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दुनिया में अनुशासन, गुणवत्ता और मूल्यों की मिसाल है जापान का एजुकेशन सिस्टम

जापान की शिक्षा प्रणाली दुनियाभर में अपने अनुशासन, गुणवत्ता और मूल्यों के लिए जानी जाती है। हर देश का एजुकेशन सिस्टम अलग होता है, और जापान इसका बेहतरीन उदाहरण है। यहां स्कूलिंग का ढांचा ‘6-3-3-4’ मॉडल पर आधारित है, यानी 6 साल की उम्र में बच्चे प्राइमरी स्कूल में दाखिला लेते हैं, फिर 3 साल जूनियर हाई स्कूल, 3 साल सीनियर हाई स्कूल और अंत में 4 साल की यूनिवर्सिटी की पढ़ाई होती है। 3 से 5 साल की उम्र के बच्चों के लिए प्री-स्कूल वैकल्पिक होता है, लेकिन लगभग 98% बच्चे इसमें दाखिला लेते हैं ताकि वे सामाजिक और बुनियादी शैक्षणिक कौशल जल्दी सीख सकें।

जापान में शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है। यहां गणित, विज्ञान और नैतिक शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता है। बच्चों को समस्या सुलझाने, सामूहिक जिम्मेदारी निभाने और समय की पाबंदी जैसे मूल्यों की ट्रेनिंग भी स्कूल के जरिए दी जाती है। प्राइमरी स्कूल में पहली कक्षा से ही होमवर्क शुरू हो जाता है, जो शुरुआती स्तर पर 1-2 घंटे प्रतिदिन होता है, लेकिन जैसे-जैसे छात्र आगे बढ़ते हैं, यह बढ़कर 2-3 घंटे तक पहुंच जाता है। गर्मी की छुट्टियों में भी बच्चों को प्रोजेक्ट, डायरी लेखन या रिसर्च असाइनमेंट जैसे कार्य दिए जाते हैं।

जापान में स्कूली शिक्षा का एक दिलचस्प पहलू ‘जुकु’ यानी क्रैम स्कूल्स हैं, जहां लगभग आधे से ज्यादा जूनियर हाई स्कूल और 60% सीनियर हाई स्कूल छात्र पढ़ाई के बाद एक्स्ट्रा कोचिंग के लिए जाते हैं। यहां उन्हें परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ कला, संगीत या खेल जैसी गतिविधियों का भी प्रशिक्षण मिलता है। छोटे बच्चे भी कभी-कभी नॉन-अकैडमिक क्लासेज के लिए जुकु में भाग लेते हैं।

अब बात फीस की करें तो, जापान में सरकारी प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूलों में ट्यूशन फीस नहीं ली जाती, लेकिन पैरेंट्स को किताबें, यूनिफॉर्म, स्कूल लंच और अन्य ऐक्टिविटीज़ के लिए सालाना कुछ खर्च करना होता है। सरकारी स्कूलों में औसतन सालाना खर्च लगभग 3.21 लाख येन (करीब 2.18 लाख रुपये) आता है। वहीं, प्राइवेट स्कूलों की बात करें तो प्राइमरी स्कूल की सालाना फीस लगभग 6.5 लाख रुपये, जूनियर हाई स्कूल की करीब 6.8 लाख रुपये और हाई स्कूल की फीस 6 से 8.8 लाख रुपये तक हो सकती है। इंटरनेशनल स्कूलों की फीस इससे भी ज्यादा होती है।

स्कूलों में अनुशासन इतना सख्त होता है कि बच्चे अपनी क्लास खुद साफ करते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी और सहयोग की भावना पैदा होती है। जापान का स्कूल सत्र अप्रैल में शुरू होता है और मार्च में समाप्त होता है, जिसमें गर्मी, सर्दी और वसंत की छुट्टियां भी मिलती हैं।

एक और दिलचस्प बात यह है कि जापानी बच्चे एक खास स्कूल बैग ‘रैंडोसेरु’ (Randoseru) का इस्तेमाल करते हैं। यह मजबूत, टिकाऊ और खास डिज़ाइन वाला बैग होता है जिसकी कीमत ₹37,000 से शुरू होकर ₹1 लाख तक जा सकती है। इसका वजन खाली होने पर 1-1.5 किलोग्राम होता है, लेकिन जब इसमें किताबें और अन्य सामान भर जाते हैं, तो यह 6-7 किलोग्राम तक पहुंच सकता है। सरकार अब डिजिटल किताबों और स्टेशनरी स्कूल में ही रखने जैसे उपायों पर विचार कर रही है ताकि बच्चों पर बोझ कम हो।

जापान की शिक्षा प्रणाली छात्रों को सिर्फ शैक्षणिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और नैतिक रूप से भी तैयार करती है। यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे प्रभावशाली और संतुलित एजुकेशन सिस्टम्स में गिना जाता है।

 
 

Asmita Sarkar

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