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Inclusive Classrooms Can Help Close the STEM Achievement Gap, Study Finds

STEM में छात्रों के प्रदर्शन का अंतर कम कर सकती हैं समावेशी कक्षाएं

Inclusive Classrooms Can Help Close the STEM Achievement Gap, Study Finds

कोई छात्र सक्षम हो सकता है, मेहनत कर सकता है और फिर भी ऐसी कक्षा में उसके लिए सफल होना मुश्किल हो सकता है, जहां उसे यह महसूस न हो कि वह उस माहौल का हिस्सा है। स्कूल और कॉलेज अक्सर यह सवाल नहीं पूछते कि सीखने का माहौल खुद छात्रों के प्रदर्शन को किस हद तक प्रभावित करता है? एक नए अध्ययन में इसी सवाल को समझने की कोशिश की गई है।

अमेरिका के मिडवेस्ट क्षेत्र की सरकारी यूनिवर्सिटीज में STEM पाठ्यक्रमों पर किए गए एक बड़े रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल में शोधकर्ताओं Kevin R. Kennedy, Kira K. Means और Markus Brauer ने इस विचार की जांच की। यह रिसर्च Fall 2022 और Spring 2023 सेमेस्टर के दौरान की गई थी और शोधपत्र को Scientific Reports ने 4 सितंबर 2026 को स्वीकार किया।

शोधकर्ताओं ने उन छात्रों पर ध्यान दिया जो विभिन्न हाशिए पर रहने वाले नस्ली और जातीय समूहों से आते थे। इनमें African American, Native American/American Indian, Latinx/Hispanic और दो या उससे अधिक नस्ली पहचान बताने वाले छात्र शामिल थे। अध्ययन में ग्रेड से जुड़े आंकड़ों के आधार पर कुल 2,116 छात्र शामिल थे। विभिन्न कारणों से कुछ छात्रों को बाहर करने के बाद अंतिम विश्लेषण में 1,737 छात्र शामिल रहे।

एक ही समस्या के समाधान के दो अलग तरीके

इन पाठ्यक्रमों को बेतरतीब तरीके से तीन समूहों में बांटा गया—एक कंट्रोल ग्रुप, दूसरा Resilience यानी लचीलापन आधारित हस्तक्षेप और तीसरा Inclusion यानी समावेशन आधारित हस्तक्षेप।

कंट्रोल ग्रुप में शिक्षक सामान्य तरीके से ही पढ़ाते रहे।

दूसरे समूह में Resilience approach अपनाई गई। इसके तहत शिक्षकों को ऐसी गतिविधियों और तरीकों के लिए तैयार किया गया, जिनसे छात्र पढ़ाई के पाठों को अपनी जिंदगी से जोड़ सकें, फीडबैक का इस्तेमाल सीखने के लिए कर सकें और स्कूल में आत्मविश्वास विकसित कर सकें। छात्रों को यह समझने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया कि बुद्धिमत्ता एक ऐसी क्षमता है जिसे अभ्यास के जरिए विकसित किया जा सकता है। इसके अलावा, छात्रों को अकादमिक समस्याओं को खतरे की बजाय चुनौती के रूप में देखने और अपने लिए महत्वपूर्ण मूल्यों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया गया।

तीसरे समूह में Inclusion approach अपनाई गई। इसमें मुख्य रूप से छात्रों से कठिन परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की उम्मीद करने के बजाय कक्षा के माहौल में बदलाव करने पर जोर दिया गया। इसके तहत छह तरह की शिक्षण गतिविधियां शामिल थीं—अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले छात्रों के बीच बातचीत को बढ़ावा देना, ज्यादा सहयोगात्मक माहौल बनाना, शिक्षक और छात्रों के बीच बेहतर संबंध विकसित करना, कक्षा में समावेश की स्पष्ट संस्कृति बनाना, छात्रों में अपनेपन की भावना बढ़ाना और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बारे में सकारात्मक सोच विकसित करना।

यही अंतर इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। एक तरीका मूल रूप से यह कहता है कि “छात्र को बेहतर महसूस कराएं।” दूसरा सवाल पूछता है—“क्या हम उस जगह को बेहतर बना सकते हैं जहां छात्र सीखता है?”

कक्षा के माहौल का छात्रों के प्रदर्शन पर दिखा असर

दोनों हस्तक्षेपों के परिणाम अलग-अलग रहे।

कंट्रोल ग्रुप में हाशिए पर रहने वाले छात्रों का औसत कोर्स ग्रेड 4.0 में से 2.71 था। Resilience ग्रुप में यह औसत 2.87 रहा। हालांकि, यह अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था।

वहीं Inclusion ग्रुप में छात्रों का औसत ग्रेड 3.34 रहा। यह कंट्रोल ग्रुप की तुलना में 0.627 ग्रेड पॉइंट अधिक था। अध्ययन में इस्तेमाल 4-पॉइंट स्केल पर यह आधे से अधिक लेटर ग्रेड के अंतर के बराबर था। छात्रों के अलग-अलग कक्षाओं में समूहबद्ध होने को ध्यान में रखकर किए गए अन्य विश्लेषणों में भी यह निष्कर्ष नहीं बदला।

इसका असर केवल हाशिए पर रहने वाले छात्रों तक सीमित नहीं था। सभी छात्रों को मिलाकर कंट्रोल कोर्स में औसत ग्रेड 2.95, Resilience कोर्स में 2.85 और Inclusion कोर्स में 3.27 रहा।

कंट्रोल स्थिति में हाशिए पर रहने वाले और अन्य छात्रों के प्रदर्शन के बीच अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण था। हालांकि, अलग-अलग intervention conditions के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया।

इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि शिक्षा में असमानता का समाधान सिर्फ एक अच्छा और सहयोगी शिक्षक है। इसका अधिक सीमित लेकिन उपयोगी निष्कर्ष यह है कि कक्षा के माहौल में कुछ बदलाव छात्रों के ग्रेड में महत्वपूर्ण सुधार से जुड़े थे, खासकर उन छात्रों के लिए जो शैक्षणिक व्यवस्था में हाशिए पर थे।

शिक्षकों के लिए यह निष्कर्ष क्यों महत्वपूर्ण है?

