
केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के प्रावधान को लागू करने की अपील की है, जिसके तहत गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें अनिवार्य हैं।
शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने राज्यसभा में बताया कि पंजाब, केरल, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसी राज्य सरकारों ने निजी स्कूलों को आरटीई अधिनियम के तहत सीटें आरक्षित करने के लिए आरटीई प्रावधानों को लागू नहीं किया है।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं सदन में अपील करना चाहता हूं कि इस कानून के तहत किसी भी लाभार्थी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।’’
चौधरी ने कहा कि आरटीई कानून 2009 में पारित किया गया था और यह गरीब परिवार के बच्चों के लिए एक समावेशी योजना है, जो इस सरकार की प्राथमिकता भी है। इसमें औपचारिक शिक्षा प्रणाली से छूटे बच्चों को वापस लाने का भी प्रावधान है।
उन्होंने बताया कि पंजाब, केरल, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटों के आरक्षण के प्रावधान को लागू नहीं किया है। उनके अनुसार, पंजाब सरकार ने 25 प्रतिशत कोटा लागू करने से इनकार करते हुए कहा है कि उनके पास पर्याप्त संख्या में सरकारी स्कूल हैं।
वहीं, आरटीई पर कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी के एक सवाल का जवाब देते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि शिक्षा समवर्ती सूची के अंतर्गत आती है और सभी के लिए 12वीं कक्षा तक स्कूली शिक्षा प्रदान करना दोनों का प्रयास होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “आरटीई और एनईपी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इन दोनों के माध्यम से यह सुनिश्चित करना हम सभी का कर्तव्य है कि सभी को 12वीं कक्षा तक शिक्षा मिले।”
प्रधान ने आगे कहा कि आरटीई, जिसे पिछली सरकार ने बनाया था, में वंचित बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें लाने का अच्छा प्रावधान है। उन्होंने उन राज्य सरकारों से भी सहयोग की अपील की, जिन्होंने इस प्रावधान को लागू नहीं किया है। प्रधान ने कहा, “जब सभी कोशिश करेंगे, तभी हम इसे हासिल कर सकते हैं। हमने प्रवेश स्तर पर हासिल किया है लेकिन 12वीं कक्षा तक इसे हासिल करना अभी बाकी है।”




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