
संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMG) के लिए भारत में योग्यता परीक्षा पास करना बेहद कठिन साबित हो रहा है। रिपोर्ट में बताया गया कि 2023 में सिर्फ 16.65% छात्र ही FMG परीक्षा पास कर सके। मुख्य कारण विदेशों में कमजोर क्लीनिकल प्रशिक्षण और निम्न गुणवत्ता वाली मेडिकल शिक्षा को बताया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया कि अन्य पेशेवर कोर्स की तुलना में मेडिकल शिक्षा की फीस सख्त नियमों के बावजूद बहुत ज्यादा है। निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 48% सीटों के लिए फीस 60 लाख से 1 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा होती है। यही वजह है कि भारत में मेडिकल शिक्षा की अत्यधिक ऊंची फीस के कारण हर साल हजारों छात्र चीन, रूस, यूक्रेन, फिलीपींस और बांग्लादेश जैसे देशों का रुख करते हैं। लेकिन कम लागत वाली विदेशी डिग्री के बावजूद, वहां के शिक्षा स्तर और प्रशिक्षण को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया कि विदेशों में मेडिकल पढ़ाई को कम आकर्षक बनाने के लिए कुछ नीतिगत बदलाव किए जाने चाहिए। साथ ही, भारत में मेडिकल शिक्षा की लागत को संतुलित रखना भी जरूरी है, ताकि छात्रों को विदेश जाने की जरूरत न पड़े।
भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए विदेशी मेडिकल छात्रों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। पहले उन्हें NEET-UG क्लियर करके विदेश में दाखिला लेना पड़ता है। फिर डिग्री पूरी करने के बाद भारत में FMG परीक्षा पास करनी होती है और अंत में 12 महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप करनी पड़ती है।
पिछले कुछ वर्षों में कई विदेशी छात्र मुश्किलों का सामना कर चुके हैं। चीन में कोविड-19 लॉकडाउन और यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण कई भारतीय छात्रों को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी और वे भारत लौटने को मजबूर हुए। FMG परीक्षा पास करने के बाद भी कई छात्रों को कानूनी और प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
FMG परीक्षा में पास होने वाले छात्रों की संख्या बहुत कम है। 2023 में सिर्फ 16.65% छात्र ही यह परीक्षा पास कर सके। इसका मुख्य कारण विदेशों में कमजोर क्लीनिकल प्रशिक्षण और मेडिकल शिक्षा की निम्न गुणवत्ता है। कई बार इन छात्रों को भारत में प्रैक्टिस करने के लिए कानूनी बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है, जिससे न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा है।
रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में मेडिकल सीटों का असमान वितरण भी बड़ी समस्या है। 51% स्नातक (MBBS) और 49% स्नातकोत्तर (PG) सीटें सिर्फ दक्षिण भारतीय राज्यों में केंद्रित हैं। इसके अलावा, ज्यादातर मेडिकल सुविधाएं और कॉलेज शहरी इलाकों में हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। वर्तमान में, शहरी क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 3.8 गुना ज्यादा है।
इसके अलावा, कुछ मेडिकल शाखाओं, जैसे रेडियोलॉजी, त्वचा रोग (डर्मेटोलॉजी), स्त्री रोग (गायनेकोलॉजी) और कार्डियोलॉजी में ज्यादा सीटें उपलब्ध हैं, जबकि मानसिक स्वास्थ्य (साइकेट्री) और बुजुर्गों की देखभाल (गेरियाट्रिक्स) जैसे आवश्यक चिकित्सा क्षेत्रों में सीटों की कमी चिंताजनक है। अगर इस असंतुलन को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में भारत की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।




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