कई बार “Inclusion” या समावेशन शब्द सुनने में ऐसा लग सकता है कि यह एक अस्पष्ट विचार है, जिसका रोजमर्रा की कक्षा में ज्यादा इस्तेमाल नहीं है। लेकिन इस अध्ययन में जिन तरीकों का इस्तेमाल किया गया, उन्होंने इसे व्यवहारिक रूप दिया।

कक्षा में छात्रों को सामाजिक समूहों में अलग रखने के बजाय एक-दूसरे को जानने के अवसर दिए जा सकते हैं। अनावश्यक प्रतियोगिता की जगह सहयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है। शिक्षक केवल ग्रेड देखने के बजाय किसी छात्र को एक व्यक्ति के रूप में बेहतर समझने की कोशिश कर सकते हैं। समावेशन को कभी-कभार दिए जाने वाले संदेश के बजाय कक्षा की सामान्य अपेक्षा बनाया जा सकता है।

कक्षा में ये बदलाव देखने में छोटे लग सकते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं के निष्कर्ष बताते हैं कि इन सभी गतिविधियों का संयुक्त असर उनके आकार से कहीं बड़ा हो सकता है।

इस अध्ययन से यह भी सीख मिलती है कि कमजोर प्रदर्शन करने वाले छात्रों के बारे में हम किस तरह बात करते हैं।

अगर कोई छात्र अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है, तो आमतौर पर सबसे पहले उसकी प्रेरणा, आत्मविश्वास, पढ़ाई की आदत या संघर्ष करने की क्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं। ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं। लेकिन अध्ययन संकेत देता है कि केवल छात्र पर ध्यान केंद्रित करना पूरी तस्वीर नहीं हो सकती।

सवाल हमेशा यह नहीं होना चाहिए कि “हम इस छात्र को और मजबूत कैसे बना सकते हैं?” यह भी पूछा जाना चाहिए कि “जिस कक्षा में इस छात्र से सफल होने की उम्मीद की जा रही है, वह कक्षा कैसी है?”

शोधकर्ताओं ने अध्ययन के निष्कर्षों की सीमाएं भी बताईं

अध्ययन के कुछ महत्वपूर्ण सीमित पहलू हैं।

Inclusion intervention में छह आपस में जुड़े शिक्षण तरीकों का इस्तेमाल किया गया था। इसलिए शोधकर्ता यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि इनमें से किस एक तरीके की वजह से छात्रों के प्रदर्शन में सुधार हुआ।

वे यह भी पता नहीं लगा सके कि छात्रों के बेहतर ग्रेड के पीछे वास्तव में कौन-सा मनोवैज्ञानिक कारण काम कर रहा था।

दूसरी महत्वपूर्ण सीमा अध्ययन की जगह और प्रतिभागियों से जुड़ी है। यह रिसर्च चार सरकारी यूनिवर्सिटीज में की गई और अंतिम सैंपल में करीब 85 प्रतिशत छात्र White थे। इसलिए शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि अलग छात्र आबादी वाले कॉलेजों में इन परिणामों को बिल्कुल उसी तरह लागू करना संभव नहीं हो सकता।

शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि शिक्षकों ने इन तरीकों को अलग-अलग स्तर पर लागू किया हो सकता है और इससे परिणामों पर असर पड़ा हो।

अध्ययन हमें क्या बताता है?

इस अध्ययन को सबसे आसान तरीके से समझने के लिए पौधे का उदाहरण लिया जा सकता है। आप किसी पौधे से कह सकते हैं—“और मेहनत करो, मजबूत बनो और तेजी से बढ़ो।” लेकिन पौधे को अच्छी मिट्टी, पानी और धूप की भी जरूरत होती है।

छात्रों की स्थिति कुछ ऐसी ही है। उन्हें आत्मविश्वासी बनाने में मदद करना जरूरी है, लेकिन जिस जगह और माहौल में वे सीखते हैं, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

यह रिसर्च बताती है कि शिक्षक छात्रों को सिर्फ समस्याओं से निपटना सिखाकर ही उनके प्रदर्शन में सुधार नहीं ला सकते, बल्कि कक्षा को ऐसा माहौल बनाकर भी मदद कर सकते हैं जहां छात्र खुद को शामिल, सुरक्षित और सहयोग के लिए तैयार महसूस करें।

हालांकि, शोधकर्ताओं ने इस निष्कर्ष को लेकर सावधानी बरती है। उन्होंने यह नहीं कहा कि हर समावेशी कक्षा अपने आप बेहतर ग्रेड देगी। अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटीज में किया गया था और शोधकर्ता यह भी निर्धारित नहीं कर सके कि Inclusion की छह गतिविधियों में से किस एक की वजह से सुधार आया।

इस रिसर्च से सबसे सरल सीख यही निकलती है कि हमें केवल यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि “हम छात्रों को बेहतर सीखने वाला कैसे बना सकते हैं?”

हमें कभी-कभी यह भी पूछना चाहिए—“हम कक्षा को सीखने के लिए बेहतर जगह कैसे बना सकते हैं?”

 

Asmita Sarkar

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