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71 साल की उम्र में सीए बनकर मिसाल बने ताराचंद अग्रवाल, बोले- गीता ने रास्ता दिखाया

चार्टर्ड अकाउंटेंसी (सीए) की परीक्षा देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में मानी जाती है, जिसे पार कर पाना युवाओं के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन राजस्थान के जयपुर निवासी 71 वर्षीय ताराचंद अग्रवाल ने अपने दृढ़ संकल्प और अनुशासन के बल पर इस चुनौती को पार कर एक मिसाल कायम की है।
6 जुलाई 2025 को उन्होंने सीए फाइनल परीक्षा पास कर यह सिद्ध कर दिया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।

बैंक अधिकारी से सीए बनने का प्रेरक सफर
ताराचंद अग्रवाल का जन्म हनुमानगढ़ जिले के संगरिया कस्बे में एक किसान-व्यवसायी परिवार में हुआ था। आठ भाई-बहनों में चौथे स्थान पर रहे ताराचंद ने प्रारंभिक शिक्षा संगरिया में प्राप्त की। वर्ष 1974 में दर्शनाजी से विवाह और 1976 में स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर (अब एसबीआई) में क्लर्क पद पर नियुक्ति हुई। बैंक में 38 वर्षों की सेवा के बाद वे 2014 में सहायक महाप्रबंधक (AGM) पद से सेवानिवृत्त हुए।

पत्नी के निधन के बाद जीवन में आया खालीपन
2020 में पत्नी के निधन के बाद ताराचंद के जीवन में शून्यता आ गई थी। परिवार और पोते-पोतियां साथ थे, लेकिन मन नहीं लगता था। इस कठिन समय में उन्होंने भगवद गीता पढ़ना शुरू किया, जिससे जीवन को नया दृष्टिकोण मिला।

जब उन्होंने पीएचडी करने की इच्छा जताई, तो बच्चों ने सुझाव दिया, “सीए करिए, कठिन है लेकिन आपको पहचान दिलाएगा।”
उनकी पोती ने प्रेरित करते हुए कहा, “अगर आप मुझे गाइड कर सकते हैं, तो खुद क्यों नहीं?”

10 घंटे पढ़ाई, न कोचिंग, न गाइडेंस – सिर्फ आत्मबल
जुलाई 2021 में सीए की पढ़ाई शुरू करने वाले ताराचंद ने मई 2022 में फाउंडेशन, जनवरी 2023 में इंटरमीडिएट और मई 2024 में पहली बार फाइनल में असफल होने के बाद जुलाई 2025 में सफलता अर्जित की।

उन्होंने प्रतिदिन 10 घंटे पढ़ाई, कंधे के दर्द से जूझते रहे, और लिखने का अभ्यास करते रहे। न कोई कोचिंग ली, न ट्यूशन, केवल किताबें, यूट्यूब वीडियो और छोटे बेटे की जनरल स्टोर की शांत जगह ही उनकी पाठशाला रही।

परिवार बना ताकत, गीता बनी मार्गदर्शक
ताराचंद बताते हैं कि उनके बड़े बेटे ललित, जो दिल्ली में सीए हैं, और छोटे बेटे अमित, जो टैक्स प्रैक्टिस से जुड़े हैं — दोनों ने हर मोड़ पर उनका साथ दिया। लैपटॉप दिलवाया, रजिस्ट्रेशन कराया, हौसला बढ़ाया।

वे अपनी सफलता का श्रेय उस एक सीख को देते हैं जो उनके चाचा ने उन्हें गीता पढ़ाते हुए दी थी: “जो भी काम करो, उसे पूरी निष्ठा से करो।”

ताराचंद कहते हैं, “मैं जो भी करता हूं, पूरे मन से करता हूं। यही गीता की शिक्षा है।”

एक प्रेरणा, हर उम्र के लिए
ताराचंद अग्रवाल की कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है, यह मन की शक्ति, आत्म-प्रेरणा और सीखने की ललक की कहानी है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो कोई भी लक्ष्य उम्र का मोहताज नहीं होता।

 

 

Asmita Sarkar

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