
10 नवंबर को दिल्ली में हुए ब्लास्ट के बाद जब जांच की दिशा फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी की ओर मुड़ी, तो मामला सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों तक सीमित नहीं रहा। विश्वविद्यालय पर लगे कथित शैक्षणिक धोखाधड़ी और एक्सपायर हो चुके NAAC एक्रेडिटेशन के दावे ने भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था की एक गहरी सच्चाई उजागर कर दी—मान्यता (accreditation) का संकट।
अल-फलाह स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी का ‘ग्रेड A’ एक्रेडिटेशन 2013 से 2018 तक वैध था। इसी तरह, अल-फलाह स्कूल ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग की मान्यता 2011 से 2016 के बीच वैध थी। यानी दोनों संस्थान पिछले लगभग एक दशक से बिना वैध एक्रेडिटेशन के चल रहे थे, जबकि उनकी वेबसाइट और सार्वजनिक दस्तावेजों में इन्हें “ग्रेड A” बताया जाता रहा। NAAC के शो-कॉज नोटिस में यह बात साफ लिखी है कि ऐसे दावे “जनता और छात्रों को गुमराह करते हैं।”
UGC के अनुसार, भारत में कुल 1,074 विश्वविद्यालय हैं। लेकिन 2025 तक उपलब्ध NAAC डेटा बताता है कि इनमें से केवल 561 विश्वविद्यालयों के पास ही वैध एक्रेडिटेशन है। यानी आधे से अधिक विश्वविद्यालय आज भी बिना किसी मानक मूल्यांकन के काम कर रहे हैं। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं—यह हमारे उच्च शिक्षा मॉडल की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल है।
जब NAAC की एग्जीक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन अनिल सहस्रबुद्धे से पूछा गया कि इतना बड़ा हिस्सा मान्यता से बाहर क्यों है, उनका जवाब स्पष्ट था कि NAAC की प्रक्रिया अनिवार्य नहीं, बल्कि स्वैच्छिक है। कोई संस्था आवेदन नहीं करती, तो NAAC उस पर कार्रवाई नहीं कर सकता। नियम कड़े करना केंद्र, राज्य सरकारों और UGC-AICTE जैसी नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है। फिलहाल एक्रेडिटेड संस्थानों को अतिरिक्त अधिकार और इंसेंटिव देकर प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
इस जवाब में वही कमजोरी छिपी है जो पूरे सिस्टम को वर्षों से जकड़े हुए है—स्वैच्छिक मान्यता उस समय विफल हो जाती है जब संस्थान अपनी छवि सुधारने से ज्यादा छुपाने में रुचि रखते हों।
NAAC के शो-कॉज नोटिस में यह तक लिखा गया कि विश्वविद्यालय NAAC द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है, न ही उसने दोबारा मान्यता के लिए आवेदन किया है। इसके बावजूद वेबसाइट पर “ग्रेड A” का दावा मौजूद था। यह सिर्फ तकनीकी भूल नहीं, बल्कि पारदर्शिता का गंभीर उल्लंघन है, जो छात्रों, अभिभावकों और समाज के भरोसे को चोट पहुँचाता है।
विश्वविद्यालय का जवाब आया कि यह “गलती” वेबसाइट-डिजाइन की वजह से हुई और पुराने दावे अब हटा दिए गए हैं। लेकिन यह सफाई अपने-आप में कई सवाल खड़ी करती है— क्या कोई शैक्षणिक संस्थान एक दशक पुराने एक्रेडिटेशन को इतनी अनदेखी से दिखाता रह सकता है? क्या यह सिर्फ तकनीकी चूक थी, या प्रतिष्ठा बनाए रखने का दबाव?
अल-फलाह यूनिवर्सिटी का विवाद केवल एक संस्था की गलती का मामला नहीं है। यह भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली के एक बड़े, लगातार उभरते संकट का आईना है। आधे विश्वविद्यालय बिना मान्यता के, स्वैच्छिक मूल्यांकन, ढीला रेगुलेशन और छात्रों के भविष्य को जोखिम में डालती अनिश्चितता- इन सबके बीच सबसे ज्यादा नुकसान उस छात्र को होता है जो मान्यता के भरोसे अपने करियर का फैसला लेता है।
भारत को अब स्वैच्छिक मॉडल से आगे बढ़कर अनिवार्य और पारदर्शी मान्यता प्रणाली की ओर जाना होगा। वरना, हर अल-फलाह जैसा मामला सिर्फ एक और सुर्खी बनेगा—और उसके नीचे दब जाएंगे वे हजारों छात्र, जिनके भविष्य पर ऐसे निर्णय सीधा असर डालते हैं। भारत की उच्च शिक्षा को सुधारने की जरूरत किसी रिपोर्ट का विषय नहीं—यह समय की मांग है।




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