
हाल ही में प्रकाशित वैश्विक उच्च शिक्षा रैंकिंग्स ने एक बार फिर भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर किया है। नेचर इंडेक्स की नवीनतम रैंकिंग के अनुसार, विश्व के शीर्ष 10 शोध संस्थानों में से नौ चीन में स्थित हैं। वहीं क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग-2025 और टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग-2025 में अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, सिंगापुर और जापान के विश्वविद्यालयों ने एशिया और विश्व स्तर पर मजबूत स्थिति बनाई है, जबकि भारत की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है। यह हमारे उच्च शिक्षा तंत्र की बदहाली और गुणवत्ता की चिंता को रेखांकित करता है।
भारत में लंबे समय से उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसे ध्यान में रखते हुए अब केंद्र सरकार ने प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने परिसर स्थापित करने की अनुमति देना शुरू किया है। यह कदम न केवल शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने में सहायक होगा, बल्कि देश की बढ़ती छात्र आबादी की अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की मांग को भी पूरा करेगा।
वर्तमान में लगभग 18 लाख भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह संख्या हर साल 15-20 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इन छात्रों के पसंदीदा गंतव्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश हैं। विदेश में पढ़ाई के लिए न केवल भारी धनराशि—लगभग 70 अरब डॉलर सालाना—भारत से बाहर जाती है, बल्कि अनेक प्रतिभाशाली छात्र विदेशों में ही बस जाते हैं। इस तरह देश को प्रतिभा और पूंजी दोनों का नुकसान होता है।
इस परिदृश्य में यह उत्साहजनक है कि कुछ प्रमुख विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसरों की स्थापना की दिशा में ठोस कदम उठा चुके हैं। ब्रिटेन की लिवरपूल यूनिवर्सिटी ने बेंगलुरु में, साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी ने गुरुग्राम में, अमेरिका का इलिनॉयस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मुंबई में, और ऑस्ट्रेलिया की डिकिन व वोलोंगोंग यूनिवर्सिटी गुजरात की गिफ्ट सिटी में अपने परिसर खोलने की तैयारी कर रहे हैं।
इन विदेशी विश्वविद्यालयों के पास अत्याधुनिक सुविधाएं, अनुभवी और प्रशिक्षित शैक्षणिक स्टाफ, उन्नत शोध पद्धतियां और नवाचार की संस्कृति होती है। ये भारत में शोध और विकास को नई दिशा दे सकते हैं और प्रतिभावान विद्यार्थियों तथा शिक्षकों को बेहतर अवसर प्रदान कर सकते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि भारत में पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण विदेशी विश्वविद्यालय खुलते हैं, तो विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या में लगभग 75% तक की कमी आ सकती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि ‘ब्रेन ड्रेन’ जैसी समस्या से भी राहत मिलेगी।
इसके अतिरिक्त, यदि ये संस्थान अपेक्षाकृत सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करते हैं, तो वे न केवल भारतीय छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे, बल्कि ‘ग्लोबल साउथ’ के अन्य देशों के छात्रों को भी आकर्षित कर सकेंगे। इससे भारत वैश्विक शिक्षा का एक नया केंद्र बन सकता है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार, वर्ष 2025 के अंत तक कम से कम 15 विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने शैक्षणिक कार्य शुरू कर देंगे। यह पहल भारत को एक ‘नॉलेज इकोनॉमी’ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, साथ ही देश की ‘सॉफ्ट पावर’ को भी सशक्त करेगी।
हालांकि, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ये संस्थान केवल व्यावसायिक उद्देश्य से न आएं, बल्कि शिक्षा, अनुसंधान और वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देने के लक्ष्य के साथ भारत में काम करें। इसके लिए सरकार को एक मजबूत निगरानी और नियामक ढांचा तैयार करना होगा, ताकि इन परिसरों की गुणवत्ता और पारदर्शिता बनी रहे।
निष्कर्षतः भारत की उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों तक पहुँचाने के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों का आगमन एक सकारात्मक और आवश्यक कदम है। लेकिन यह कदम तभी सफल होगा, जब इसे दूरदर्शी योजना, नीति-संरचना और पारदर्शी क्रियान्वयन के साथ लागू किया जाए।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)




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