Edinbox Hindi

‘न्याय की देवी’ की आंखों से पट्टी हटी, हाथ में तलवार की जगह अब संविधान

हाल में, सरकार ने अंग्रेजों के जमाने के कानून बदले थे। अब न्यायपालिका भी बदलाव की राह पर है। भारतीय संविधान लागू होने के 75वें वर्ष में न्याय की प्रतीक देवी की आंखों पर बंधी पट्टी हट गई है। सुप्रीम कोर्ट में जजों की लाइब्रेरी में ‘न्याय की देवी’ की नई प्रतिमा लगाई गई है, जिसकी आंखें खुली हैं। हाथ में तलवार की जगह भी अब संविधान ने ले ली। नई प्रतिमा के दायें हाथ में तराजू है और बाएं हाथ में संविधान की प्रति। 

जानकारी के अनुसार, देश के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की इस बदलाव में खास भूमिका है। उनके निर्देश पर ही देवी की प्रतिमा बदली गई है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की लाइब्रेरी में नई प्रतिमा लगाई गई है। पहले देवी की आंखों पर पट्टी होती थी। एक हाथ में तराजू, दूसरे में सजा की प्रतीक तलवार थी। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट और न्याय व्यवस्था पारदर्शिता की ओर कदम बढ़ा रही है। लगातार यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि न्याय सभी के लिए है न्याय के समक्ष सब बराबर हैं और कानून अब अंधा नहीं है। 

पहले की मूर्ति में आंखों पर पट्टी का मतलब था कि कानून सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है। हाथ में तलवार दिखाती थी कि कानून के पास ताकत है और वो गलत करने वालों को सजा दे सकता है। हालांकि नई मूर्ति में एक चीज़ जो नहीं बदली है वो है तराजू। मूर्ति के एक हाथ में अब भी तराजू है। यह दिखाता है कि न्यायालय किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले दोनों पक्षों की बात ध्यान से सुनता है। तराजू संतुलन का प्रतीक है।

जस्टिस चंद्रचूड़ का मानना है कि भारत को अंग्रेजी विरासत से आगे निकलने की जरूरत है। कानून कभी अंधा नहीं होता। वह सभी को एकसमान रूप से देखता है। इसलिए न्याय की देवी का स्वरूप भी बदला जाना चाहिए। हाथ में संविधान संदेश देता है कि न्याय संविधान के अनुसार किया जाता है। दूसरे हाथ में तराजू, प्रतीक है कि कानून की नजर में सभी समान हैं।

बता दें कि न्याय की देवी, जिसे हम अक्सर अदालतों में देखते हैं, असल में यूनान की देवी हैं। उनका नाम जस्टिया है और उन्हीं के नाम से ‘जस्टिस’ शब्द आया है। उनकी आंखों पर बंधी पट्टी दिखाती है कि न्याय हमेशा निष्पक्ष होना चाहिए। 17वीं शताब्दी में एक अंग्रेज अफसर पहली बार इस मूर्ति को भारत लाए थे। यह अफसर एक न्यायालय अधिकारी थे। 18वीं शताब्दी में ब्रिटिश राज के दौरान न्याय की देवी की मूर्ति का सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल होने लगा। भारत की आजादी के बाद भी हमने इस प्रतीक को अपनाया।

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed