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संसद में नीट मामले पर चर्चा क्यों नहीं ?

18वीं लोकसभा का गठन हुआ है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में संसद के दोनों सदनों में चर्चा हुई। विपक्ष द्वारा स्थगन प्रस्ताव पेश किया गया था। विपक्ष चाहता था कि 24 लाख नीट के विद्यार्थियों पर चर्चा हो। सत्ता पक्ष ने इसको स्वीकार नहीं किया। सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में नीट मामले की याचिकाएं विचाराधीन होने की आड़ में सरकार नीट मामले में सदन के अंदर चर्चा करने से बचती रही। 

संसदीय नियम इसकी अनुमति देते हैं। लोकसभा में अध्यक्ष की सहमति से सार्वजनिक महत्व के किसी मामले पर चर्चा के लिए सदन के नियमित कामकाज को स्थगित करने का प्रावधान है। वहीं राज्यसभा में, राष्ट्रीय महत्व के किसी मुद्दे पर चर्चा के लिए सूचीबद्ध कामकाज को निलंबित करने के लिए नियम 267 के तहत एक नोटिस है। फिर क्यों लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने विपक्ष के उस वैध अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जिसमें राष्ट्रपति के संसद में दिए गए प्रथम अभिभाषण पर रूटीन बहस को स्थगित कर नीट में पेपर-लीक के अत्यंत संगीन मुद्दे पर चर्चा करने की बात कही गई थी?

संसद एक ऐसा मंच है जहां पर सांसद किसी भी बात को निष्पक्षता और निडरता के साथ रख सकते हैं। सदन के अंदर सांसद न्यायपालिका और न्यायाधीशों के संबंध में भी अपनी बात खुलकर कह सकते हैं। न्यायालय में जो कार्रवाई चल रही होती है, उस पर जरूर कोई टीका-टिप्पणी सांसद नहीं करते हैं। लोकसभा में अध्यक्ष की सहमति से सार्वजनिक महत्व के किसी भी मामले में सदन के नियमित कामकाज को स्थगित करके चर्चा कराए जाने का प्रावधान है। पहले भी सदन के अंदर स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा होती रही हैं। नीट मामले में 24 लाख परीक्षार्थी प्रभावित हुए हैं। 100000 युवाओं का एडमिशन एमबीबीएस में होना है। इतने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा नहीं कराया जाना, सार्वजनिक महत्व के मुद्दों से मुंह मोड़ने के समान है। 

इस मामले में यदि लोकसभा में चर्चा होती तो निश्चित रूप से सरकार को इसका फायदा होता। सरकार के खिलाफ अभी पेपर लीक मामले और नीट के मामले में युवाओं में रोष देखने को मिल रहा है। यदि चर्चा हो जाती, आम सहमति से सदन में कोई सहमति बनती तो इससे युवा वर्ग के घाव पर मलहम लगाने जैसा उपचार होता। मगर सरकार ने सदन में नीट मामले में चर्चा नहीं होने दी।

इस साल करीब 24 लाख छात्रों ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए उपलब्ध सीमित वैकैंसीज़ में किसी तरह जगह पाने के लिए नीट की परीक्षा दी थी। इस परीक्षा के लिए छात्र महीनों तैयारी करते हैं। कई परिवार अपने बच्चों के उत्तीर्ण होने के लिए बेहतरीन कोचिंग और अन्य सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए बहुत कुछ त्याग करते हैं।

पेपर लीक होना भी कोई नई बात नहीं है। पिछले दस सालों में कई महत्वपूर्ण परीक्षाएं- जो हमारे बेरोजगार युवाओं की बढ़ती फौज को रोजगार दे सकती थीं- 70 से अधिक पेपर-लीक के कारण रद्द कर दी गई हैं। इससे करीब दो करोड़ छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है। इस मामले में त्रुटिहीन परीक्षा आयोजित करने में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) की विफलता भयावह है।

क्या दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली के कारण हमारे युवाओं के खतरे में पड़े भविष्य को ‘तात्कालिक सार्वजनिक महत्व’ का मामला नहीं माना जा सकता? अगर प्रधानमंत्री स्वयं इस मामले पर चर्चा करने का प्रस्ताव रखते तो वे छात्रों का अभिवादन पाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, और जब विपक्ष ने ऐसा किया तो सदन के दोनों पीठासीन अधिकारियों ने इसे खारिज कर दिया। 

सुप्रीम कोर्ट में जो शपथ पत्र सरकार ने प्रस्तुत किया है, उसमें कहा गया है कि नीट परीक्षा में कोई गड़बड़ी नहीं हुई जिसके कारण परीक्षा कैंसिल करनी पड़े। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने नीट को लेकर जो पक्ष रखा है, उसने युवाओं के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा काम किया है। यही बात संसद के अंदर चर्चा में आती, पक्ष-विपक्ष अपनी-अपनी बात रखते और सरकार जिस आधार पर कह रही है कि परीक्षा में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है, वह बात संसद के माध्यम से सारे देश में पहुंचती तो इससे युवाओं में जो नाराजी है, वह कम होती। युवाओं को लगता कि सदन में उनकी बात सुनी गई है।
 
न्यायपालिका की आड़ लेकर पिछले कुछ वर्षों से महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषयों पर संसद में चर्चा नहीं कराई जा रही है। पहले भी कई मामलों में यह देखा जा चुका है। पैगासस, राफेल और हिडेनबर्ग जैसे मामले में सदन में चर्चा नहीं कराई गई। न्यायपालिका में विवाद को डाल दिया गया। न्यायपालिका की आड़ लेकर सरकार हमेशा अपना पक्ष रखने से बचती रही है। सरकार ने न्यायालय में सील बंद लिफाफे में जानकारी देने की नई परंपरा शुरू की। न्यायालय से सरकार ने अपने पक्ष में निर्णय भी प्राप्त कर लिया। इसको लेकर न्यायपालिका और सरकार के प्रति लोगों के विश्वास में कमी देखने को मिल रही है। 

 वर्तमान केंद्र सरकार के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। विपक्ष अब आक्रामक मुद्रा में है। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। ऐसी स्थिति में सरकार न्यायपालिका की आड़ लेकर ज्यादा दिनों तक बच नहीं सकती है। वर्तमान स्थिति में लोकसभा और राज्यसभा के पीठासीन अध्यक्ष और सभापति की जिम्मेदारी है। संवेदनशील मामलों में, जैसे नीट, मणिपुर, बजट और संसद में जो भी कानून बने, उन सब में संवेदनशीलता का परिचय देते हुए सत्ता पक्ष और विपक्ष में चर्चा कराई जाए। इससे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर निर्णय लिए जा सकेंगे। निर्णय अच्छे होंगे और सभी को जोड़कर रख सकेंगे।

दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों को विपक्ष के जायज अनुरोधों को पूरा करने के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए। अतीत में मणिपुर जैसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में स्थिति पर तत्काल चर्चा करने के लिए भी इसी प्रकार के अनुरोध को ठुकरा दिया गया था। आम नागरिकों के सामने प्रश्न यह है कि संसद में अदूरदर्शी वैरभाव कब तक लोगों की ज्वलंत चिंताओं को दबा सकता है?

Asmita Sarkar

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