
प्रख्यात संस्कृत विद्वान डॉ. प्रभाकर पांडुरंग आप्टे का निधन महाराष्ट्र के ठाणे में हो गया। वे 92 वर्ष के थे और लंबे समय से आयु संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। गुरुवार रात उनका निधन हुआ। उनके परिवार में उनकी दो बेटियां हैं।
पंचरात्र आगम और धर्मशास्त्र में विशेषज्ञता
डॉ. आप्टे ‘आगम’ पर अपने विशिष्ट शोध कार्य के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। पंचरात्र आगम पर उनकी गहन समझ और व्याख्या उन्हें समकालीन विद्वानों के बीच अद्वितीय बनाती थी। वे संस्कृत साहित्य, मंदिरों की वास्तुकला और धर्मशास्त्र के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले विद्वानों में गिने जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे एक प्रशिक्षित वकील भी थे, जिससे उनके शोध में एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण झलकता था।
शैक्षणिक संस्थानों से गहरा जुड़ाव
अपने जीवनकाल में डॉ. आप्टे कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े रहे। वे पुणे के डेक्कन कॉलेज के साथ-साथ मद्रास विश्वविद्यालय, तिरुपति के राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, मुंबई के अनंताचार्य शोध संस्थान आदि में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे। उन्होंने शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अपनी बहुमूल्य सेवाएं दीं।
‘समरांगण सूत्रधार’ का अंग्रेज़ी अनुवाद – एक महत्वपूर्ण उपलब्धि
डॉ. आप्टे की उल्लेखनीय उपलब्धियों में धार के राजा भोज द्वारा रचित 11वीं शताब्दी के भारतीय वास्तु ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ का अंग्रेज़ी अनुवाद शामिल है। इस ग्रंथ में भारतीय वास्तुकला, शिल्प और निर्माण विज्ञान की बारीकियों का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त, वे डेक्कन कॉलेज की संस्कृत शब्दकोश परियोजना में भी योगदानकर्ता रहे।
भारतीय ज्ञान प्रणाली के अग्रणी संरक्षक
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. प्रशांत धर्माधिकारी ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि “सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणालियों को बढ़ावा दे रही है, लेकिन इस दिशा में डॉ. आप्टे का कार्य पहले ही मार्गदर्शन का स्तंभ बन चुका है।”
उन्होंने आगे कहा, “डॉ. आप्टे की पुस्तकें – समरांगण सूत्रधार और पौष्कर संहिता – आज के इंजीनियरों और वास्तुकारों को फिर से पढ़नी चाहिए ताकि वे भारतीय वास्तुशास्त्र के छिपे हुए चमत्कारों को समझ सकें। वह संस्कृत, न्यायशास्त्र, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दुर्लभ संगम थे।”
डॉ. आप्टे का निधन भारतीय शास्त्रीय ज्ञान परंपरा के लिए एक अपूरणीय क्षति है, परंतु उनका लेखन और शोध आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।




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