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ट्रंप की नीतियों से विज्ञान पर संकट

वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर विज्ञान, शोध और उच्च शिक्षा को सहयोग और समावेशिता की आवश्यकता है, तब अमेरिका की राजनीति उल्टी दिशा में चल रही है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां वैज्ञानिक जगत के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुकी हैं। विशेषकर शिक्षा, शोध और वैश्विक सहयोग के क्षेत्र में उनकी सोच संकुचित, राष्ट्रवादी और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से विफल प्रतीत होती है।

वैज्ञानिक समुदाय में गहराती चिंता
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में जिस तरह से विदेशी छात्रों और वैज्ञानिकों पर नीतिगत प्रतिबंध लगाए, उससे न केवल अमेरिका के शैक्षणिक संस्थान प्रभावित हुए हैं, बल्कि खुद अमेरिकी वैज्ञानिक समुदाय के भीतर असंतोष की लहर है। अमेरिका दशकों से भारत जैसे देशों से प्रतिभा प्राप्त कर वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में अग्रणी रहा है। परंतु अब “ब्रेन ड्रेन” की यह धारा पलटने लगी है — अब अमेरिका से बाहर की ओर “ब्रेन ड्रेन” होने लगा है।

यात्रा प्रतिबंध और संक्रामक रोग अनुसंधान में बाधा
ट्रंप प्रशासन द्वारा कई गरीब और उपेक्षित देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाने के फैसले ने वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग को गंभीर झटका दिया है। इन देशों में संक्रामक रोगों के अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों की आवाजाही अत्यंत आवश्यक होती है। कैलिफोर्निया के विकासवादी जीवविज्ञानी क्रिस्टियन एंडरसन ने नेचर पत्रिका को बताया कि यह प्रतिबंध वैश्विक महामारी अनुसंधान और समाधान के लिए बेहद हानिकारक साबित होगा।

उच्च शिक्षा पर वार: छात्र, विश्वविद्यालय और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
ट्रंप प्रशासन की नीतियां अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर प्रत्यक्ष प्रहार कर रही हैं। शिक्षा और शोध पर खर्च में कटौती और विदेशी छात्रों की संख्या पर रोक से न केवल विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक स्तर गिर रहा है, बल्कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा नुकसान हो रहा है। अकेले भारत से ही 2023-24 में 3.3 लाख से अधिक छात्रों ने अमेरिका में पढ़ाई की, जिससे अमेरिका को लगभग 10 अरब डॉलर की आमदनी हुई। यह आकंड़ा बताता है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों की विदेशी छात्रों पर आर्थिक निर्भरता कितनी गहरी है।

चीन और यूरोप को मिल रहा फायदा
जहां अमेरिका में शोध और विज्ञान का प्रवाह धीमा पड़ रहा है, वहीं चीन जैसे देश वैज्ञानिक उपलब्धियों के नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। वर्ष 2022 में चीन से 48% से अधिक पेटेंट आवेदन प्राप्त हुए, जबकि अमेरिका की भागीदारी मात्र 5% रही। नेशनल साइंस फाउंडेशन द्वारा अनुसंधान अनुदान में की गई कटौती और नासा के बजट में गिरावट से वैश्विक वैज्ञानिक विकास प्रभावित हो रहा है।

मार्सिया मैकनट, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की अध्यक्ष, इसे विज्ञान की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अमेरिका की एक बड़ी हार मानती हैं। उनका मानना है कि इस क्षति की भरपाई करना आसान नहीं होगा।

वीजा जांच और निगरानी: विज्ञान में नहीं, संदेह में निवेश
विदेशी छात्रों के वीजा आवेदनों की जांच अब राजनीतिक और वैचारिक नजरिए से की जा रही है। खासकर भारतीय छात्रों के सोशल मीडिया इतिहास की जांच कर, उन्हें केवल विचारधारा के आधार पर वीजा देने या न देने का निर्णय लिया जा रहा है। विज्ञान की दुनिया, जो विचारों की आज़ादी और तर्क पर टिकी होती है, उसमें इस तरह की “राजनीतिक शुद्धता” की मांग लोकतांत्रिक मूल्यों और नवाचार दोनों के लिए खतरा है।

अंत में…
डोनाल्ड ट्रंप की विज्ञान-विरोधी और राष्ट्रवादी नीतियों का प्रभाव केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिका जैसे देश की वैज्ञानिक गिरावट का असर वैश्विक शोध, प्रौद्योगिकी विकास और नवाचार की गति पर भी पड़ेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान को राजनीति से ऊपर रखा जाए। दुनिया को ऐसे नेता चाहिए जो वैश्विक चुनौतियों – महामारी, जलवायु परिवर्तन, और तकनीकी असमानता – का समाधान खोजने के लिए वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को प्रोत्साहित करें, न कि सीमाएं खींचें।

अगर अमेरिका ने अपनी वैज्ञानिक सोच को पुनर्जीवित नहीं किया, तो वह न केवल अपनी “वैज्ञानिक महाशक्ति” की छवि खो देगा, बल्कि वह वैश्विक भविष्य गढ़ने की दौड़ से भी पीछे छूट जाएगा।

रईस अहमद 'लाली'

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