
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि डीपफेक तकनीक समाज में एक गंभीर समस्या बनती जा रही है और सरकार को इस बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि केवल तकनीक ही आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) की काट हो सकती है। कोर्ट ने मोदी सरकार को इस मुद्दे पर काम करने की सलाह दी है। एक्टिंग चीफ जस्टिस मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच डीपफेक टेक्नॉलजी पर नियंत्रण न होने के खिलाफ दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एएसजी चेतन शर्मा से कहा कि केंद्र सरकार को इस पर काम शुरू करना होगा। यह (डीपफेक) समाज में एक गंभीर खतरा बनने जा रहा है। आप भी कुछ स्टडी करें। यह ऐसा कुछ है कि आप जो देख रहे हैं और जो सुन रहे हैं, आप उस पर भरोसा नहीं कर सकते। यह कुछ ऐसा है जो चकित करता है। हमने अपनी आंखों से देखा और जो अपने कानों से सुना, उस पर भरोसा नहीं करना है, पर यह बहुत ही चौंकाने वाला है।
दरअसल पत्रकार रजत शर्मा ने देश में डीपफेक तकनीक के नॉन-रेगुलेशन के खिलाफ एक याचिका दायर की है। याचिका में उन्होंने ऐसी सामग्री के निर्माण में मदद देने वाले एप्लिकेशन और सॉफ्टवेयर तक सार्वजनिक पहुंच को रोकने का निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि चुनावों से पहले, सरकार इस मुद्दे पर चिंतित थी और अब चीजें बदल गई हैं। इस पर, एएसजी ने कहा कि हम अभी भी उतने ही चिंतित हैं जितने तब थे।
इससे पहले, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जरिये दोनों याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा था। वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा ने जनहित याचिका (PIL) में कहा है कि डीपफेक तकनीक का प्रसार समाज के विभिन्न पहलुओं के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। याचिका में कहा गया है कि यह सार्वजनिक विमर्श और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अखंडता को कमजोर करता है। याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने नवंबर 2023 में डीपफेक और ऐसी सामग्री से निपटने के लिए विनियमन तैयार करने का इरादा जताया था, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।




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