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पढ़ाई और प्रदर्शन का दबाव डाल रहा है छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर- मोन्ट्यूब सेतलाकू

The pressure of studies and performance is taking a toll on students' mental health - Montube Setlaku

ख्यात मेंटल हेल्थ काउंसलर मोन्ट्यूब सेतलाकू से ख़ास बातचीत 

भारत में हाल के महीनों में छात्र आत्महत्या के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यह एक गहरी चिंता का विषय है, जो इस बात पर सवाल उठाता है कि आखिर बच्चे और युवा इतनी कम उम्र में मानसिक रूप से क्यों टूट रहे हैं। इस मुद्दे को समझने के लिए एडइनबॉक्स (EdInbox) ने बातचीत की मेंटल हेल्थ काउंसलर मोन्ट्यूब सेतलाकू (Montube Setlhaku) से। श्री मोन्ट्यूब मेंटल वेलनेस प्रैक्टिशनर के रूप में ख्यात हैं और दक्षिण अफ्रीका स्थित मेंटल हेल्थ ग्लोबल इंस्टीट्यूट और न्यू मोटिवेशन अकेडमी से सम्बद्ध हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न 1. हाल के महीनों में भारत में छात्र आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आप इस ट्रेंड को कैसे देखते हैं? इसके पीछे प्रमुख कारण क्या हैं?

उत्तर: हाल के महीनों में भारत में छात्र आत्महत्याओं में आई बढ़ोतरी कई गहरे कारणों की ओर संकेत करती है। स्कूल से कॉलेज तक का बदलाव कई युवाओं के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। इस दौरान सहपाठी बदलते हैं, परिवार से दूरी बढ़ती है, नई संस्कृति और जीवनशैली से तालमेल बैठाना पड़ता है और पढ़ाई का दबाव भी बढ़ जाता है। पिछले कुछ वर्षों में कॉलेज छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ पहले से कहीं अधिक बढ़ी हैं। कई किशोर कॉलेज में प्रवेश से ठीक पहले ही ऐसी मानसिक कठिनाइयों से जूझ रहे होते हैं, जो उनके दैनिक जीवन और पढ़ाई दोनों पर गंभीर प्रभाव डालती हैं।

इस समस्या के पीछे कई प्रमुख कारण हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्रों को पढ़ाई के संसाधन आसानी से उपलब्ध नहीं होते, जिससे उनमें तनाव, चिंता और अवसाद बढ़ता है, खासकर जब वे अपने संपन्न साथियों से तुलना करते हैं। इसके अलावा, अलग-अलग जातीय या सामाजिक पृष्ठभूमि के छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता लेने की स्वीकार्यता और पहुंच अलग होती है। धार्मिक अल्पसंख्यक छात्रों को कई बार भेदभाव या बुलिंग का सामना करना पड़ता है, जो उनकी मानसिक स्थिति को और खराब करता है। दिव्यांग छात्रों के लिए स्थिति और गंभीर होती है, क्योंकि उन्हें अधिक मानसिक चुनौतियों, साथियों की प्रताड़ना, चिंता, अवसाद और अकादमिक तनाव का सामना करना पड़ता है। इन सभी कारणों से उनमें आत्महत्या के विचार और स्वयं को नुकसान पहुंचाने की घटनाएँ भी बढ़ जाती हैं

कुल मिलाकर, घर से दूर रहने का तनाव, शैक्षणिक दबाव, सामाजिक असमानताएँ, भेदभाव, और संस्थागत तैयारी की कमी—ये सभी मिलकर छात्रों की मानसिक सेहत को कमजोर करते हैं और भारत में बढ़ते आत्महत्या मामलों की एक बड़ी वजह बनते हैं।

प्रश्न 2. अकादमिक दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को कितना प्रभावित कर रहा है?

उत्तर: छात्रों की मानसिक सेहत पर अकादमिक दबाव का असर बहुत गहरा होता है। पढ़ाई का बढ़ता बोझ न केवल मानसिक स्वास्थ्य को कमजोर करता है, बल्कि छात्रों की भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर भी सीधा प्रभाव डालता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता यानी अपनी भावनाओं को पहचानने, समझने, नियंत्रित करने और सही तरीके से व्यक्त करने की क्षमता। जब छात्र भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं, तो वे आत्म-जागरूकता, आत्म-नियंत्रण, प्रेरणा, सहानुभूति और सामाजिक कौशल जैसे गुण दिखाते हैं। लेकिन जब पढ़ाई और प्रदर्शन का दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है, तो ये सभी क्षमताएँ धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। इससे छात्रों में तनाव झेलने की क्षमता कम हो जाती है, वे जल्दी टूट जाते हैं, आत्मविश्वास घटने लगता है और मानसिक परेशानी बढ़ती जाती है।

