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डीयू प्रोफेसर ने बयां की स्कूल टीचर से प्रोफेसर बनने तक की अपनी संघर्षपूर्ण यात्रा, कहानी हो गयी वायरल

भारत के शिक्षा क्षेत्र में लिंग वेतन असमानता और कार्यस्थल उत्पीड़न के बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की एक प्रोफेसर की टिपण्णी सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी है, जिसे लेकर एक व्यापक बहस छिड़ गई है।  दरअसल, कविता कंबोज ने, जो अब किरोड़ीमल कॉलेज में सहायक प्रोफेसर हैं, ने सीबीएसई स्कूल में कम वेतन वाली पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) से लेकर एक प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थान में स्थायी पद प्राप्त करने तक के अपने संघर्षपूर्ण सफर को बयां किया है।

वेतन में लिंग-आधारित भेदभाव का सामना
अपने करियर की शुरुआत में, 22 साल की उम्र में, कविता को मात्र 3,200 रुपये प्रति माह वेतन मिलता था, जबकि उनके पुरुष सहकर्मी 18,000 रुपये तक कमा रहे थे। इस असमानता के बावजूद, उन्होंने कड़ी मेहनत जारी रखी, लेकिन पाया कि स्कूलों में कक्षा शिक्षण की तुलना में निजी ट्यूशन को अधिक महत्व दिया जाता है।

कविता ने लिंक्डइन पोस्ट के माध्यम से अपनी आपबीती साझा करते हुए लिखा, “निजी स्कूलों, खासकर छोटे शहरों में, शिक्षक अक्सर बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने को मजबूर होते हैं। अव्यवस्थित वेतन संरचना और नकली वेतन रसीदें आम समस्या हैं।”

निजी स्कूलों में शोषण और वेतन असमानता
कविता ने बताया कि उनके पुरुष सहकर्मी, जो ट्यूशन सेंटर भी चलाते थे, उनसे कहीं अधिक (लगभग 43,000 रुपये प्रति माह) कमा रहे थे। जब उन्होंने अपने वेतन को लेकर चिंता जताई, तो स्कूल प्रिंसिपल ने टालमटोल और अस्पष्ट वादे किए।

बेहतर अवसरों की तलाश में जब उन्होंने दूसरी नौकरी के लिए आवेदन किया, तो प्रिंसिपल ने धमकी दी कि उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। कई महीनों बाद भी, उनके वेतन में महज 500 रुपये की वृद्धि की गई, जिससे कुल वेतन केवल 3,700 रुपये हुआ।

शोषण से निकलने का संघर्ष और सरकारी कॉलेज में नौकरी
कविता ने UGC-NET पास किया और जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप (JRF) भी प्राप्त की, लेकिन निजी कॉलेजों में फिर भी उन्हें कम वेतन का सामना करना पड़ा। इससे निराश होकर, उन्होंने 24 साल की उम्र में चंडीगढ़ का रुख किया, जहां एक सरकारी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के रूप में उन्हें 25,800 रुपये का वेतन मिला—बिना किसी लिंग भेदभाव के।

जब उन्होंने अपने पुराने प्रिंसिपल को इस बारे में बताया, तो उनकी प्रतिक्रिया गुस्से से भरी थी, लेकिन कविता को संतोष था कि अब उनका आत्म-सम्मान बरकरार था।

शिक्षकों की स्थिति सुधारने की जरूरत
कविता ने छोटे शहरों में शिक्षकों को होने वाली कठिनाइयों पर जोर दिया, जहां कम वेतन, अनिश्चित भविष्य और सम्मान की कमी आम समस्याएं हैं। उन्होंने नीतिगत बदलावों और पूरे भारत में शिक्षकों के प्रति बेहतर व्यवहार की उम्मीद जताई, ताकि शिक्षा क्षेत्र में काम करने वालों को उनका सही मूल्य और सम्मान मिल सके।

Asmita Sarkar

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