
कर्नाटक में राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को विश्वविद्यालय का चांसलर यानी कुलाधिपति नियुक्त किये जाने के फैसले से पैदा हुआ विवाद गहराता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को कुलाधिपति बनाने के सरकार के कदम की निंदा की है। भाजपा ने इसे उच्च शिक्षा प्रणाली को प्रदूषित करने का प्रयास करार दिया है।
गौरतलब है कि कर्नाटक मंत्रिमंडल ने गुरुवार 28 नवंबर को एक विधेयक को मंजूरी दी है, जिसके अनुसार गडग में कर्नाटक राज्य ग्रामीण विकास और पंचायत राज (आरडीपीआर) विश्वविद्यालय में राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को कुलाधिपति के रूप में नियुक्त किया जाएगा। आधिकारिक तौर पर राज्यपाल ही कर्नाटक के सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। और वर्तमान में थावरचंद गहलोत कर्नाटक में राज्यपाल के पद पर आसीन हैं।
दरअसल, इस मामले पर कर्नाटक में भाजपा और कांग्रेस के बीच पहले से ही लगातार तनातनी बनी हुई थी। इससे पहले सितंबर में, कलबुर्गी में हुई कैबिनेट की बैठक में राज्यपाल से आरडीपीआर विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति करने के अधिकार छीनने का फैसला किया गया था। अब इस सम्बन्ध में विधेयक को मंजूरी दिए जाने के ताज़ा कदम के बाद यह तनातनी और बढ़ गई है।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कहा है कि राज्यपाल की शक्तियों में कटौती की यह कोशिश संवैधानिक व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश है। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कदम से ग्रामीण विकास अध्ययन के क्षेत्र में अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप को बढ़ावा मिलेगा।
भाजपा का कहना है कि ‘शुरू से ही राज्यपाल के प्रति अधीर रहने वाली कांग्रेस सरकार उन्हें सत्ता में कटौती करने के लिए दुश्मन के रूप में देखती है और यह संवैधानिक व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश है। राज्य सरकार का यह कदम बेहद निंदनीय है।’
वहीं, कांग्रेस ने सरकार के इस कदम का बचाव किया है और कहा है कि ‘यह विश्वविद्यालय को और सक्रिय बनाएगा और तुरंत निर्णय लिया जाएगा। यह व्यवस्था गुजरात और अरुणाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में है।’
हालांकि यह सर्वविदित तथ्य है कि विश्वविद्यालय के कुलपतियों की नियुक्ति ऐतिहासिक रूप से राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में ही आता है। लेकिन कई प्रदेशों में इससे इतर भी व्यवस्था बनाई गयी है। यहां तक कि भाजपा शासित गुजरात में भी ऐसा ही है। कर्नाटक के कांग्रेस नेता भी यही कह रहे हैं कि कर्नाटक सरकार ने गुजरात मॉडल का ही अनुसरण करने का निर्णय लिया है, जहां कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल के बजाय सीधे मुख्यमंत्री के पास है।
इस लिहाज से तो कर्नाटक में राज्यपाल से आरडीपीआर विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति करने के अधिकार छीनने के फैसले की निंदा कर एक तरह से भाजपा अपने ही फैसले पर सवाल खड़ा कर रही है। आखिर वह किस मुंह से यह कह सकती है कि यह संवैधानिक व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश है या फिर यह उच्च शिक्षा प्रणाली को प्रदूषित करने का प्रयास है। कालांतर में उसने भी यही किया है।
बहरहाल इसके बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कर्नाटक सरकार का यह ताज़ा कदम शिक्षा के क्षेत्र के राजनीतिकरण की ही अगली कड़ी है। विशुद्ध रूप से यह राजनीति ही है, भले ही बहाना शिक्षा बन रही है। वैसे, कहने वाले यहाँ तक कह रहे हैं कि सीएम सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली सरकार, जो भ्रष्टाचारों से घिरी हुई है, अपनी मौजूदा शक्तियों का दुरुपयोग करके उच्च शिक्षा प्रणाली को प्रदूषित करने की कोशिश कर रही है।
संविधान के अनुसार, राज्यपाल विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होता है। राज्यपाल सभी राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में कार्य करते हैं और उनके पास कुलपतियों की नियुक्ति सहित महत्वपूर्ण शक्तियां होती हैं। राज्यपाल विश्वविद्यालय प्रशासनिक मामलों में मंत्रिपरिषद से परामर्श तो करते ही हैं, साथ ही स्वतंत्र निर्णय भी ले सकते हैं। शुरू से ऐसा ही होता रहा है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कई मामलों में राज्यपाल के फैसले पर सवालिया निशान भी लगे हैं। उनके फैसलों को राजनीति से प्रेरित बताया गया है। शायद यही वजह है कि अब यह पद भी राजनीतिक खींचतान के दायरे में उतार दिया गया है।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस राजनीति से अंततः नुकसान शिक्षा का ही हो रहा है। बहरहाल, कर्नाटक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2000 में संशोधन का मसौदा कैबिनेट ने तो मंजूर कर लिया है, जिसके तहत विश्वविद्यालय के मामलों में राज्यपाल की शक्तियां काफी कम हो जाएंगी, लेकिन आगे यह और क्या मोड़ लेगा, देखना अभी शेष है।




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