वहीं जिन छात्रों की भावनात्मक बुद्धिमत्ता मजबूत होती है, वे चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं। ऐसे छात्र रिश्तों में संतुलन बनाए रखते हैं, नेतृत्व क्षमता दिखाते हैं, सही फैसले लेते हैं, विवादों को शांति से संभालते हैं और बदलती परिस्थितियों में खुद को ढाल लेते हैं। इसलिए यह साफ है कि अत्यधिक अकादमिक दबाव छात्रों की मानसिक सेहत के साथ-साथ उनके भावनात्मक विकास में भी बाधा डालता है, जबकि संतुलित माहौल उन्हें अधिक स्थिर और मजबूत बनाता है।

प्रश्न 3. क्या आपको लगता है कि माता-पिता की अपेक्षाएँ और तुलना संस्कृति छात्रों के भावनात्मक तनाव में इजाफा कर रही हैं?

उत्तर: हां, माता-पिता की बढ़ी हुई उम्मीदें और तुलना की संस्कृति छात्रों के भावनात्मक तनाव को काफी बढ़ा देती हैं। जब बच्चों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता और उनकी लगातार तुलना दूसरों से की जाती है, तो वे खुद को अवमूल्यित या असक्षम महसूस करने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे समाज और परिवार से दूर हो जाते हैं, उनमें चिंता, तनाव, अवसाद और उदासी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पढ़ाई में रुचि कम हो जाती है और उनके व्यक्तित्व में बदलाव आने लगते हैं। इसलिए यह साफ है कि माता-पिता की अधिक उम्मीदें और तुलना की मानसिकता बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती हैं।

प्रश्न 4. क्या स्कूल, कॉलेज और कोचिंग सेंटर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को संभालने के लिए पर्याप्त तैयार हैं? 

उत्तर: अफसोस की बात है कि अधिकतर स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थान मानसिक स्वास्थ्य के समर्थन के मामले में पर्याप्त तैयार नहीं हैं। कई शिक्षक और स्टाफ स्वयं मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक बुद्धिमत्ता के प्रशिक्षण से वंचित होते हैं, जिससे उनका व्यक्तिगत तनाव छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यह अक्सर कठोर व्यवहार, कम भावनात्मक समर्थन और संघर्षपूर्ण इंटरैक्शन के रूप में सामने आता है। इसके अलावा, अधिकांश कोचिंग संस्थान तब तक मानसिक स्वास्थ्य सत्र आयोजित नहीं करते जब तक उन्हें इसके लिए वित्तीय सहायता न मिले। शिक्षकों और स्टाफ को गैर-शैक्षणिक बाधाओं को संभालने के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं होती, और यही कारण है कि छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं में इजाफा हो रहा है।

प्रश्न 5. सोशल मीडिया छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर रहा है?

उत्तर: सोशल मीडिया अक्सर असली से हटकर और भ्रामक जीवनशैली पेश करता है। कई छात्र इन झूठे या सजाए हुए चित्रों और पोस्टों को वास्तविक मान लेते हैं और अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं, जिससे उनकी मानसिक सेहत और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप छात्रों में चिंता, अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और अकेलापन बढ़ सकता है। ऑनलाइन बुलिंग भी एक बड़ा खतरा है, जो छात्रों में डर, भ्रम और कभी-कभी आत्म-विनाशकारी व्यवहार को जन्म देता है। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर असली से हटकर खूबसूरती और शरीर की छवि पेश करने वाले फिल्टर और मानक छात्रों में खराब बॉडी इमेज और आत्म-संतोष की कमी पैदा करते हैं। लगातार दूसरों की जीवनशैली देखकर “फियर ऑफ मिसिंग आउट” या FOMO की भावना भी उत्पन्न होती है, जिससे छात्रों को लगता है कि उनका जीवन कम रोचक या असंतोषजनक है।

प्रश्न 6. माता-पिता और शिक्षक किन प्रारंभिक चेतावनी संकेतों पर ध्यान दें कि पता चल सके कि छात्र मानसिक या भावनात्मक तनाव में है?

