
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह पुलिस थानों के सीसीटीवी फुटेज की रियल टाइम निगरानी सुनिश्चित करने के लिए एक ऐसा तंत्र विकसित करने पर विचार कर रहा है, जिसमें किसी मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता न हो। इसके लिए अदालत आईआईटी जैसे प्रमुख तकनीकी संस्थानों की मदद ले सकती है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी और निगरानी की खामियों को लेकर स्वत: संज्ञान से दर्ज मामले की सुनवाई कर रही थी।
‘केंद्र ने नहीं किया पालन’
अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि कुछ राज्यों ने सीसीटीवी लगाने के न्यायिक आदेशों का पालन किया है, लेकिन कई राज्यों ने अब तक इसका अनुपालन नहीं किया। उन्होंने दलील दी कि केंद्र सरकार की एजेंसियाँ—जैसे एनआईए, ईडी और सीबीआई—ने भी आदेश का पालन नहीं किया है।
जस्टिस मेहता की टिप्पणी
इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि यह केवल आदेश के अनुपालन का मामला नहीं है, बल्कि रियल टाइम निगरानी सुनिश्चित करने का मुद्दा भी है। उन्होंने कहा, “आज अनुपालन का हलफनामा दिया जा सकता है, लेकिन कल अधिकारी कैमरे बंद कर सकते हैं। इसलिए हमें ऐसा नियंत्रण कक्ष चाहिए, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप न हो। अगर कोई कैमरा बंद हो जाए तो तुरंत सूचना मिलनी चाहिए।”
पीठ ने कहा कि इस दिशा में आईआईटी की मदद से एक तकनीकी समाधान विकसित किया जा सकता है। अदालत ने मामले को आदेश सुनाने के लिए अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया था स्वत: संज्ञान
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान लिया था, जिसमें बताया गया था कि वर्ष 2025 के पहले आठ महीनों में राजस्थान में पुलिस हिरासत में 11 लोगों की मौत हो चुकी है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि कई पुलिस थानों के रिमांड रूम सीसीटीवी कैमरों की कवरेज से बाहर हैं। पुलिस अक्सर तकनीकी खराबी, स्टोरेज की कमी, चल रही जांच या कानूनी पाबंदियों का हवाला देकर फुटेज रोक लेती है। कई मामलों में पुलिस ने फुटेज साझा करने से ही इनकार कर दिया या उसे जारी करने में जानबूझकर देरी की।




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