
निर्देशक पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ को साल 2025 के बाफ्टा फिल्म अवार्ड्स में ‘बेस्ट फिल्म नॉट इन इंग्लिश लैंग्वेज’ की श्रेणी में नामांकन मिला है। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार समारोह 16 फरवरी को ब्रिटिश अकादमी की ओर से आयोजित किया जाएगा। इसमें विभिन्न श्रेणियों में बेहतरीन फिल्मों और कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा।
फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ की कहानी मुंबई शहर में रहने वाली तीन महिलाओं की जिंदगी पर आधारित है। फिल्म में प्यार, तन्हाई और अकेलेपन के अनुभवों को खूबसूरती से पेश किया गया है। इस फिल्म में कनी कुसरुति, दिव्या प्रभा और छाया कदम मुख्य भूमिका में हैं। इस फिल्म की चर्चा हर तरफ हो रही है और काफी क्रेज है।
दरअसल, ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’, एक ऐसी फिल्म है जिसने दुनियाभर में अपना परचम लहराया है। यह फिल्म पिछले साल कान फिल्म महोत्सव में भारत की ओर से ग्रैंड प्रिक्स ट्रॉफी जीतने में सफल रही थी। उसके बाद से यह अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों में लगातार सफलता प्राप्त कर रही है। हाल ही में इसे गॉथम अवार्ड्स में “बेस्ट इंटरनेशनल फिल्म” का पुरस्कार भी मिला था। साथ ही, यह फिल्म साइट एंड साउंड मैगजीन की ओर से जारी की गई 50 बेहतरीन फिल्मों की सालाना सूची में भी पहले स्थान पर रही। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे वर्ष की अपनी पसंदीदा फिल्मों की सूची में शामिल किया है।
फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ मुंबई में दो मलयाली नर्सों के आपस में जुड़े जीवन को दर्शाती है। फिल्म की कहानी की बात की जाए तो इसमें मुंबई के बैकड्रॉप को लेकर आम महिलाओं के संघर्ष और जीवन को बहुत ही उम्दा तरीके से दिखाया गया है। मुंबई काम करने के लिए शहर बढ़िया है, रहने लायक ये शहर अब तक बन नहीं पाया है। ये फिल्म की निर्देशक पायल कपाड़िया का इस शहर पर बहुत तीखा तंज है।
फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ मुंबई में ही शुरू होती है। एक नर्स है प्रभा यानी कनी कुश्रुति। चेहरे से सख्त मिजाज लेकिन भीतर ही भीतर कहीं से टूटी हुई। ये जो सख्त मिजाज लोग होते हैं, न वे भीतर से बहुत मुलायम होते हैं। प्रभा ने अपने पति को कम ही देखा। फिर वो जर्मनी चला गया और ये यहां मुंबई। लोकल ट्रेन में पिसती घिसटती रहती है और एक दिन दरवाजे पर जब राइस कुकर आता है तो उसकी ख्वाहिशें भी इंटरनेशनल हो उठती हैं। कुछ कुछ वॉन्ग कार वाई की फिल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ की तरह। राइस कुकर को दबोच कर उसका सिसकना विरह की पीड़ा का हाल के दिनों का सबसे अच्छा उनवान है।
कहानी की दूसरी नायिका अनु के किरदार में दिव्या प्रभा हैं। वह जिस्म, जान और जहान सबसे बागी है। उसी अस्पताल में हैं जहां प्रभा काम करती है, उसकी जूनियर है। सड़क पार करते बिना एक दूसरे के देखे जब उसका हाथ आकर उसका बॉयफ्रेंड शियाज थामता है तो सिनेमा को प्रेम का एहसास दिखाने का एक नया सबक मिलता है। प्रेम के एकाकी पल भरी भीड़ में भी तलाशे यूं ही जाते हैं। दोनों के धर्म अलग अलग हैं। लड़की बुर्का पहनकर इसमें सहूलियत लाने को तैयार है। लेकिन, मौसम उनको फुर्सत के दो पल भी नहीं देता। बस बिना देखे बरस जाता है।
प्रभा और अनु साथ रहती हैं, ये बात फिल्म शुरू में ही हमें नहीं बताती। दोनों के जीवन का संघर्ष सजाने के बाद फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’हमें उस जगह लाती है, जहां दोनों साथ रहती हैं। मुंबई का दमघोंटू सा माहौल एकदम से नीला नीला हो जाता है। फिल्म शुरू से यही कलर पैलेट लेकर चलती है। पायल को भी ये रंग खास ही पसंद रहा होगा, इस कहानी में। उनकी नानी की डायरी की कहानियां भी पुरुष प्रलाप का बहाना यहां बनती रहती हैं, लेकिन यहां प्रभा और अनु की कहानी का संगम पार्वती की कहानी से होता है। छाया कदम यहां फिर चाय बेचने वाली के किरदार में हैं। मुंबई की बंद हो चुकी मिलों की जगह बन रहे घरों में एक घर उसका भी होना चाहिए, लेकिन जैसा असल मुंबई में है, वैसा ही यहां भी है। पायल कपाड़िया सियासी शतरंज की चालें इतनी सरलता से चलती हैं कि पता ही नहीं चलता घोड़ा ढाई घर कब बैठेगा।
और, फिर होता है मुक्ति गान! मुक्ति गान बोले तो मुंबई शहर से निकल भागने की फुर्सत मिलना। इस शहर में वाकई सीधे, सरल और सहज लोगों का दम घुटता है। यहां सब किसी न किसी प्लानिंग में हैं। शब्दों के, मदद के, सलाहों के सीधे मायने नहीं समझते लोग। सबको उसके पीछे का ‘अर्थ’ पता करना है, फिर चाहे वो हो या न हो। पार्वती तय करती है कि वह गंगोत्री की तरफ लौटेगी यानि कि अपने गांव। यहां आकर उसका मन मयूर नाच उठता है। अनु का आशिक भी यहां तक चला आया है। दोनों औरंगाबाद की गुफाओं में जब होते हैं तो दर्शक भी वहां खुद को महसूस करते हैं। अनु अपने साथ लोगों की आंखें ले चलती है और जब वह अपने सबसे अंतरंग समय में होती है तो प्रभा की आंखें भी इनमें आ शामिल होती हैं। लेकिन, दोनों की आपस में आंखें मिलती नहीं हैं, बस दोनों का नजरिया मिलता है और दर्शक आनंद के उत्कर्ष पर खुद को पाता है।




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