिक्षा को केवल तकनीकी दक्षता का माध्यम नहीं, बल्कि मानवता और विचारों के विकास का केंद्र बने रहना चाहिए।

 

AI और रोबोटिक टूल्स शिक्षकों की मदद तो कर सकते हैं, लेकिन उनकी जगह नहीं ले सकते। एक अच्छा शिक्षक वह है जो छात्र के भीतर जिज्ञासा, संवेदना और कल्पना को जगाए — यह कार्य कोई मशीन नहीं कर सकती।

 

भविष्य का सफल शिक्षा मॉडल वही होगा जो तकनीक और मानवीय स्पर्श, दोनों का संतुलन बनाए रखे।

 

शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी प्रगति अनिवार्य है, लेकिन यह केवल साधन है, लक्ष्य नहीं। यदि डिजिटल क्रांति ने कल्पना और संवेदना को पीछे छोड़ दिया, तो यह शिक्षा नहीं, मात्र सूचना का आदान-प्रदान रह जाएगी।

 

इसलिए समय की मांग है कि शिक्षक स्वयं को अद्वितीय बनाएं — ऐसे प्रेरक और सृजनशील व्यक्तित्व के रूप में, जिनकी जगह कोई AI या रोबोट कभी नहीं ले सके।

 

 

रईस अहमद 'लाली'

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