
एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां नानी के घर की भागदौड़, दादा के गांव की मिट्टी की खुशबू और भाई-बहनों के साथ खेलकूद में बीतती थीं। उस दौर में घूमने का मतलब किसी जगह को ‘दिखाना’ नहीं, बल्कि थोड़ा सुकून पाना था। लेकिन आज यात्रा एक तरह की दौड़ बन गई है—दिखावे की, तुलना की और ऑनलाइन मान्यता की। इसी दौड़ ने एक नए मनोवैज्ञानिक दबाव को जन्म दिया है, जिसे अब ट्रैवल डिस्मॉर्फिया कहा जा रहा है।
क्या है ट्रैवल डिस्मॉर्फिया?
यह शब्द सुनकर लगता है जैसे कोई बीमारी हो। दरअसल, यह बॉडी डिस्मॉर्फिया की तरह ही एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, लेकिन शरीर से नहीं, यात्रा से जुड़ी हुई। इसमें व्यक्ति महसूस करता है कि वह दूसरों की तुलना में कम या ‘कम आकर्षक’ जगहों पर गया है। उसे लगता है कि उसकी यात्राएं उतनी शानदार नहीं हैं जितनी सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीरें और वीडियो।
यानी साफ कहें तो—सोशल मीडिया ने लोगों को अपनी ही यात्राओं पर शक करने पर मजबूर कर दिया है। ट्रैवल डिस्मॉर्फिया इंटरनेट युग की देन है, जो उस हीन भावना को दर्शाता है जब कोई व्यक्ति अपनी यात्राओं को दूसरों की तुलना में कम रोमांचक समझने लगता है। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ता है और कई बार व्यक्ति को लगातार असंतोष की स्थिति में धकेल देता है।
आंकड़े बताते हैं—समस्या बढ़ रही है
‘टॉकर रिसर्च’ के एक अध्ययन के अनुसार 10 में से 1 अमेरिकी स्वीकार करता है कि वह यात्रा के दौरान ट्रैवल डिस्मॉर्फिया जैसी स्थिति महसूस करता है।
इसे समझना मुश्किल नहीं है—लगातार स्क्रॉल करते हुए हर कोई खूबसूरत बीच की तस्वीरें, लग्ज़री रिसॉर्ट्स या पहाड़ों में बने परफेक्ट रील्स सेव करता रहता है, और फिर वैसी ही छुट्टियों की उम्मीद करता है।
सर्वे में शामिल 2,000 लोगों में से आधे से भी कम अपनी अब तक की यात्राओं से संतुष्ट पाए गए। कारण साफ है—हकीकत कभी भी इंस्टाग्राम जैसी परफेक्ट नहीं होती।
खासकर जेनरेशन Z पर इसका असर सबसे ज्यादा है। लगभग 47% युवा मानते हैं कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला प्रभावशाली कंटेंट उन्हें यह महसूस कराता है कि उनका जीवन ‘बोरिंग’ है।
सोशल मीडिया का दिखावा और आपकी निराशा
आज हमारे फोन की स्क्रीन तय करती है कि दुनिया कहां घूम रही है और कौन कितना मज़ा ले रहा है। सुबह आंख खुलते ही किसी दोस्त की बाली ट्रिप या किसी सहकर्मी की यूरोप स्टोरी नजर आती है। ऐसे में तुलना होना स्वाभाविक है।
इंस्टाग्राम के फिल्टर, ड्रोन शॉट्स और एडिटिंग हर तस्वीर को इतना खूबसूरत बना देते हैं कि सामान्य जिंदगी फीकी लगने लगती है।
मगर सच यह है—हर परफेक्ट फोटो के पीछे कई असफल शॉट, भीड़, खिंचाव और इंतजार होता है। दिखावे और वास्तविकता के बीच यह फर्क लोगों को असंतोष और तनाव की तरफ धकेल रहा है।
घूम न पाने की शर्मिंदगी—एक नया दबाव
सर्वे के अनुसार 32% लोग मानते हैं कि वे यात्रा न कर पाने पर दबाव और शर्मिंदगी महसूस करते हैं। जैसे कोई पूछे— “इस साल कहीं घूमने नहीं गए?” यह साधारण सवाल भी लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि कहीं वे दूसरों से पीछे तो नहीं रह गए।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
रॉकेट हेल्थ की सुपरवाइजिंग काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. नंदिता कालरा बताती हैं कि सोशल मीडिया आत्म-सम्मान, पहचान और मान्यता को सीधा प्रभावित करता है।
लोग अब खुद से पूछते हैं— “क्या यह फोटो लाइक आएगी?” न कि “क्या यह जगह मुझे पसंद है?”
जब जिंदगी दूसरों की नजरों से तय होने लगे, तो भीतर खालीपन होना तय है।
जब छुट्टियां आराम नहीं, तनाव देने लगें
यात्रा का मकसद हमेशा सुकून पाना रहा है। लेकिन अब लोग सूर्यास्त के पीछे भागते हैं ताकि स्टोरी डाल सकें, पहाड़ों में जाते हैं ताकि ‘एस्थेटिक फोटो’ खींच सकें। नतीजा—वापसी पर हर दूसरा व्यक्ति कहता है, “अब छुट्टी से आए हैं, अब असली आराम चाहिए।”




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