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नेत्रहीन अभ्यर्थी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, उत्तराखंड सरकार और राज्य लोक सेवा आयोग को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार, राज्य लोक सेवा आयोग और राज्य उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस नेत्रहीन अभ्यर्थी श्राव्या सिंधुरी की याचिका पर जारी हुआ है, जिसमें उन्होंने उत्तराखंड न्यायिक सेवा परीक्षा से नेत्रहीन और अंग विकलांग व्यक्तियों को बाहर किए जाने को गंभीर भेदभाव बताया है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा, “यह सरकार की बहुत बड़ी गलती है।”

परीक्षा से पहले सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता पूर्णतः नेत्रहीन हैं और उन्होंने भेदभावपूर्ण भर्ती नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है। चूंकि न्यायिक सेवा परीक्षा 31 अगस्त से शुरू हो रही है और पहले जारी नोटिसों के बावजूद कोई पक्ष पेश नहीं हुआ, इसलिए कोर्ट ने यह कड़ा रुख अपनाया है।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया है अहम फैसला
गौरतलब है कि 3 मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा नियमों में नेत्रहीनों को बाहर करने के प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया था।
कोर्ट ने कहा था: “अब समय आ गया है कि दिव्यांगजनों के अधिकारों को मौलिक अधिकारों के बराबर दर्जा दिया जाए।”
“उन्हें न्यायिक सेवा में अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।”

याचिका में क्या कहा गया है?
याचिका में 16 मई 2025 को जारी उत्तराखंड न्यायिक सेवा भर्ती विज्ञापन को संविधान और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 के खिलाफ बताया गया है।

भर्ती में दिव्यांगजनों की पात्रता सिर्फ चार श्रेणियों तक सीमित कर दी गई है:
– कुष्ठ रोग से मुक्त व्यक्ति
– एसिड अटैक पीड़ित
– मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित
– बौनेपन से ग्रस्त व्यक्ति

इससे नेत्रहीन और अंग विकलांग जैसे कई अन्य दिव्यांग अभ्यर्थियों को न्यायिक सेवा में अवसर से वंचित कर दिया गया है।

निवास आधारित भेदभाव पर भी सवाल
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि केवल उत्तराखंड के निवासी दिव्यांगजनों को पात्र माना गया है, जो RPwD अधिनियम की धारा 34 के खिलाफ है।
इस धारा के अनुसार:
– सरकारी नौकरियों में 4% आरक्षण दिया जाना चाहिए।
– इसमें 1% आरक्षण नेत्रहीन/कम दृष्टि वाले और 1% अंग विकलांगों के लिए आरक्षित होता है।

मांग क्या की गई है?
1. गैर-निवासी दिव्यांग अभ्यर्थियों को बाहर करने का नियम रद्द किया जाए।
2. पात्रता को केवल चार श्रेणियों तक सीमित करने वाला प्रावधान संविधान और कानून के खिलाफ घोषित किया जाए।

 

 

 

Asmita Sarkar

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