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क्या दुनिया का पसंदीदा "स्टडी डेस्टिनेशन" बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है भारत? 

क्या दुनिया का पसंदीदा “स्टडी डेस्टिनेशन” बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है भारत? 

क्या दुनिया का पसंदीदा "स्टडी डेस्टिनेशन" बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है भारत? 

भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। शिक्षा मंत्रालय की नवीनतम AISHE रिपोर्ट के अनुसार अब 173 देशों के 58,134 विदेशी छात्र भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। एक साल में इनकी संख्या में 9,000 से अधिक की वृद्धि हुई है। यह आंकड़ा पहली नजर में भारत की बढ़ती शैक्षणिक स्वीकार्यता का संकेत देता है, लेकिन इससे जुड़ा बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में दुनिया का पसंदीदा “स्टडी डेस्टिनेशन” बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या यह अभी केवल संभावनाओं का दौर है?

विदेशी छात्रों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। लंबे समय तक अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के प्रमुख केंद्र रहे हैं। अब भारत भी इस दौड़ में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। कम फीस, अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई, सांस्कृतिक विविधता और तेजी से विकसित हो रहा उच्च शिक्षा तंत्र भारत को कई देशों के छात्रों के लिए आकर्षक बना रहा है।

हालांकि, आंकड़ों को गहराई से देखने पर एक अलग तस्वीर भी सामने आती है। भारत आने वाले विदेशी छात्रों में सबसे बड़ा हिस्सा नेपाल का है। इसके अलावा बांग्लादेश, भूटान, यूएई, नाइजीरिया और सूडान जैसे देशों के छात्र भी बड़ी संख्या में आते हैं। यानी भारत की लोकप्रियता फिलहाल मुख्य रूप से पड़ोसी देशों और विकासशील देशों तक सीमित है। विकसित देशों के छात्रों की भागीदारी अभी भी बेहद सीमित है।

यह स्थिति बताती है कि भारत को केवल विदेशी छात्रों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उनकी विविधता बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। यदि यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका के अधिक छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों को चुनने लगें, तभी भारत को वास्तविक अर्थों में वैश्विक शिक्षा केंद्र माना जा सकेगा।

एक और महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा की गुणवत्ता का है। विदेशी छात्र केवल कम खर्च के कारण किसी देश को नहीं चुनते, बल्कि वे विश्वस्तरीय रिसर्च, आधुनिक लैब, अंतरराष्ट्रीय फैकल्टी, उद्योग से जुड़ाव और बेहतर छात्र अनुभव की भी उम्मीद करते हैं। भारत के कुछ प्रमुख संस्थान—जैसे IIT, IIM, IISc और कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालय—इस दिशा में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अभी भी अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुंचने की जरूरत है।

AISHE के अनुसार देश में 1,289 विश्वविद्यालय और 48,246 कॉलेज हैं। यह संख्या भारत के विशाल उच्च शिक्षा नेटवर्क को दर्शाती है, लेकिन केवल संस्थानों की संख्या से गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होती। अगर इतने बड़े नेटवर्क में से अधिक संस्थान अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा और सुविधाएं उपलब्ध करा सकें, तो विदेशी छात्रों की संख्या कई गुना बढ़ सकती है।

सरकार ने भी “स्टडी इन इंडिया” जैसी पहल के माध्यम से विदेशी छात्रों को आकर्षित करने का प्रयास किया है। कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया को आसान बनाया गया है और विशेष सीटों तथा फीस में रियायत जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं। लेकिन केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। विदेशी छात्रों के लिए वीजा प्रक्रिया, हॉस्टल, सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, भाषा सहायता और करियर अवसर जैसे मुद्दों पर भी समान रूप से काम करना होगा।

आज वैश्विक शिक्षा बाजार तेजी से बदल रहा है। कई देशों में बढ़ती ट्यूशन फीस और सख्त इमिग्रेशन नीतियों के कारण छात्र नए विकल्प तलाश रहे हैं। भारत के पास इस अवसर का लाभ उठाने का सही समय है। यदि भारतीय विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता, रिसर्च क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करें, तो भारत एशिया ही नहीं बल्कि दुनिया के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में शामिल हो सकता है।

विदेशी छात्रों की संख्या में 9,000 से अधिक की वार्षिक वृद्धि निश्चित रूप से उत्साहजनक है, लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता। यह केवल एक शुरुआत है। भारत को अब “कम खर्च में अच्छी पढ़ाई” की छवि से आगे बढ़कर “विश्वस्तरीय शिक्षा और शोध” की पहचान बनानी होगी।

भारत के लिए यह समय केवल विदेशी छात्रों की संख्या गिनने का नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा की वैश्विक प्रतिष्ठा बनाने का है। यदि गुणवत्ता, शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और छात्र अनुभव को प्राथमिकता दी जाए, तो आने वाले वर्षों में भारत वास्तव में दुनिया के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है। विदेशी छात्रों की बढ़ती संख्या इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन मंजिल अभी काफी दूर है।

Asmita Sarkar

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