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भारत के लिए सर्कुलर इकोनॉमी बनेगी ग्रीन ग्रोथ और रोजगार का इंजन

For India, the circular economy will become an engine of green growth and employment

ब्राज़ील के बेलेम में हुए COP30 में यह स्पष्ट संदेश मिला कि जलवायु कार्रवाई अब केवल लक्ष्यों की नहीं, बल्कि धरातल पर समाधान की लड़ाई है। भारत के लिए सर्कुलर इकोनॉमी, सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन इंडस्ट्री आने वाले समय में आर्थिक विकास और रोजगार का बड़ा स्तंभ बन सकते हैं।

ब्राज़ील के बेलेम में हाल में हुए COP30 सम्मेलन ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी है — दुनिया अब केवल लक्ष्यों की बात करके तालियाँ नहीं बजा सकती। जलवायु परिवर्तन पर लड़ाई तभी जीती जाएगी जब समाधान धरातल पर दिखें। इस बार का एजेंडा सिर्फ़ “कितना कटौती करेंगे” नहीं था, बल्कि “यह कटौती कैसे और कहाँ से होगी” पर केंद्रित था। वैश्विक हरित औद्योगिकीकरण पर आया बेलेम घोषणापत्र इस बदलाव का प्रतीक है, क्योंकि इसमें व्यापार, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और संसाधनों के उपयोग को सीधे जलवायु कूटनीति से जोड़ा गया है।

भारत के लिहाज़ से यह बदलाव और भी महत्त्वपूर्ण है। देश तेज़ी से एक बड़े विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है और नेट-ज़ीरो के लक्ष्य की ओर काम कर रहा है। इसलिए भारत के ग्रीन फ्यूचर का पैमाना सिर्फ़ यह नहीं होगा कि कितने सोलर पैनल लगे, बल्कि यह होगा कि स्टील, सीमेंट, एल्युमिनियम और प्लास्टिक जैसी सामग्रियों का कितना कुशलता से उपयोग हुआ। स्पष्ट है — ग्रीन ग्रोथ का मतलब केवल स्वच्छ ऊर्जा नहीं, बल्कि स्मार्ट इंडस्ट्री भी है।

भारत के शहर हर साल लगभग 62 मिलियन टन ठोस कचरा पैदा करते हैं, लेकिन उसका छोटा-सा हिस्सा ही सही तरीक़े से रिसाइकिल होता है। अगर स्थिति यही रही, तो 2050 तक यह कचरा 400 मिलियन टन से भी आगे जा सकता है। यह संकट एक अवसर भी बन सकता है — सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देकर। कबाड़ से बनती सामग्रियाँ नए कच्चे माल की जगह ले सकती हैं और यह न सिर्फ़ कचरा कम करेगी बल्कि अर्थव्यवस्था को भी नई ताक़त देगी। अनुमान कहता है कि इस परिवर्तन से 2050 तक 2 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा आर्थिक मूल्य और एक करोड़ से ज़्यादा रोज़गार पैदा हो सकते हैं।

सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग यानी कबाड़ या बेकार हो चुकी सामग्रियों से उत्पाद बनाना एक व्यावहारिक और ज़रूरी विकल्प है। यह कचरे को कच्चे माल में बदलने का सबसे स्वच्छ तरीका है। इससे ऊर्जा की खपत कम होती है, आयात पर निर्भरता घटती है और स्थानीय रोजगार बढ़ता है। यह सीधे SDG 12 और साथ ही SDG 8, 9, 11 और 13 की ओर भारत को आगे बढ़ाता है।

एल्युमिनियम उद्योग इसका बेहतरीन उदाहरण है। नए बॉक्साइट से एक टन एल्युमिनियम बनाने में जितनी ऊर्जा लगती है, उतनी ऊर्जा रिसाइकिल किए गए एल्युमिनियम में केवल 5% लगती है। भारत में आज कुल उत्पादन का 40% हिस्सा सेकेंडरी एल्युमिनियम है और इससे CO₂ उत्सर्जन में 90% से अधिक कमी आती है। लेकिन भारत का एल्युमिनियम अभी भी कोयले पर आधारित बिजली पर निर्भर है। यूरोपीय संघ जैसे बाज़ार अब कार्बन टैक्स लगा रहे हैं, इसलिए अगर भारत ने अपनी इंडस्ट्री को स्वच्छ नहीं किया, तो वह अपने ही उत्पादों के लिए बाज़ार खो देगा।

COP30 ने इस चुनौती को रोज़गार के अवसर से जोड़कर समझाया है। दुनिया में रीसाइक्लिंग उद्योग पहले से ही लाखों लोगों को रोजगार देता है — भारत में यह संख्या 2050 तक 1 करोड़ से अधिक हो सकती है। यह वही सेक्टर है जहाँ MSME सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं, और यही MSME देश की GDP और निर्यात के बड़े हिस्से को संभाले हुए हैं। मतलब साफ़ है — सर्कुलर इकोनॉमी भारत के लिए रोजगार और जलवायु — दोनों का इंजन बन सकती है।

लेकिन यहाँ एक चेतावनी भी है। अगर यह पूरी तरह ऑटोमेशन-आधारित मॉडल बना, तो लाभ तो होगा लेकिन रोजगार नहीं। भारत के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि कचरा बीनने वाले, छोटे स्क्रैप डीलर और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को इस नई औद्योगिक क्रांति में शामिल किया जाए — नहीं तो हरित विकास केवल कुछ कारखानों तक सीमित होकर रह जाएगा।

COP30 का सार यही है — अब लक्ष्य नहीं, कार्यान्वयन मायने रखता है। भारत के पास मौका है कि वह कम-कार्बन सामग्री को बढ़ावा देते हुए इंडस्ट्री और MSMEs को ग्रीन ट्रांज़िशन की राह में आगे बढ़ाए। सरकारी खरीद में रिसाइकल्ड मटीरियल को प्राथमिकता, स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने के ढांचे, तकनीक उन्नयन और श्रमिकों का औपचारिककरण — यही वो कदम हैं जो भारत को आगे ले जाएंगे।

अंततः, यह केवल पर्यावरणीय रणनीति नहीं — यह आर्थिक रणनीति है। सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग हर एक टन पर कार्बन उत्सर्जन कम करती है और मनुष्यों के लिए ज़्यादा काम पैदा करती है। इसे ही COP30 ने Job–Carbon Dividend का नाम दिया है — कम कार्बन, ज़्यादा रोजगार।

भारत अगर इस मौके को सीरियसली ले, तो वह दुनिया के सामने यह साबित कर सकता है कि हरित विकास सिर्फ़ खर्चा नहीं, बल्कि भविष्य की सबसे बड़ी कमाई है — अर्थव्यवस्था भी बचेगी और धरती भी।

 

रईस अहमद 'लाली'

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