
प्रसिद्ध शिक्षाविद् और दृष्टि IAS कोचिंग संस्थान के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति एक नए विवाद में घिर गए हैं। उन पर यूट्यूब वीडियो में न्यायपालिका के संबंध में की गई कथित रूप से अपमानजनक और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को लेकर अजमेर की एक अदालत में मानहानि का मुकदमा दर्ज किया गया है।
यह शिकायत अधिवक्ता कमलेश मंडोलिया ने दर्ज करवाई है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि डॉ. दिव्यकीर्ति की टिप्पणियों से न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंची है।
कोर्ट ने लिया संज्ञान, व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश
रिपोर्ट के अनुसार, अजमेर के अतिरिक्त सिविल जज एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट मनमोहन चंदेल की अदालत ने 8 जुलाई 2025 को मामले पर संज्ञान लेते हुए डॉ. दिव्यकीर्ति को 22 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने पाया कि वीडियो में न्यायपालिका का जानबूझकर उपहास किया गया, जिससे इसकी निष्पक्षता, गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। अदालत ने इस कृत्य को भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धाराएं 356(1)-(4) और 353(2) तथा आईटी अधिनियम के तहत अपराध माना।
क्या था वीडियो में?
विवादित वीडियो यूट्यूब पर “IAS vs Judge: कौन ज्यादा ताकतवर?” शीर्षक से पोस्ट किया गया था, जिसमें डॉ. दिव्यकीर्ति ने IAS अधिकारियों और जजों की शक्तियों की तुलना की थी।
वीडियो में उन्होंने कहा था कि “हाईकोर्ट बहुत ताकतवर होता है और अगर मुख्यमंत्री भी अवमानना करे तो वह नप सकता है।” साथ ही, उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम और न्यायिक नियुक्तियों पर भी टिप्पणियाँ कीं, जिन्हें कुछ दर्शकों और वकीलों ने न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध माना।
हालाँकि वीडियो अब यूट्यूब से हटा दिया गया है, लेकिन यह पहले ही वायरल हो चुका था।
दिव्यकीर्ति का पक्ष
डॉ. दिव्यकीर्ति ने अदालत में दलील दी कि विवादित वीडियो उनके द्वारा अपलोड नहीं किया गया और न ही उनकी सहमति से जारी हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि वीडियो को किसी तीसरे पक्ष ने एडिट कर प्रसारित किया है।
उन्होंने अपने बचाव में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया और कहा कि उनकी टिप्पणियां सार्वजनिक महत्त्व के विषय पर थीं, न कि किसी व्यक्ति विशेष या संस्था के खिलाफ।
साथ ही, उन्होंने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता “पीड़ित व्यक्ति” की परिभाषा में नहीं आते, क्योंकि वीडियो में किसी विशेष व्यक्ति या समूह का उल्लेख नहीं किया गया।
हालाँकि, अदालत ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि एक शिक्षक और संस्थान प्रमुख के रूप में उन्हें यह ज्ञान होना चाहिए था कि उनकी बातें रिकॉर्ड और सार्वजनिक की जा सकती हैं।
कोर्ट का रुख और आगे की कार्रवाई
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वीडियो में की गई टिप्पणियां न्यायपालिका की विश्वसनीयता और सम्मान को प्रभावित कर सकती हैं और इससे जनता में संदेह उत्पन्न हो सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट बनाम अरुंधति रॉय (2002) और प्रशांत भूषण (2020) मामलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ “स्वीकृत सीमा” से बाहर हैं।
अदालत ने अजमेर पुलिस को मामले की आगे जांच करने का भी आदेश दिया है।
शिकायतकर्ता का पक्ष
शिकायतकर्ता अधिवक्ता कमलेश मंडोलिया ने कहा कि वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा – विशेषकर “हाईकोर्ट दोनों को टांग देगा” जैसी अभिव्यक्तियाँ – न्यायपालिका की गरिमा को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाती हैं।
वकील अशोक सिंह रावत ने कोर्ट में दलील दी कि डॉ. दिव्यकीर्ति की टिप्पणियाँ पूरे न्यायिक तंत्र के लिए अपमानजनक हैं।




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