
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री और पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने स्पष्ट किया है कि एनसीईआरटी की किताबों से मुगल काल को हटाया नहीं गया है, बल्कि केवल दोहराव वाली सामग्री को संपादित किया गया है। उन्होंने कहा कि मुगल काल भारतीय इतिहास का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इसे अन्य ऐतिहासिक युगों की कीमत पर महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए।
मजूमदार ने यह भी कहा कि जैसे मुगलों का अपना महत्व है, वैसे ही प्राचीन भारत के अन्य युग—जैसे मौर्य, गुप्त और सातवाहन काल—भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं और उन्हें उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने मुगल काल को “भारतीय इतिहास का सबसे काला दौर” बताया।
इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने छत्रपति संभाजीनगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि इतिहास की पुस्तकों में मुगल शासक औरंगज़ेब का महिमामंडन किया गया है, जो ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ जैसा है।
एनसीईआरटी ने पहले ही मुगलों और दिल्ली सल्तनत पर आधारित कई अध्यायों को छोटा कर दिया था। इनमें तुगलक, खलजी, मामलूक और लोदी वंशों का विवरण और मुगल सम्राटों की उपलब्धियों से जुड़ी जानकारी शामिल थी। अब नई पुस्तकों में इन सभी का उल्लेख हटा दिया गया है।
नई सामाजिक विज्ञान की किताब “समाज की खोज: भारत और उससे परे” में अब प्राचीन भारतीय राजवंशों जैसे मगध, मौर्य, शुंग और सातवाहन पर केंद्रित अध्याय शामिल हैं, जिनमें “भारतीय लोकाचार” को प्रमुखता दी गई है।
इसके अलावा, किताब में एक नया अध्याय “भूमि कैसे पवित्र बनती है” जोड़ा गया है। इसमें विभिन्न धर्मों—इस्लाम, ईसाई, यहूदी, पारसी, हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म—के लिए भारत और विदेशों में पवित्र माने जाने वाले स्थलों का विवरण दिया गया है। इसमें 12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम यात्रा, शक्ति पीठों के साथ-साथ नदी संगम, पर्वत और जंगल जैसे पवित्र स्थलों का उल्लेख किया गया है।
एनसीईआरटी की किताबों में किए गए बदलावों को लेकर विपक्षी दलों ने तीखी आलोचना की है। उन्होंने इसे “इतिहास का भगवाकरण” करार दिया है। वहीं, एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि दंगों जैसे संवेदनशील मुद्दों को पढ़ाने से छोटे बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।




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