
नीट (NEET) और जेईई (JEE) जैसी परीक्षाएं दुनिया की सबसे कठिन प्रवेश परीक्षाओं में गिनी जाती हैं। हर साल करीब 40 लाख छात्र इन दोनों परीक्षाओं में शामिल होते हैं। तैयारी के लिए अधिकांश छात्र कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा का स्तर बहुत अधिक हो गया है। इसी दबाव के चलते कई छात्र मानसिक तनाव और डिप्रेशन का भी शिकार हो जाते हैं। अब सरकार इन परिस्थितियों को बदलने की दिशा में कदम उठा रही है।
सरकार की योजना: परीक्षा पैटर्न में बदलाव
भारत सरकार नीट और जेईई जैसी प्रवेश परीक्षाओं के पैटर्न में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों की कोचिंग पर निर्भरता को कम करना, पढ़ाई को ज्यादा संतुलित और कम तनावपूर्ण बनाना है।
वर्तमान में हर साल 20 लाख से अधिक छात्र नीट यूजी परीक्षा देते हैं और 12 लाख से अधिक छात्र जेईई मेन में भाग लेते हैं।
हालांकि कोचिंग से कुछ छात्रों को बेसिक समझने में मदद मिलती है, लेकिन कई छात्र केवल रटकर परीक्षा पास करने की कोशिश करते हैं। सरकार चाहती है कि परीक्षाएं छात्रों की स्कूली शिक्षा (कक्षा 11वीं–12वीं) के सिलेबस के अनुरूप हों, जिससे वे बिना कोचिंग भी आत्मनिर्भर होकर तैयारी कर सकें।
9 सदस्यीय समिति कर रही है बदलाव की तैयारी
शिक्षा मंत्रालय ने परीक्षा पैटर्न में बदलाव के लिए एक 9 सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह समिति न सिर्फ नीट और जेईई की परीक्षा प्रणाली का मूल्यांकन कर रही है, बल्कि स्कूल शिक्षा और माता-पिता की मानसिकता में बदलाव पर भी काम कर रही है।
समिति की मुख्य सिफारिशें:
– स्कूल शिक्षक समय रहते उन छात्रों की पहचान करें जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहते हैं
– उन्हें नियमित पढ़ाई के साथ एक्स्ट्रा कक्षाएं देकर मार्गदर्शन दिया जाए
– इससे छात्रों की कोचिंग पर निर्भरता घटेगी और दबाव भी कम होगा
नवोदय विद्यालय में शुरू हुआ प्रयोग
इस दिशा में नवोदय विद्यालयों में एक पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू किया गया है। समिति अब उसकी समीक्षा कर रही है। चिंता जताई गई है कि यदि स्कूलों ने समय रहते तैयारी नहीं की तो 9वीं कक्षा के बाद छात्र केवल नाम मात्र के रह जाएंगे और वे स्कूल छोड़ कोचिंग की ओर रुख करेंगे।
अभिभावकों की सोच में बदलाव की जरूरत
समिति का मानना है कि बच्चों पर कोचिंग का अत्यधिक दबाव उनके मानसिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास को प्रभावित कर रहा है। इसीलिए अब अभिभावकों की काउंसलिंग पर भी जोर दिया जाएगा, ताकि वे समझ सकें कि कम उम्र में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बच्चों में डिप्रेशन और आत्मविश्वास की कमी जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।




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