
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा अनधिकृत मदरसों के छात्रों को सरकारी स्कूलों में भेजने के आदेश चुनौती योग्य हैं और ऐसे मामलों को संबंधित उच्च न्यायालय में उठाया जा सकता है।
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने यूपी और त्रिपुरा सरकार के फैसलों को दी चुनौती
इस मामले में याचिका दाखिल करने वाले संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद ने उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा सरकारों के उन निर्देशों को चुनौती दी है, जिनमें अनधिकृत मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करने की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही लगाई थी रोक
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोतिस्वर सिंह शामिल थे, ने याचिकाकर्ता के वकील को याद दिलाया कि कोर्ट ने पहले ही 21 अक्टूबर 2023 को NCPCR के 7 जून और 25 जून 2023 के आदेशों पर अस्थायी रोक लगा दी थी। इसके तहत राज्यों को भी उन आदेशों पर कोई कार्रवाई न करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अंतिम सुनवाई करे, क्योंकि अंतरिम रोक अब भी प्रभावी है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जाने की सलाह दी
हालांकि, पीठ ने साफ किया कि यह मामला संवैधानिक महत्व का है और इसे संबंधित हाईकोर्ट में उठाया जाना चाहिए। पीठ ने कहा, “आप हाईकोर्ट में जा सकते हैं। वह भी एक संवैधानिक अदालत है। आपको उस पर भरोसा करना चाहिए।”
कोर्ट ने मामले को तीन हफ्ते बाद पुनः सूचीबद्ध करने का निर्देश भी दिया है।
क्या है असर?
इस फैसले से साफ है कि मदरसों के छात्रों को जबरन सरकारी स्कूलों में भेजे जाने के आदेशों पर अब कानूनी लड़ाई का अगला दौर उच्च न्यायालयों में लड़ा जाएगा। जब तक मामला अंतिम रूप से न सुलझे, तब तक सुप्रीम कोर्ट की रोक जारी रहेगी।
यह फैसला मदरसा शिक्षा, बच्चों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अहम मुद्दों पर न्यायिक मार्गदर्शन की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।




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