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जेएनयू में पहली बार भारतीय ज्ञान परंपरा पर वार्षिक सम्मेलन, उपराष्ट्रपति करेंगे उद्घाटन

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पहली बार भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुत्थान पर केंद्रित वार्षिक अकादमिक सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है। यह सम्मेलन 10 से 12 जुलाई के बीच होगा, जिसका उद्घाटन देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और केंद्रीय आयुष मंत्री सर्बानंद सोनोवाल करेंगे।

इस आयोजन का उद्देश्य भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को न केवल आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में, बल्कि नीति निर्माण और वैश्विक विमर्श में भी सुदृढ़ रूप से स्थापित करना है। कार्यक्रम का आयोजन जेएनयू प्रशासन और भारतीय ज्ञान परंपरा धरोहर गठबंधन द्वारा किया जा रहा है, जिसमें आयुष मंत्रालय, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद का सहयोग है।

‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में कदम
जेएनयू की कुलपति प्रो. शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने बताया कि यह सम्मेलन ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि जैसे अन्य देशों ने अपनी परंपरागत ज्ञान प्रणालियों को विकास का आधार बनाया है, वैसे ही भारत को भी अपनी बौद्धिक विरासत की ओर लौटना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को उन्होंने इस दिशा में एक सशक्त पहल बताया।

प्रख्यात वक्ता और पूर्वोत्तर भारत पर विशेष फोकस
सम्मेलन में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रो. मुंजल भार्गव, प्रो. कपिल कपूर और प्रो. दर्शन शंकर जैसे प्रतिष्ठित विद्वान मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होंगे। समापन सत्र में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के भाग लेने की संभावना है। कुलपति ने बताया कि सम्मेलन की एक प्रमुख विशेषता पूर्वोत्तर भारत के शैक्षणिक और सांस्कृतिक जुड़ाव पर केंद्रित होगी।

कोरपस फंड से होगा आयोजन
उन्होंने जानकारी दी कि जेएनयू को कई राज्यों से कोरपस फंड मिला है, जिसमें असम प्रमुख रूप से शामिल है। इस फंड से प्राप्त ब्याज के जरिए करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इसमें विद्वानों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को एक साझा मंच मिलेगा, जहां भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा, उद्योग, शासन और समाज में प्रभावी रूप से लागू करने पर विचार होगा।

100 से अधिक शोध पत्र और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
तीन दिवसीय इस सम्मेलन में 100 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। इसके अलावा संवाद सत्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होगा। कुलपति ने बताया कि यह सम्मेलन भविष्य में वार्षिक परंपरा के रूप में जारी रहेगा, जो युवा पीढ़ी को भारत की बौद्धिक विरासत से जोड़ने में सहायक होगा। दीर्घकालिक उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत को मुख्यधारा के अकादमिक और सांस्कृतिक विमर्शों से जोड़ना है।

Asmita Sarkar

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