उत्तर: माता-पिता और शिक्षकों को छात्रों के मानसिक या भावनात्मक तनाव की पहचान करने के लिए उनके व्यवहार में बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। अक्सर जब छात्र अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाते—यानी अपने गुस्से, चिंता, उदासी या अन्य भावनाओं को समझने, संभालने और सही तरीके से व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं—तो यह एक बड़ा चेतावनी संकेत होता है। ऐसे छात्रों में भावनात्मक संतुलन खोने, तनाव से निपटने में असमर्थता, आत्म-नियंत्रण की कमी, आवेगपूर्ण प्रतिक्रियाएँ और व्यवहार संबंधी कठिनाइयाँ देखी जा सकती हैं। इसके साथ ही उनमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, जैसे गुस्सा, चिंता, उदासी जो धीरे-धीरे अवसाद में बदल सकती हैं, रिश्तों में खटास, आक्रामक संचार, दूसरों की बात न सुन पाना और झगड़ों में वृद्धि भी दिखाई दे सकती है। इन प्रारंभिक संकेतों को पहचानकर माता-पिता और शिक्षक समय रहते सहायता और मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

प्रश्न 7. अक्सर छात्र काउंसलिंग लेने से कतराते क्यों हैं? इसे सामान्य कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर: काउंसलिंग या मानसिक स्वास्थ्य सहायता लेने में हिचकने का सबसे बड़ा कारण सामाजिक कलंक या स्टिग्मा है। कई छात्र डरते हैं कि उन्हें कमजोर या अक्षम बताया जाएगा, उनका न्याय नहीं होगा या उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ेगा। इस कलंक को दूर करने और मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत को सामान्य बनाने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहले, छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य समर्थन की पहुँच बढ़ानी चाहिए और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को कम करना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देना, उन्हें जरूरी कौशल सिखाना और जागरूकता अभियान में सभी छात्रों को शामिल करना जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता बढ़ाने से छात्र अपने और दूसरों के भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। साथ ही, नीति और संरचनात्मक बदलावों के माध्यम से छात्रों को सशक्त बनाना और संस्थानों में स्थायी समर्थन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। इस तरह, मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत को अकादमिक माहौल में प्राकृतिक और स्वीकार्य बनाया जा सकता है।

प्रश्न 8. अगर कोई छात्र तनाव, चिंता या डिप्रेशन महसूस कर रहा हो, तो उसे तुरंत क्या कदम उठाने चाहिए?

उत्तर: यदि छात्र अत्यधिक तनाव, चिंता या अवसाद महसूस कर रहे हैं, तो उन्हें तुरंत प्रभावी तनाव प्रबंधन तकनीकें अपनानी चाहिए, स्वयं की देखभाल के नियम बनाना चाहिए और अपनी भावनाओं को स्वस्थ तरीके से व्यक्त करना सीखना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले छात्रों को यह पहचानना चाहिए कि उनके तनाव के मुख्य कारण क्या हैं और किन परिस्थितियों में वे अधिक प्रभावित होते हैं। फिर उन्हें उन परिस्थितियों से निपटने या बचने के लिए स्वस्थ coping mechanisms की सूची तैयार करनी चाहिए। इसमें व्यायाम करना, किसी हॉबी में समय बिताना, ध्यान या गहरी साँस लेने जैसी विश्राम तकनीकों का अभ्यास शामिल हो सकता है। इसके अलावा, वे किसी भरोसेमंद व्यक्ति या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से अपनी भावनाओं और परेशानियों के बारे में बात कर सकते हैं। भावनाओं को लिखने के लिए डायरी का प्रयोग करना, दैनिक दिनचर्या का पालन करना और नकारात्मक विचारों को चुनौती देना भी मददगार होता है। इन सरल लेकिन प्रभावी कदमों से छात्र अपने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं और भावनात्मक स्थिरता बनाए रख सकते हैं।

प्रश्न 9. क्या भारत में छात्रों की मानसिक सेहत के लिए मजबूत नीतियों की जरूरत है?

उत्तर: हां, भारत में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और समर्थन के लिए मजबूत और समन्वित नीतियों की बहुत आवश्यकता है। वर्तमान में कुछ पहलें मौजूद हैं जैसे कि मेन्टल हेल्थकेयर एक्ट 2017, नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन स्ट्रैटेजी, टेली-मानस (Tele-MANAS), नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 और सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइंस 2025, लेकिन ये अक्सर अलग-अलग और अधूरा प्रयास लगते हैं। नीतियों के क्रियान्वयन में कई कमियाँ हैं, जैसे कि अव्यवस्थित दृष्टिकोण, कमजोर कार्यान्वयन, मानसिक स्वास्थ्य पर समाज में फैला कलंक, प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी और पर्याप्त बजट का अभाव। इन चुनौतियों को देखते हुए जरूरी है कि सभी शैक्षणिक संस्थानों में अनिवार्य काउंसलर्स हों, शिक्षकों और स्टाफ के लिए मानसिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण नियमित रूप से आयोजित किया जाए, पाठ्यक्रम में मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को एकीकृत किया जाए और डिजिटल माध्यम जैसे Tele-MANAS के जरिये पहुँच बढ़ाई जाए। इसके अलावा, स्कूल और कॉलेजों की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है ताकि छात्र सुरक्षित और सहायक वातावरण में अपने मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण कर सकें।

एडइनबॉक्स टीम

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