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दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- एमिटी विश्वविद्यालय में कानून के छात्र की आत्महत्या प्रणालीगत विफलता का परिणाम

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2016 में एमिटी विश्वविद्यालय में कानून के छात्र सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या को प्रणालीगत विफलता का परिणाम बताया है। साथ ही अदालत ने संस्थान को इसकी जिम्मेदारी लेने और रोहिल्ला के परिवार को मुआवजा देने पर विचार करने को भी कहा। गौरतलब है कि एमिटी विश्वविद्यालय के छात्र सुशांत रोहिल्ला को ज़रूरी उपस्थिति के अभाव में कथित तौर पर बीए एलएलबी पाठ्यक्रम की सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिसकी वजह से उसने आत्हत्या कर ली थी। 

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की खंडपीठ ने इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, जिससे एमिटी लॉ स्कूल संबद्ध है, से कहा कि संस्थान को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और रोहिल्ला के परिवार को मुआवजा देने पर विचार करना चाहिए।

न्यायालय ने कहा, “संस्था को व्यापक सोच रखनी चाहिए। कोई भी यह नहीं कह रहा है कि एक व्यक्ति जिम्मेदार है। किसी भी कारण से व्यवस्थागत विफलता हुई है। यदि किसी संस्थान में व्यवस्थागत विफलता है तो संस्थान को जिम्मेदारी लेनी चाहिए।”

पीठ एमिटी विश्वविद्यालय में सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या के बाद वर्ष 2017 में शुरू की गई एक स्वप्रेरणा जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रही थी।

विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए वकील ने छात्र की आत्महत्या में किसी भी भूमिका या जिम्मेदारी से इनकार किया।

उन्होंने कहा, “हमने आत्महत्या पत्र देखा है, माता-पिता का बच्चे से संपर्क टूट गया था। उसने संस्था को दोषी नहीं ठहराया था।” न्यायालय दलीलों से प्रभावित नहीं हुआ।

न्यायमूर्ति सिंह ने टिप्पणी की, “क्या आप गंभीरता से यह तर्क दे रहे हैं?… इस तरह के मामलों में आप इस तरह से तर्क नहीं दे सकते। ऐसा नहीं किया जा सकता। आप माता-पिता के खिलाफ आरोप नहीं लगा सकते… वे पीड़ित हैं, आप बच्चे के खोने का दुख नहीं झेल रहे हैं।”

न्यायालय ने स्नातक और परास्नातक कार्यक्रमों में अनिवार्य उपस्थिति प्रतिशत नीति पर भी सवाल उठाया और दोहराया कि उपस्थिति नियमों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। अदालत ने शिक्षा मंत्रालय के सचिव से इस बात पर हितधारकों के साथ परामर्श करने को कहा कि क्या देश भर के स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रम प्रदान करने वाले शैक्षणिक संस्थानों में उपस्थिति अनिवार्य की जानी चाहिए।
न्यायालय ने मामले की पिछली सुनवाई में भी कॉलेजों में अनिवार्य उपस्थिति नियमों पर चिंता जताई थी।

 

Asmita Sarkar

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