
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) अपने कर्मचारियों की कार्यक्षमता और निष्पादन की समय-समय पर समीक्षा करेगा। इस उद्देश्य से विश्वविद्यालय ने एक नौ सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह फैसला केंद्र सरकार की हालिया अधिसूचना को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जिसमें काम में लापरवाही या ईमानदारी पर संदेह होने की स्थिति में कर्मचारियों को समय से पहले सेवानिवृत्त करने की बात कही गई है।
इस समिति के अध्यक्ष डीयू की कार्यकारी परिषद के चांसलर द्वारा नामित सदस्य इंद्र मोहन कपाही को बनाया गया है। शुक्रवार को हुई कार्यकारी परिषद की बैठक में इस प्रस्ताव को पेश किया गया, जिसमें कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DOPT) द्वारा जून 2024 में जारी ऑफिस मेमोरेंडम का हवाला दिया गया। इस मेमोरेंडम में कहा गया है कि 50 या 55 वर्ष से अधिक आयु या 30 वर्षों की सेवा पूरी कर चुके कर्मचारियों की हर तीन महीने में समीक्षा की जाएगी और आवश्यकता होने पर जनहित में सेवानिवृत्ति दी जा सकती है।
प्रशासन बनाम शिक्षक समुदाय: मतभेद उभर कर सामने आए
जहां विश्वविद्यालय प्रशासन इस निर्णय को प्रशासनिक पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने वाला कदम बता रहा है, वहीं शिक्षकों के बीच इसे लेकर गहरी चिंता और विरोध देखने को मिला है। शिक्षकों का कहना है कि इस नीति का दुरुपयोग हो सकता है और इसके जरिए विरोधी या असहमति जताने वाले कर्मचारियों को निशाना बनाया जा सकता है।
कार्यकारी परिषद के सदस्य प्रो. मिथुराज धुसिया ने इस प्रस्ताव पर असहमति जताते हुए कहा कि यह नियम केवल केंद्रीय सिविल सेवा नियम (CCS) के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों पर लागू होता है, जबकि डीयू के शिक्षक इस श्रेणी में नहीं आते।
इंडियन नेशनल टीचर कांग्रेस के चेयरमैन प्रो. पंकज कुमार गर्ग ने इसे ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम के लिए उपयुक्त बताया, न कि अकादमिक संस्थानों के लिए। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के कदमों से शैक्षणिक स्वतंत्रता और शिक्षकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है।
अगली बैठक में पेश होंगी सिफारिशें
समिति द्वारा की गई सिफारिशों को डीयू की अगली कार्यकारी परिषद की बैठक में पेश किया जाएगा। तब तक शिक्षकों और प्रशासन के बीच इस मुद्दे को लेकर मतभेद और गहराने की संभावना है।




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